कांग्रेस आलाकमान का जमीनी हकीकतों से अंजान बने रहना जारी है और संगठन के लिए एक अत्यंत निराशाजनक भविष्य की संभावित सच्चाई को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करना चाहती. पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव परिणामों ने एकबार फिर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता खो रही है और किसी समय पूरे राष्ट्र पर मजबूत पकड़ रखने वाली यह पार्टी आज केवल 6 प्रतिशत आबादी पर शासन कर रही है. 
 
यह बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेसी नेतृत्व हमेशा से कोई कार्रवाई किए बगैर आत्म-निरीक्षण करता आ रहा है. पूर्व मंत्री व विद्वान सांसद शशि थरूर द्वारा चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद दिया गया बयान भी इसी ओर इशारा करता है. थरूर ने कहा था कि ‘अब आत्मनिरीक्षण का नहीं बल्कि संरचनात्क कार्रवाई करने का समय आ गया है.’ वरिष्ठ मंत्री दिग्विजय सिंह भी इसी सोच में पड़े थे कि कांग्रेसी नेतृत्व ने उनके व उनके सहयोगियों द्वारा गत वर्ष पार्टी का भविष्य का मार्ग निर्दिष्ट करने के लिए प्रस्तुत की गई रिपोर्ट पर अमल करने में विलंब क्यों किया. एक प्रमुख दैनिक समाचारपत्र को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि पार्टी में फिर से नए सिरे से प्राणों का संचार करने और विभिन्न राज्यों में नेतृत्व का विकास करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की जिम्मेदारी सोनिया व राहुल गांधी की थी. 
जबकि, दोनों नेताओं ने शीर्ष नेतृत्व की निष्क्रियता के कारण सार्वजनिक रूप से उसकी आलोचना की थी, कई अन्यों ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि सोनिया गांधी जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी और राहुल गांधी पर दोष मढ़ने की अनुमति देने में भी समान रूप से झिझक रही थीं. जो सवाल उठता है वो ये कि अगर पार्टी अध्यक्ष होने के नाते सोनिया गांधी समाधान नहीं प्रदान कर सकतीं तो जाहिर है कि वह स्वयं अपने आप में एक समस्या है. अगर ऐसा है तो उन्हें राहुल गांधी अथवा किसी और के लिए पार्टी अध्यक्ष पद का मार्ग प्रशस्त कर देना चाहिए ताकि उन आवश्यक परिवर्तनों को लाया जा सके जिनकी बात शशि थरूर कर रहे हैं. 
 
पार्टी नेतृत्व को छोड़कर बाकी सभी स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि इस पुरानी व भव्य पार्टी में क्या कुछ गलत चल रहा है. सोनिया गांधी की मंडली का हिस्सा बने चापलूसों ने उन्हें आश्वस्त कर लिया है कि उनके नेतृत्व को किसी प्रकार की कोई चुनौती नहीं है और पार्टी द्वारा बिना कोई सवाल उठाए उनके हर आदेश का पालन किया जाएगा. जबकि, सच्चाई यह है कि 2014 लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद उनके व राहुल को बढ़ावा देने की उनकी इच्छा के खिलाफ पार्टी में एक मूक विद्रोह चल रहा है. उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगदंबिका पाल, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के पूर्व महासचिव बिरेंद्र सिंह और पूर्वमंत्री राव इंद्रजीत सिंह उन नामों में से हैं जिन्होंने कई कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया और उसके टिकट पर राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़े. 
 
 हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव के दौरान कई राज्य स्तरीय नेता भाजपा में शामिल हुए. हाल ही में उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुुगुणा सहित नौ बागी कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हुए हैं. असम में पार्टी के मुख्य रणनीतिकार और मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी हेमंत विश्व शर्मा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में भाजपा की मदद की. तमिलनाडु में जीके वसन की अध्यक्षता वाला एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से अलग होकर स्वतंत्र हो गया है. पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन बनाने का आलाकमान का निर्णय जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया और उन्होंने वाम प्रत्याशियों की कोई भी मदद करने से साफ इंकार कर दिया. अगर यह विद्रोह नहीं तो क्या है?
 
सोनिया गांधी की मंडली के सदस्यों अथवा चापलूसों से विद्रोह की उम्मीद कोई नहीं करता क्योंकि उनमें से अधिकांश अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए सोनिया गांधी पर निर्भर हैं. वे ऐसे नेता हैं जिन्हें उनकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व से निकटता के कारण उच्च पदों पर नियुक्त किया गया है. लेकिन अगर इनमें से किसी को भी अगर और अधिक आकर्षक प्रस्ताव मिले तो वह भी मंडली का त्याग करने में झिझकेगा नहीं. 
 
मौजूदा पार्टी नेतृत्व को चुनाव में कांग्रेस की हार के कारणों का पता लगाने के लिए इतिहास की तरफ नजर दौड़ानी चाहिए. पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कभी भी अपने विरोधियों से नहीं बल्कि उन लोगों द्वारा परास्त की गई है जिन्हें इसने राजनीतिक रूप से पोषित किया था. 1977 में बाबू जगजीवन राम, एचएन बहुगुणा और अन्यों ने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का गठन किया जिसने महत्वपूर्ण मोड़ पर इंदिरा गांधी को कमजोर कर दिया. 1989 में वीपी सिंह, अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान ने जनमोर्चा की स्थापना की जो राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की पराजय का कारण बना. 1996 में अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी और एमएल फोतेदार ने नरसिंह राव के पतन की साजिश रची. 2014 में देखा गया कि पार्टी नेतृत्व की उपेक्षा से हताश कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भाजपा का मुकाबला करने के बजाय घर बैठना ही उचित समझा. 
कांग्रेसी आलाकमाना को एहसास होना चाहिए कि उसे बाहर के   साथ-साथ भीतर से भी खतरा है और आने वाले चुनावों में यह खतरा उसके लिए एकबार फिर पराजय का कारण बन सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)