जाट आरक्षण आंदोलन की जिस आग ने पूरे भारत के सामने हरियाणा की छवि को बेहद बुरी तरह क्षति पहुंचाई थी, उस छवि को प्राप्त करने में लंबा वक्त लगेगा। पर जिन्होंने हरियाणा की छवि पर दाग लगाया उसे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जिस तरीके से निपटा रहे हैं उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। इस तरह की कार्रवाई के लिए एक मुख्यमंत्री को जिगरा चाहिए और मनोहर लाल ने यह साबित कर दिया है कि उनके पास प्रशासनिक क्षमता भी है और सख्त निर्णय लेने का जिगरा भी. हालांकि, मंथन का वक्त यह भी है कि ऐसी स्थिति ही क्यों आई, जिसमें मुख्यमंत्री के अपने अधिकारियों ने ही उन्हें जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान पूरी तरह अंधेरे में रखा?
 
हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन कोई नया नहीं था. इससे पहले भी आंदोलन होते रहे हैं और अभी कई आंदोलन की तैयारी भी चल रही है. कई बार आंदोलन हिंसात्मक भी हुआ और सरकारी संपत्तियों को भी भरपूर नुकसान पहुंचाया गया, लेकिन इस बार जो कुछ भी हुआ वह अकल्पनीय था. अपने ही अपनों को मार रहे थे और अपने ही अपनों से सबकुछ छिपा रहे थे. पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने हाथ इस तरह बांध लिए थे जैसे कोई दैवीय शक्ति उन्हें कार्रवाई करने से रोक रही हो. होंठ इस तरह सिल लिए थे कि भारी संख्या में तैनात भारतीय सेना के जवानों को कार्रवाई करने का हुक्म देने के लिए जुबान नहीं खुल रही थी. इन सबके बीच प्रदेश के मुखिया को इस तरह के फीडबैक दिए जा रहे थे, जैसे सबकुछ ठीक है. अगर मीडिया ने जान पर खेलकर पूरे प्रदेश की दुर्दशा को सामने लाने का काम न किया होता तो न जाने और कितनी बुरी स्थिति में प्रदेश की जनता होती.
 
आंदोलन के दौरान मीडिया के ऊपर भी हमले हुए. अखबारों के दफ्तर तक फूंक दिए गए. मीडियाकर्मियों के वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया. पर बावजूद इसके लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ ने हरियाणा की हकीकत को सबके सामने प्रस्तुत किया. शायद यही कारण था कि केंद्र को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा और भारतीय सेना को सीधी कार्रवाई का आदेश दिया गया. इन सबके बीच अगर किसी को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा तो वह थे प्रदेश के मुखिया मनोहर लाल खट्टर. उनकी ईमानदार छवि, मेहनत करने की झमता और प्रशासनिक पकड़, सबकुछ दांव पर लग गया. हर एक अंगुली उनके ही ऊपर उठनी शुरू हुई। ऐसे में मुख्यमंत्री ने पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन कर अपनी और प्रदेश की छवि को फिर से स्थापित करने का ठोस निर्णय लिया.
 
असम और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह मुख्यमंत्री की अपेक्षाओं पर खरे साबित हुए हैं. कमेटी ने 2 मार्च से काम करना शुरू किया और अपनी टीम के साथ हर उस जिले में पहुंचे जहां आंदोलन के कारण हिंसा हुई थी. उन्होंने जितने कम समय में विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है वह अपने आप में काबिले तारीफ है. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में रोहतक के 30 अफसरों की नाकामी को उपद्रव के लिए जिम्मेदार माना है. कमेटी ने आरक्षण के दौरान हरियाणा के विभिन्न शहरों में आगजनी, लूट और हिंसा के लिए प्रदेश के कुल 90 अफसरों की लापरवाही को जिम्मेदार माना है. इनमें आईएएस, आईपीएस, उपायुक्त, एसपी, एडीसी, एसडीएम, नायब तहसीलदार, थाना प्रभारी और एसआई इंचार्ज स्तर के अधिकारी हैं.
 
मुख्यमंत्री को जब यह रिपोर्ट सौंपी गई तब कयास लगाए जा रहे थे कि अभी कमेटी ने रिपोर्ट ही सौंपी है, इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को विभागीय जांच के लिए भेजा जाएगा. इसके बाद कार्रवाई होगी. यह कार्रवाई होगी भी या नहीं, या फिर अन्य दूसरी जांच कमेटियों की तरह यह भी ठंडे बस्ते में चली जाएगी. पर सभी कयासों पर विराम लगाते हुए मुख्यमंत्री ने प्रदेश के सबसे बड़े अधिकारियों पर गाज गिराने से शुरुआत की. अमूमन यह देखा जाता है कि सबसे पहले छोटे अधिकारियों या कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है. पर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने अन्य राज्यों की सरकारों के लिए एक बेहतर मिसाल प्रस्तुत की. उन्होंने डीजीपी, मुख्य सचिव सहित सभी दोषी अधिकारियों पर सीधी कार्रवाई की. क्या आईजी, क्या डीआईजी और क्या एसएचओ. प्रकाश सिंह कमेटी ने जितने भी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को दोषी पाया है मुख्यमंत्री ने सभी के ऊपर कड़ी कार्रवाई करते हुए संदेश दे दिया है कि जो हुआ सो हुआ, पर अब नहीं.
 
मुख्यमंत्री भले ही जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान अधिकारियों के कारण अंधेरे में रहे, पर प्रकाश सिंह की कमेटी के प्रकाश में उन्हें हर एक बिंदु साफ नजर आने लगा. यह भी साफ हो गया कि हाल फिलहाल के सबसे बड़े आर्मी डिप्लॉयमेंट के बाद भी जाट आंदोलनकारी कैसे अराजक हो चुके थे. गृह मंत्रालय ने भारतीय सेना के करीब चार हजार जवानों को जाट आंदोलन में हिंसा रोकने के लिए भेजा था. पर हरियाणा का हाल यह था कि प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें मूकदर्शक बना दिया. प्रकाश सिंह कमेटी ने कड़ी टिप्पणी में कहा है कि इतने जवानों के दम पर तो एक युद्ध जीता जा सकता था. 
 
हरियाणा सरकार ने अब जो कदम उठाए हैं उसकी चारों तरफ प्रशंसा हो रही है, क्योंकि अमूमन कोई भी सरकार एक साथ इतने अधिकारियों पर कार्रवाई करते नहीं देखी गई है. अपने इस सख्त कदम से मनोहर सरकार ने जनता में दोबारा विश्वास पाने का अभियान तो शुरू कर दिया है पर मंथन जरूर करना होगा कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां थीं जिसने सरकार को बैकफुट पर ला दिया. क्योंकि यह एक ऐसा मोड़ है जहां सरकार बिना किसी घोटाले, बिना किसी विवाद और बिना किसी भ्रष्टाचार के आरोप के बेहतर काम कर रही है. ऐसे में अगर दोबारा से ऐसी परिस्थितियों ने जन्म लिया तो प्रदेश की जनता को समझाना बहुत मुश्किल हो जाएगा.