मानव संघर्ष की शुरुआत से ही यह एक सुस्थापित तथ्य है कि सफलता के हजारों पिता होते हैं जबकि पराजय यतीम होती है, लेकिन अगर आप भूल गए हों तो भारतीय राजनीति हमेशा एक अनुस्मारक के रूप में सेवाएं देने के लिए उपलब्ध रहती है. 21 मई, दिन शनिवार, को राष्ट्रीय अखबार में एक दिलचस्प कहानी प्रकाशित हुई. यह कहानी अवश्य ही शुक्रवार को, अथवा कांग्रेस को बर्बाद करने वाले चुनाव परिणामों की घोषणा के एक दिन के अंदर लिखी गई होगी. कांग्रेस को उन दो राज्यों (केरल और असम) में करारी हार का सामना करना पड़ा है जहां ये सत्ता बरकरार रखने की उम्मीद कर रही थी. इसके अलावा कांग्रेस को बंगाल और तमिलनाडु में भी भारी पराजय का सामना करना पड़ा है जहां उसे सहयोगी दलों की सहायता से सत्ता में आने का पूरा भरोसा था. 
 
अपनी पहचान गुप्त रखने वाले ‘सूत्रों’ द्वारा लिखित यह कहानी दावा करती है कि कांग्रेस के उत्तराधिकारी और वास्तविक प्रमुख राहुल गांधी बंगाल में कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन बनाने को लेकर ‘अनिच्छुक’ थे. इसमें कहा गया है कि ममता बनर्जी के साथ उनके ‘घनिष्ठ संबंधों’ के कारण सोनिया गांधी भी बंगाल में चुनाव प्रचार करने के लिए समान रूप से ‘अनिच्छुक’ थीं. ‘सूत्रों’ द्वारा खुद की पहचान गुप्त बनाए रखना थोड़ा अजीब है क्योंकि यह कोई खोजी पत्रकारिता नहीं है, लेकिन खैर कोई बात नहीं. इस सब का यह मतलब है कि कांग्रेस के प्रभारी वंश की रक्षा करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वफादार बहाने को एकबार फिर से दोहराया गया है. 
 
निरर्थक व अनाप-शनाप बातें करना कांग्रेस का पुराना बहाना है. राहुल गांधी ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव जनरल सीताराम येचुरी की भागीदारी के साथ जादुई फार्मूले वाला ऐसा गठबंधन बनाने पर जोर दिया जो बंगाल से ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेंकेगा. अगर राहुल गांधी की यह रणनीति सफल हो गई होती तो यही कहानीकार राहुल गांधी को एक अतुल्य रणनीतिकार के रूप में वर्णित करते और उन्हें भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में वर्णित करते.
 
यह भी हो सकता था कि राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी पर पदोन्नत करने के लिए एक पखवाड़े के भीतर अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सत्र का आयोजन कराया जाता. राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान किसी तरह की अनिच्छा का प्रदर्शन नहीं किया. वह मंच पर पिछले मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य के साथ बेहद प्रसन्न दिखाई दिए और कांग्रेस ने बड़ी खुशी के साथ ममता बनर्जी को ‘भ्रष्ट’ व ‘अक्षम’ के रूप में वर्णित किया. समस्या यह नहीं कि निष्फलता का बहाना फर्जी है, बल्कि यह है कि कांग्रेस पार्टी असहाय रूप से इसे स्वीकार करती है. 
 
जीत और हार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनिवार्य अंग हैं, एक राजनीतिक पार्टी को जीत अथवा हार से अभिभूत नहीं होना चाहिए. एक जीत में भी उतने ही जोखिम निहित होते हैं जितने कि एक हार में. केवल एक अच्छी, पारदर्शी और ईमानदार सरकार ही जीत की समझदार प्रतिक्रिया है, जिसकी नीतियों से अधिक से अधिक संख्या में गरीब लाभान्वित हों. इस तथ्य से भली-भांति परिचित नेताओं को पुन: निर्वाचित किया जाएगा और इस तथ्य की अनदेखी करने वाले नेताओं को मतदाताओं द्वारा बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. 
 
पराजय केवल एक ही परिणाम की मांग करती है और वो है ईमानदारी. मुश्किल काम यह है कि आपका दूसरों के बजाय खुद के प्रति ईमानदार होना अधिक आवश्यक है. जैसा कि शेक्सपियर ने ध्यान दिलाया था कि ग्रह-नक्षत्र गलत नहीं होते बल्कि हम खुद गलत होते हैं. बेकार की बातों से काम नहीं चलने वाला, कुछ ठोस करके दिखाने की जरूरत है. आखिरकार, पार्टी का भला चाहने वाले दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांगे्रसी नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि उनकी पार्टी को ‘सर्जरी’ की जरूरत है, जिससे यह संकेत जाता है कि आप डिस्प्रिन की गोली खाकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को ठीक नहीं कर सकते. 
 
अगर कांग्रेसी नेता खुद के व पार्टी के प्रति ईमानदार होते तो उन्हें अपनी आंखों पर लगी पट्टी को हटाकर यह मान लेना चाहिए था कि पार्टी के उत्तराधिकारी या ‘शहजादे’ के तन पर योग्यता नाम के वस्त्र ही नहीं हैं. एक प्रसिद्ध कल्पित कहानी में ऐसा सच कहने का साहस केवल एक बच्चे के पास ही हो सकता है क्योंकि बच्चा न तो सम्राट का दास है और न ही वो भविष्य में अनुग्रह पाने का प्रयास करता है. कांग्रेसी नेता-सम्राट के पास तर्करहित तीखी नकारात्मकता के अलावा और कोई पहनावा ही नहीं है.
 
मतदाता वो देख सकते हैं जो कांग्रेस देखना नहीं चाहती. वे देख सकते हैं कि कांग्रेस संसदीय कार्यवाही बाधित कर अपने नेता के विशेष निर्देशों के तहत आम लागों की कीमत पर खुद को बढ़ावा देती है. जब आप राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाते हैं तो आप लोगों को घाव देते हैं, वही लोग जो विकास के लाभार्थी हैं. लोकतंत्र में विरोध के लिए वैध स्थान है और एक विपक्ष के बिना लोकतंत्र का वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है. लेकिन अनावश्यक व कटु विरोध की कोई जरूरत नहीं है. शालीनता और अच्छी तरह से व्यक्त वैकल्पिक आर्थिक मंच ही आगे बढ़ने के लिए एकमात्र रास्ता है लेकिन, भारतीय राजनीति में दोनों में से किसी एक की भी संभावना बनती दिखाई नहीं देती.
 
पराजय के तुरंत बाद काफी हंगामा मचेगा और मुखर समर्थक टेलीविजन पर यह बहस करते हुए दिखाई देंगे कि सम्राट कुछ भी गलत कर ही नहीं सकते. किसी उपयुक्त तिथि को, जब बारिश का पानी मौसम को ठंडा करेगा, आधे दिन तक चलने वाला अखिल भारतीय कांग्रेस समिति सत्र निरर्थक बहाने बनाने वाला एक ऐसा प्रस्ताव पारित करेगा जो हम पहले भी अनगिनत बार सुन चुके हैं. सम्राट अपने पुराने पहनावे का त्याग किए बिना अपनी गद्दी बरकरार रखना जारी रखेगा.
 
आप गलती करके एकबार तो बच निकल सकते हैं, और आप ज्यादा ही खुशकिस्मत हैं तो शायद दोबारा गलती करके बच निकलें. लेकिन एक ऐसा भी समय आता है जब कभी-कभार होने वाली गलतियां अक्सर दोहराई जाने लगती हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)