जैसा कि अक्सर कहा जाता है, ब्रिटिश राज का मुख्यालय कोलकता से दिल्ली में स्थानांतरित होने के बाद से भारत पर लंदन की पकड़ धीरे-धीरे ढीली होती चली गई. आगंतुकों के बीच मृतकों की कब्रों व स्मारकों के शहर के रूप में पहचाने वाले इस शहर ने अपने निवासियों पर एक दुर्गन्धित पकड़ बना ली ताकि साम्राज्यों के साथ-साथ प्रशासनों का क्षय सुनिश्चित किया जा सके, ऐसे माहौल में खराब प्रदर्शन एक मानक बन गया. इसके नागरिकों में से एक खिलाड़ी ओलंपिक मेडल जीतने के लिए नहीं बल्कि जीतने से चूकने के कारण लोकप्रिय है, जबकि एक पुलिसकर्मी का नाम आतंकवादियों को मार गिराने अथवा उन्हें पकड़ने के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा गंभीर रूप से घायल होने के कारण विख्यात है. 
 
ये महात्मा गांधी के राजनीतिक भाग्य की खुशनसीबी थी कि उन्होंने राजधानी में अधिक समय व्यतीत नहीं किया, अगर वह कभी राजधानी आते भी तो उनके दौरे का मकसद केवल ब्रिटिश कुलीन वर्ग के सदस्यों व वायसराय के साथ मुलाकात करना होता था और ऐसे मौकों पर उनका साथ देने के लिए जवाहरलाल नेहरू हरदम उनके साथ मौजूद रहते थे. अगर एक पिता द्वारा अपने पुत्र के लिए सर्वाधिक प्रयास करने की वैश्विक प्रतियोगिता होती तो निसंदेह मोतीलाल नेहरू उस प्रतियोगिता के विजेता होते क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी के सामने अपने पुत्र को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए. इसके विपरीत हमारे राष्ट्रपिता अपनी संतान के प्रति शायद ही कभी चिंतित दिखाई देते थे.
 
उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनकी संतान को उनकी जय-जयकार के कारण आमतौर पर मिलने वाले विशेषाधिकार कभी प्राप्त न हों. महात्मा ने इस विशेषता का इतनी सख्ती से पालन किया कि उनका सबसे बड़ा पुत्र हरिलाल गांधी मुंबई के एक सार्वजनिक अस्पताल में एक भिखारी की मौत मरा. हालांकि, महात्मा गांधी ने खुद द्वारा लंदन में शिक्षा की थी, लेकिन अपनी संतान को विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए भेजने वाले आधुनिक भारत के नेताओं के विपरीत उन्होंने अपने पुत्र को विदेश में शिक्षा ग्रहण करने से वंचित रखा. 
 
जिन लोगों ने तालिबान के नियंत्रण के समय अफगानिस्तान का दौरा किया है अथवा 2011 के बाद लीबिया या सीरिया में प्रवेश करने में समर्थ रहे हैं, वे स्थानीय डाकुओं द्वारा यात्रियों से धन उगाही के लिए मार्ग में कदम-कदम पर लगाए जाने वाले नाकों से भली-भांति परिचित हैं. लुटियन की दिल्ली में भी ठीक इसी सिद्धांत की अनुपालना की जाती है, प्रशासकीय तंत्र में हर कदम पर बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं और हर बाधा को पार करने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है. जितनी बड़ी बाधा उत्पन्न करने की क्षमता होगी, उतनी ही बड़ी रिश्वत की रकम वसूलने की संभावनाएं बनेंगी. पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल इस तरह की शासन प्रणाली के दो आधुनिक चैंपियन हैं. 2004 से लेकर 2014 के यूपीए शासनकाल के दौरान इन दोनों द्वारा शुरू किए गए नियम-कानूनों को अभी भी जारी रखा जा रहा है और कुछ मामलों में तो उनमें सुधार भी किया गया है.
 
परिसर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी रणक्षेत्र में कदम रखने से थोड़ा कम जोखिमपूर्ण बन गया है. इस संबंध में जेएनयू ने कैंपस में ‘साइलेंस इज गोल्डन’ का नियम लागू करके यह सुनिश्चित किया है कि कैंपस के भीतर विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बजाय उन विचारों को गोपनीय रखा जाएगा और अब, व्यक्तिगत व्यवहार के कुछ रूपों पर औपनिवेशिक युगीन निषेधों को समाप्त करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अपमानसूचक’ भाषण के अपराधीकरण का समर्थन किया है. 
 
भारत में नौकरशाही की भूलभुलैया को जवाहरलाल नेहरू और उनके अधिकांश उत्तराधिकारियों द्वारा निर्मित अवरुद्ध मार्ग के बजाय एक नीतिगत राजमार्ग में परिवर्तित किए जाने की जरूरत है, और इसका अर्थ और अधिक नहीं बल्कि कम कानून और नियमों को लागू करना व अनावश्यक कानूनों को रद्दी की टोकरी में फेंकना है. अंग्रेजों ने भारत में नवाचार और उद्योग का गला घोंटने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, और उनके सभी दृष्टिकोण व नियंत्रण तंत्र 21वीं सदी के दूसरे दशक में भी व्यावहारिक रूप से कार्यशील बने हुए हैं.
 
रूसी क्रांति के नेता व सोवियत संघ के सर्वप्रथम प्रमुख लेनिन ने कहा था कि रूसी तानशाह जोसेफ स्टालिन से ‘कम, लेकिन बेहतर नियंत्रण’ की जरूरत है. न्यूनतम सरकार के लिए सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्ध सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू व उनके उत्तराधिकारियों द्वारा संरक्षित ब्रिटिशकालीन अतीत की विरासत और प्रथाओं को जारी रखने वाले राजधानी स्थित विभिन्न मंत्रालयों के बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा जा सकता है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)