पहले दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद और तत्पश्चात उनकी पुत्री महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर में एक स्थिर गठबंधन सरकार की स्थापना नरेंद्र मोदी सरकार की एक ऐसी बड़ी सफलता रही है जिसे हमारे कूटनीतिक विश्लेषकों से उतनी प्रशंसा नहीं मिली जिसकी वो हकदार थी. इस उपद्रवी राज्य की सरकार में एक राष्ट्रवादी अखिल भारतीय पार्टी का पहली बार एक महत्वपूर्ण भूमिका में होना भारत के लिए अहम मायने रखता है और यह कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ही उल्लेखनीय प्रगति का संकेत है. 
 
मुझे 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों का समय अब भी याद है जब यह राज्य सीमापार से पाकिस्तानी आईएसआई द्वारा उत्तेजित अलगाववादी हिंसा की आग में जल रहा था. अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी सशस्त्र अभियान में मिली सफलता से उत्साहित पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस्लाम के नाम पर विध्वंस के विकल्प को चुना. पाकिस्तान ने भारत में सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के लिए बड़ी संख्या में घाटी में मुजाहिद्दीनों को भेजा और भारत-नेपाल व भारत-बांगलादेश की असुरक्षित सीमाओं से उग्रवादियों और एजेंटों को भेजकर भारत के खिलाफ सीमापार आतंकवाद को एक विस्तृत ‘छद्म युद्ध’ का रूप दिया. 
 
हिंसा के इस्तेमाल से कश्मीर पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की पाकिस्तान की योजना उसके इस विश्वास में निहित थी कि उस समय उसे इस मुद्दे पर अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त था. सांप्रदायिक मार्ग के माध्यम से कश्मीर में परिणाम तलाशने का पाकिस्तान का हताशापूर्ण प्रयास सफल नहीं हुआ है. तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने स्वायत्तता की बात की थी और तनाव को कम करने के लिए हुर्रियत के नेताओं के साथ अनौपचारिक बातचीत की अनुमति भी दी, लेकिन राज्य पुलिस के यथोचित समर्थन के साथ केंद्रीय बलों द्वारा संचालित आतंकवाद-विरोधी अभियानों की प्रभावकारिता ने अंतत: पाकिस्तानी आक्रमण को नाकाम कर दिया.
 
पाकिस्तान समर्थित अलगावादियों द्वारा उत्पन्न बढ़े हुए तनाव के बीच 1996 में हुए विधानसभा चुनाव ने राज्य को लोकतंत्र और देश के शेष हिस्सों के साथ एकीकरण के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर कर दिया. यह अफसोस की बात है कि घाटी के क्षेत्रीय दल राज्य में खुद की राजनीतिक शक्ति को मजबूत करने के लिए हुर्रियत को तृष्ट करने के प्रलोभन में आ जाते हैं. इन दलों ने कश्मीर के लिए ‘त्रिपक्षीय’ समाधान की आवश्यकता पर जोर देने वाले गौण अलगाववादियों के प्रति दिखावटी प्रेम का प्रदर्शन जारी रखा है. 
 
2014 के विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद गठित भाजपा-पीडीपी गठबंधन ने भाजपा के लिए भविष्य में राज्य में महत्वूपर्ण खिलाड़ी बनना संभव बना दिया है. इसी बीच, एनआईटी श्रीनगर और हिंदवाड़ा में पाकिस्तानी एजेंटों द्वारा भड़काया गया उपद्रव भारत-पाकिस्तान वार्ता में कश्मीर को एजेंडे के शीर्ष पर लाने के लिए पाकिस्तान के नए सिरे से प्रयास का प्रतीक है. गौरतलब है कि भारत दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता में हमेशा से आतंकवाद को प्रमुख मुद्दा बनाए जाने पर जोर देता रहा है. भाजपा-पीडीपी गठबंधन द्वारा जम्मू-कश्मीर के लोगों के मानव विकास सूचकांक को सुधारने के लिए कार्य करते रहना बेहद जरूरी है. आस्था-आधारित आतंकवाद के वैश्विक केंद्र के रूप में पाकिस्तान का धुंधला पहलू अब धीरे-धीरे सारी दुनिया के सामने उजागर हो रहा है, और यह हकीकत राज्य में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को कठिनाई में डालेगी. 
 
यह जरूरी है कि राज्य के लिए विकास परियोजनाओं के साथ तेजी से आगे बढ़ा जाए, आसूचना आधारित आतंकवाद विरोधी अभियानों को जारी रखा जाए, और शेष भारत के साथ कश्मीरियों के आर्थिक और सांस्कृतिक एकीकरण को इस तरीके से प्रोत्साहित किया जाए जो पुराने कश्मीर के हिंदू-मुसलमान संरचना पर जोर दें. जिला प्रशासन का संचालन कर रहे अधिकारियों को लोगों के लिए सेवाएं व प्रतिपादन सुधारने के लिए उपयुक्त उन्मुखीकरण दिया जाना चाहिए. 
 
राज्य पुलिस को राष्ट्र-विरोधी तत्वों का पता लगाने और सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम (अफस्पा) के कार्यान्वयन में मदद करने में अपनी वैध भूमिका जरूर निभानी चाहिए. जहां आवश्यक हो, संविधान के अनुच्छेद-311 की मदद से प्रशासनिक व पुलिस मशीनरी में कार्यरत भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने में कतई हिचकना नहीं चाहिए.
 
राष्ट्रीय सुरक्षा के संचालन पर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक प्रबंधन का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है. राजनीति के विपरीत, राष्ट्रीय सुरक्षा के कार्यक्षेत्र में युक्तियों को कभी भी सामरिक उद्देश्यों पर प्राथमिकता नहीं दी जाती. पीडीपी व भाजपा के बीच गठबंधन व्यवस्थाओं पर बातचीत के दौरान सामरिक उद्देश्य को प्रमुखता के साथ रखने के लिए कश्मीर में केंद्र के वार्ताकार राम माधव को श्रेय दिया जाना चाहिए. जहां एकतरफ राज्य सरकार की जवाबदेही राज्य की जनता को है, वहीं दूसरी ओर कश्मीर पर राजनीतिक विवाद का संचालन पूरी तरह से केंद्र की जिम्मेदारी है. राम माधव ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे में गठबंधन को शामिल नहीं किया, लेकिन यह सुनिश्चित किया कि गठबंधन का एजेंडा इस विषय पर चर्चा को अवरुद्ध न करे. 
 
भारत के लोग पीडीपी नेतृत्व वाली सरकार से सीमापार आतंकवाद को   नाकाम करने में केंद्र के साथ पूरी तरह से तालमेल रखने के साथ-साथ पाक अधिकृत कश्मीर के मामलों में पाकिस्तान से सवाल पूछने की उम्मीद भी रखते हैं. गौरतलब है कि पाकिस्तान ने भू-राजनीतिक षड्यंत्र के तहत अविभाजित जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र पर चीनी अतिक्रमण की अनुमति दी है. राज्य में गठबंधन भागीदार के रूप में भाजपा की सफलता का वास्तव में यही मापदंड होगा. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)