प्रशासकीय व्यवस्था की बात करें तो परामर्श घुसपैठ का दूसरा नाम भर है. एक समय था जब भारतीय शासन व्यवस्था को कष्ट देने वाली सभी बीमारियों के लिए ‘विदेशी’ को सबसे प्रभावशाली रामबाण समझा जाता था. लेकिन इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक अलग राय रखते हैं, वह विभिन्न मंत्रालयों में विदेशी संबंध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को एक कपटी एवं धूर्त रसूखदार के रूप में देखते हैं. गत सप्ताह स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय से मिले दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर परामर्श देने वाले 150 से अधिक सलाहकारों की छंटनी का कार्य शुरू कर दिया. उनमें से अधिकांश कई वर्षों से सरकार में काम कर रहे हैं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन व बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक संगठनों द्वारा उदारता के साथ वित्तपोषित किए जा रहे हैं. इनमें से परामर्शदाताओं की एक बड़ी संख्या ऐसे कार्यक्रमों में शामिल रही है जो भारत में एचआईवी/एड्स और तपेदिक के प्रसार पर निगरानी रखते हैं. सबसे पहले स्वास्थ्य मंत्रालय के भीतर विदेशी प्रभाव का सफाया करने के नरेंद्र मोदी के निर्णय ने एक ऐसी सुगठित प्रणाली को व्याकुल और नष्ट कर दिया है जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करती है और जिसके अंतिम लाभार्थी इसके वित्तदाता हैं.
 
प्रधानमंत्री भले ही इन्वेस्ट इन इंडिया और मेक इन इंडिया की बात करते हों, लेकिन वह केवल उन्हीं लोगों से परामर्श लेने का इरादा रखते हैं जो केवल भारत के हितों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 23 माह के दौरान अपने किसी भी पूर्ववर्ती की तुलना में 7 रेसकोर्स रोड पर सबसे अधिक संख्या में विदेशी उद्यमियों, पेशेवरों और विभिन्न क्षेत्र से संबंधित दिग्गजों अन्य का स्वागत किया है. इसके बावजूद वह विदेश-शिक्षित सलाहकारों अथवा विशेषज्ञों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने से परहेज करते आ रहे हैं. 
 
प्रधानमंत्री ऐसे गैर-सरकारी संगठनों व अन्य परामर्श एजेंसियों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं जिन्हें विदेशों से वित्तीय सहायता प्राप्त होती है और जो सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर विभिन्न मंत्रालयों को परामर्श दे रहे थे. प्रधानमंत्री ने गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और रॉ में अपने भरोसेमंद अधिकारियों को सरकार के भीतर पैठ बनाने वाले 100 से अधिक संगठनों की भूमिका की समीक्षा करने के निर्देश दिए. सूत्रों के अनुसार, विदेश-प्रायोजित सलाहकार न केवल वैश्विक सेमिनारों और सम्मेलनों में उनकी भागीदारी के माध्यम से, बल्कि भारत में शोध-आधारित विभिन्न्न गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से भी अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को डेटा और विशेष जानकारी उपलब्ध करा रहे थे. इनमें से कुछ व्यक्तिय एवं संगठन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से ऐसे लोगों के साथ भी मिले हुए थे जो 2002 से मोदी को विभिन्न मुद्दों पर घेरते आ रहे हैं. और तो और, इन निकायों के प्रमुख अधिकारियों ने अमेरिका व अन्य देशों में मोदी को वीजा देने से इनकार करने की हिमायत भी की थी.
 
अब सरकार ने विशेष जांच के लिए विदेशी संपर्क रखने वाले अथवा विदेशों से वित्तपोषित 700 से अधिक सलाहकारों की सूची तैयार की है जो ऊर्जा, वित्त, पर्यावरण, शिक्षा, नीति आयोग, सड़क एवं परिवहन, कृषि, गैर-परंपरागत ऊर्जा, खनन, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस व रक्षा उत्पादन जैसे मंत्रालयों के साथ काम कर रहे थे. प्रधानमंत्री कार्यालय इस बात को आश्वस्त है कि इन्हीं सलाहकार एजेंसियों द्वारा उत्पन्न जटिलताओं के कारण अधिकांश विकास एवं आधारभूत संरचना परियोजनाओं के कार्यान्वन में विलंब हुआ है. उदाहरण के लिए, 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान 1990 तक भारत को पेट्रोलियम उत्पादों में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने का खाका तैयार किया गया था, लेकिन 35 वर्ष बाद भी भारत कच्चे तेल के आयात में करोड़ों डॉलर खर्च करता है. भले ही स्वास्थ्य मंत्रालय के पास सबसे अधिक संख्या में विदेशी सलाहकार हैं, तब भी भारत अधिकतम रोगों से ग्रस्त है और अक्षम स्वास्थ्य प्रशासन के तहत डगमगा रहा है. प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मंत्रालय पदों की अनेक समीक्षाओं में से एक  के दौरान पाया गया कि बाहरी विशेषज्ञ अपनी संविदात्मक मियाद पूरी होने के बाद भी अपने-अपने पदों पर बने हुए थे. इसके बाद यह फैसला लिया गया कि गृहमंत्रालय उनमें से प्रत्येक की गहन समीक्षा करेगा.
 
मंत्रालय ने बाद में संकेत दिया कि इन सलाहकारों में से अधिकांश मंत्रियों और नौकरशाहों की आवश्यकता अनुसार अपनी रिपोर्ट बना रहे हैं ताकि नीतियों को इस ढंग से प्रभावित किया जा सके कि उनकी अभिभावक कंपनियों के व्यावसायिक हितों को बढ़ावा मिले. उदाहरण के लिए, सरकार को संदेह है कि इन एजेंसियों द्वारा भारत में एचआईवी/एड्स संक्रमित आबादी की संख्या को न केवल भारत सरकार से अधिक धनराशि प्राप्त करने के लिए जानबूझ बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया बल्कि इसलिए भी ताकि एड्स का इलाज करने वाली विशिष्ट दवा-निर्माता कंपनियों की मदद की जा सके. स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और समावेशी शिक्षा के क्षेत्रों में भारत की नकरात्मक छवि को उलटने में इन सलाहकारों की   असमर्थता ने भी मोदी सरकार को खफा किया.
 
हकीकत यह है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व स्वतंत्रता के बाद से हीन भावना से ग्रस्त रहा है. चूंकि नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने तीव्र आर्थिक विकास के लिए खाका बनाने को अपना लक्ष्य रखा, उन्होंने सरकार की मदद करने के लिए बड़ी संख्या में अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों को शामिल किया. वित्त मंत्रालय हमेशा से विदेशी शिक्षित अर्थशास्त्रियों के लिए पसंदीदा गंतव्य रहा है. इसके लगभग सभी मुख्य आर्थिक सलाहकार अपने करियर में किसी न किसी मोड़ पर विदेशी संस्थाओं में सेवाएं दे चुके हैं. 
 
कई सांसदों और अन्यों ने भारत की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों पर इनके अवांछित प्रभाव पर सवाल खड़े किए हैं. सरकार और अन्य संस्थानों से विदेशी तत्वों का जारी सफाया मोदी सरकार के राष्ट्रवादी एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होता है. उनका संदेश ज्ञानपूर्ण और जोरदार है, ‘जब तक आप सरकार में हैं, भारत के लिए कार्य करें और समृद्ध भारत की कल्पना करें.’