आपने नासिक में गोदावरी तट पर मौजूद पवित्र रामकुंड के बारे में तो जरूर सुना होगा.ऐसी मान्यता है कि वनवास के दौरान राम और सीता ने यहीं स्नान किया था.हर साल यहां गुड़ी पड़वा पर्व के मौके पर हजारों श्रद्धालु पवित्र डुबकी के लिए यहां जुटते हैं.गोदावरी तट पर स्थित होने के कारण कभी ऐसा नहीं हुआ कि इस कुंड में पानी न हो.इस साल यह कुंड पूरी तरह सूख गया.हालात यह हुए कि नासिक नगर पालिका ने टैंकर्स से पानी मंगवाकर रामकुंड को लबालब भरा, ताकि श्रद्धालुओं की भक्ति में कोई कमी न रहे.इस वक्त महाराष्ट्र का एक बड़ा इलाका पानी के लिए त्राहिमाम कर रहा है.ऐसे में तो अच्छा होता कि रामकुंड को खाली ही छोड़ दिया जाता, ताकि हजारों लोगों के पास यह मैसेज तो जरूर पहुंचता कि आज नहीं संभले तो आने वाला वक्त और भी बुरा गुजरेगा.आज डुबकी लगाने को टैंकर से पानी भरने की नौबत आ गई कल हो सकता है यह टैंकर भी न हो.मंथन का वक्त है कि हम पानी के लिए कितना गंभीर हैं.

इस वक्त देश के करीब 12 राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं.इनमें से दस राज्य तो ऐसे हैं जहां किसानों की हालत सबसे अधिक खराब है.आजाद भारत में ऐसा पहली बार है कि गर्मी की शुरुआत से ही एक साथ इतने राज्यों की हालत खराब है.धीरे-धीरे यह बद से बदतर ही होती जाएगी.ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जो फटकार लगाई है उसके कई मायने हैं.कोर्ट ने केंद्र की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं.केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों ने जो रवैया अपनाया है वह भी अपने आप में काफी गंभीर सवाल पैदा करता है.बिहार, हरियाणा और गुजरात सरकार ने तो हद ही कर दी.वे सूखे के हालात पर सही तथ्य भी पेश नहीं कर सके, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि क्या आप यहां पिकनिक मनाने आते हैं.

मौसम विभाग ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य से कम बारिश होने की स्थिति में इस बार स्थिति गंभीर रहेगी.सूखे से सबसे अधिक प्रभावित गरीब वर्ग और किसान है.पूरे देश से खबरें आ रही हैं.सूखे की सबसे अधिक मार महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, कर्नाटक आदि राज्यों में है.कर्नाटक में तो स्थिति यह है कि कृष्ण सागर बांध ही सूख गया है.कई राज्यों में पहली बार पानी का गंभीर संकट सामने आया है, जबकि मराठवाड़ा में तो यह स्थिति पिछले करीब पांच सालों से है.यहां पानी बंटने के कई प्वाइंट्स निर्धारित हैं, जहां लंबे समय से धारा-144 लगी हुई है.

हाल ही में केंद्रीय जल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश भर के जलाशयों में पानी की भारी कमी रिकॉर्ड की गई है.ऐसे में गंभीर संकट की तरफ इशारा है.आंकड़ों के अनुसार देश के 91 प्रमुख जलाशयों में मार्च के अंत तक उनकी कुल क्षमता के 25 फीसदी के बराबर ही पानी बचा था. महाराष्ट्र में तो यह आंकड़ा सिर्फ 21 फीसदी ही है.अदालतें लगातार अपनी सख्त टिप्पणियों से सरकारों का ध्यान पानी की गंभीर समस्याओं की तरफ दिला रही हैं.एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सहित कई राज्यों को फटकार लगाई है, वहीं दूसरी तरफ बांबे हाईकोर्ट ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए पानी की बर्बादी को आपराधिक बर्बादी माना है.वहां एक जनहित याचिका में बताया गया है कि महाराष्ट्र में तीन जगहों मुंबई, नागपुर और पुणे में आईपीएएल के बीस मैच प्रस्तावित हैं.ऐसे में पिच और मैदान की देखरेख में करीब 65 लाख लीटर पानी खर्च होगा.सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि जो राज्य लगातार तीन साल से सूखे की मार झेल रहा है वहां पानी की इस तरह की बर्बादी कहां तक जायज है.
पानी की कहानी सिर्फ आईपीएल या सूखे तक ही सीमित नहीं है.कई राज्य ऐसे हैं जहां भरपूर पानी है, लेकिन वे उसकी कद्र करना नहीं जान रहे हैं.ऐसे में इस बार का सूखा उन राज्यों के लिए आईना दिखाने के लिए काफी है.

बचपन से ही हम पानी के लिए युद्ध की बातें सुनते आ रहे हैं.कहा जाता रहा है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा.पर भारत के अंदर विभिन्न राज्यों में पानी के लिए जिस तरह खींचतान चल रही है उससे स्थिति की भयावता का अंदाजा लगाया जा सकता है.पंजाब को पांच नदियों का संगम माना जाता है, पर जिस तरह पानी के लिए वह अपने पड़ोसी राज्य हरियाणा से लड़ने की स्थिति में है वह भी पानी के लिए होने वाले गृह युद्ध की तरफ इशारा कर रहा है.कर्नाटक में हम यह हाल काफी पहले से देखते आए हैं.

अच्छा हुआ कि पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने सूखे के एक सवाल के जवाब में कहा कि सूखा पड़ना उनके हाथ में नहीं है.यह जवाब इतना स्पष्ट है कि हमें मंथन करने की जरूरत है कि सब कुछ हम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं.पानी को सहेजना हमारी भी जिम्मेदारी है.हमें भी प्रयास करना होगा.हर बार हम मानसून के भरोसे नहीं रह सकते हैं.हमें चीन, जापान सहित कई एशियाई देशों से आधुनिक तकनीक सीखने के साथ यह भी सीखने की जरूरत है कि ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने के लिए वहां की सरकार ने क्या सख्त कदम उठाए हैं.साथ ही रेन वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए क्या-क्या किया जा रहा है.फिलहाल   भारत सरकार से यह भी पूछने में हर्ज नहीं है कि चुनावी घोषणा पत्र में प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का जो जिक्र किया गया था उसकी प्रगति कितनी है.साथ ही क्यों हर बार केंद्र सरकार को सर्वोच्च अदालत की फटकार के बाद याद आता है कि राज्यों की मदद के लिए उन्हें बजट भी जारी करना है.फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद शनिवार को ही केंद्र सरकार ने मनरेगा स्कीम के लिए 12,230 करोड़ रुपए जारी कर दिए हैं.