धार्मिक एकांतिकता और सर्वोच्चता ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अवधारणा के सर्वथा विपरीत है, जो विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच भेदभाव के अभाव के अपने मार्गदर्शक सिद्धांत पर अडिग है. जिन समाज और क्षेत्रों में एक विशेष धर्म से संबंध रखने वाले लोगों को राज्य की नीति के जरिए दूसरों के मुकाबले अधिक लाभ दिया जाता है, वे धर्मनिरपेक्ष-विरोधी हैं और उनका भंडाफोड़ किए जाने की जरूरत है. भारत में ‘धर्मनिरपेक्ष मूल्यों’ और ‘धर्मनिरपेक्ष पहचान’ निरंतर रूप से चर्चा का विषय रहे हैं. भारत में टिप्पणीकारों का एक ऐसा विशाल समूह मौजूद है जो हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अथवा कल्पित शत्रुओं से रक्षा करने को अपना परम कर्तव्य समझते हैं. हालांकि, इस समूह के कुछ सदस्यों ने भारत के एक ऐसे राज्य को देखा है जहां धर्मनिरपेक्षता अपनी अंतिम सांसे गिन रही है. यह राज्य है जम्मू-कश्मीर का, और कश्मीर घाटी में विशेष रूप से 1990 के बाद से न केवल वहाबी प्रभाव लगातार बढ़ता गया है बल्कि जम्मू-कश्मीर में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों की सार्थकता भी निरंतर रूप से घटती चली गई है.
 
राज्य में शेष बचे चुनिंदा अल्पसंख्यकों को अपने जीवन का भय हमेशा सताता है और वे अपनी धार्मिक पहचान छुपाने का प्रयास करते हैं ताकि किसी जानलेवा सांप्रदायिक हमले का निशाना बनने से बच सकें. राज्य में मुख्य अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित सभी उपासना गृहों को लगभग नष्ट कर दिया गया है और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों की रक्षा करने का दम भरने वाले इस पर चुप्पी साधे हुए हैं. न ही भारत में और न ही विदेशों में इस तथ्य का सरसरी तौर पर जिक्र किया जाता कि संघ के प्रमुख राज्य में पिछले चार दशकों से गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को नियमितता के साथ नष्ट किया जाता रहा है. 
 
श्रीनगर स्थित एनआईटी कैंपस में जो कुछ भी हुआ वो जेएनयू कैंपस में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की तरह ही खेदजनक है, जब बीएस बस्सी ने कन्हैया कुमार को उसके भाषण में चंद उत्तेजक टिप्पणियों के लिए जेल भेजकर उसे अंतरराष्ट्रीय नायक बनाने का फैसला किया. लेकिन, एनआईटी कैंपस में पुलिस द्वारा जिस बर्बरता के साथ निर्दोष छात्रों को पीटा गया, उसे लेकर कन्हैया कुमार के विरोधी अथवा हिमायती वर्ग में से कोई भी बिल्कुल भी मुखर नहीं रहा है. उनका ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने भारतीय तिरंगा फहराया था. यहां जिस प्रश्न का उत्तर दिया जाना आवश्यक है वो ये कि क्या जम्मू-कश्मीर की पुलिस स्वयं को पाकिस्तान में या फिर भारत में समझती है, क्योंकि अगर उन्हें मालूम होता कि वे भारत में हैं तो उनके द्वारा छात्रों को महज तिरंगा फहराने के लिए निर्दयता से पीटना किसी की भी समझ से बाहर है.
 
2004 में नवीन जिंदल द्वारा भारतीय तिरंगा फहराने के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृत कराने के बाद से राष्ट्रीय ध्वज फहराना प्रत्येक भारतीय नागरिक का अधिकार है. एनआईटी श्रीनगर में तिरंगा फहराने वाले छात्रों को पीटने वाले पुलिस कर्मियों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. भाजपा की साझेदारी वाली जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से ऐसी कायरता के प्रदर्शन से घाटी में वहाबी तत्वों का राज्य में धर्मनिरपेक्षता-विरोधी लोकाचार व संस्कृति उत्पन्न करने का हौसला बढ़ेगा. इस राज्य में वहाबी जितने अधिक शक्तिशाली बनेंगे, शेष विश्व के लिए ज्ञान व पयर्टन केंद्र बनने की इसकी अपार क्षमता को साकार करने की संभावनाएं उतनी ही कम हो जाएंगी. कश्मीर के लोगों के बौद्धिक गुणों के कारण वैश्विक अनुसंधान एवं विकास केंद्रों को संभवत: राज्य भर में स्थापित किया जा सकता है, जिससे यह सूचना-प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाओं का केंद्र बन सकता है.
 
 मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अक्सर दिल्ली का दौरा करती रहती हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि उनका अधिकांश समय केंद्र सरकार से राज्य के लिए रियायतें और कर्ज मांगने में व्यय होता है. जम्मू-क श्मीर के स्वाभिमानी लोगों को चंदा नहीं बल्कि अपना जीवन सुधारने के लिए उचित अवसर चाहिए और ऐसा केवल तभी हो सकता है जब धर्मनिरपेक्षता एकबार फिर राज्य में जीवनशैली की प्रमुख पसंद बन जाए. एक नागरिक का धर्म चाहे कोई भी हो, वह राज्य से समान अधिकारों व व्यवहार का पात्र है.
 
 राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों में भर्तियों और पदोन्नति के मामलों सहित धर्म के आधार पर शून्य भेदभाव की स्थिति होनी चाहिए. कश्मीर के लोगों में कश्मीरियत की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है और यह इंसानियत की भावना से भिन्न नहीं है. हालांकि, विशेष रूप से 1990 के बाद, इस कुलीन संस्कृति का स्थान राज्य में समाज के महत्वपूर्ण वर्गों में वहाबीवाद की बढ़ती हुई स्वीकार्यता ने ले लिया है. इसका असर कश्मीर घाटी में विशेष रूप से देखा व महसूस किया जा सकता है. वैश्विक रूप से देखा जाए तो वहाबीवाद के खिलाफ प्रतिक्रिया मुख्य रूप से इसलिए देखी जा रही है क्योंकि अलगाववादी और उच्चवादी विचारधारा के प्रति निष्ठा रखने कई समूहों ने बर्बर हिंसा का मार्ग अपना लिया है. उनकी बर्बरता 1932 से लेकर 1945 तक जर्मनी में नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी की क्रूरता से मिलती जुलती है.
 
 पिछले कुछ महीनों में बहुत लंबे समय में ऐसा पहली बार देखने को मिला है कि कश्मीर के विभिन्न   हिस्सों में पाकिस्तानी ध्वजों की भरमार देखने को मिल रही है और 1990 के बाद से पहली बार देखने को मिल रहा है कि पाक-प्रशिक्षित आतंकवादियों के दाह-संस्कार में दर्जन भर नहीं बल्कि सैंकड़ों की तादाद में स्थानीय नागरिक शामिल हो रहे हैं. ये सामाजिक स्वास्थ्य में सुधार के संकेत नहीं हैं. इससे पहले कि समस्याएं अधिक विकराल रूप धारण करें, कश्मीर में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षकों को सक्रिय होना होगा ताकि राज्य में चल रहे वहाबी आवेग के प्रवाह के स्थान पर कश्मीरी लोगों की पारंपरिक भावना के कहीं अधिक करीब संयमित सिद्धांतों को प्रबल किया जाए.
 
(ये वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)