ऐसे समय पर जब पाकिस्तानी जांच एजेंसी के उच्चस्तरीय अधिकारियों की एक टीम ने हाल ही में पठानकोट एयरबेस का दौरा किया है, अफगानिस्तान में भारतीय भूमिका पर भारत व अमेरिका के दृष्टिकोण में अंतर और इशरत जहां मामले द्वारा उत्पन्न विवादों के साथ भारत-पाकिस्तान वार्ता की बहाली के लिए रखे जाने वाली शर्तों की अनिश्चितता ने राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन को सार्वजनिक जांच के दायरे में डाल दिया है.
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच उफा में हुई बैठक के बाद दोनों देशों के बीच एनएसए स्तरीय बातचीत का दौर जाहिर तौर पर भारतीय सुरक्षा के लिए दशकों से प्रमुख खतरा बन चुके सीमा पार आतंकवाद के संबंध में पाकिस्तान द्वारा उसकी अपनी जवाबदेही की अभिस्वीकृति सुरक्षित करने के इर्द-गिर्द केंद्रित किया गया है.भारत ने पाकिस्तान द्वारा उसके संयुक्त जांच दल (जेआईटी) को पठानकोट एयरबेस का दौरा करने की अनुमति देने की मांग को स्वीकार किया ताकि एयरबेस पर हुए आतंकी हमले की जांच को सुगम बनाया जा सके. चूंकि, पाकिस्तान से आए जांच दल में एक उच्चस्तरीय आईएसआई अधिकारी भी शामिल था, पाकिस्तानी जांच दल के दौरे ने राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया और यहां तक कि विपक्ष द्वारा सरकार पर आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के समक्ष ‘घुटने टेकने’ का आरोप भी लगाया गया.
 
भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा पठानकोट हमले में आईएसआई का हाथ साबित करने की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान द्वारा संयुक्त जांच दल में आईएसआई के प्रतिनिधि को शामिल करना बेशक थोड़ा अजीब जरूर है.यह पाकिस्तान के उस तर्क को मजबूती प्रदान करता है कि भारत पर हुए आतंकी हमले पूरी तरह से ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’ की देन हैं और पाकिस्तान खुद भारत की तरह आतंकवाद पीड़ित राष्ट्र है.अगर मोदी सरकार भी अपनी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा हवाना में पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर ‘सहभाजित पीड़ित’ राष्ट्र का दर्जा देने वाली पंक्ति को मान्यता देती है तो यह पूरी तरह से हैरान कर देने वाला कदम होगा.
 
हम यह मानना चाहेंगे कि पाकिस्तानी संयुक्त जांच दल का दौरा भारत-पाक वार्ता में आतंकवाद को अनिवार्य रूप से प्रमुख मुद्दा बनाने के हमारे घोषित रुख पर समझौता किए बिना पाकिस्तान को उसकी नेकनीयती दिखाने के लिए दिए गए अवसर की भारतीय रणनीति का हिस्सा था. जब तक भारतीय संयुक्त विशेष जांच दल हमारे प्रमाणों के साथ आगंतुक दल पर अभिभावी रहता है और मसूद अजहर से पठानकोट मामले के संदर्भ में पूछताछ करने के लिए भारतीय जांचकर्ताओं के पारस्परिक दौरे के लिए दबाव डालता है, तब तक पाकिस्तानी जांच दल के गठन से भारत को कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
लेकिन, जैसा कि मौजूदा हालात बयां करते हैं, पाकिस्तानी सेना द्वारा उसके नागरिक प्रतिनिधियों को भारत-पाक वार्ता के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिया जाना और सीमा-पार आतंकवाद में किसी भी तरह की भूमिका होने से साफ इंकार करना जारी है. पाकिस्तानी सेना एजेंडे पर कश्मीर के मुद्दे को रखने के लिए विस्तृत वार्ता की बहाली चाहती है.पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित द्वारा पाकिस्तान दिवस के जश्न में हुर्रियत नेताओं को आमंत्रित करने का परिचित कृत्य कश्मीर मुद्दे को अप्रत्यक्ष रूप से एजेंडे में शामिल करने का चतुर प्रयास था.पूर्व में हाशिए पर डाल दिए गए अलगावादियों के स्वर एकबार फिर आक्रामक हो गए हैं और कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार द्वारा उन पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है.
 
भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैया कई कारकों के संयोजन से निर्धारित होता है जैसे कि बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के बाद से भारत के खिलाफ प्रबल शत्रुता का नया स्तर, पाकिस्तानी समाज के कई वर्गों पर इस्लाम की मजबूत होती पकड़ और पाकिस्तानी सेना का यह सहज विश्वास कि अमेरिका उसके पक्ष में है.भारत की अफगानिस्तान पर विदेश नीति कड़ी परीक्षा से होकर गुजर रही है क्योंकि यह काफी हद तक स्पष्ट हो चुका है कि अमेरिका पाकिस्तान को अफगानिस्तान में भारतीय हितों की कीमत पर उसकी मनमानी करने की अनुमति दे रहा है.
 
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर देश में राजनीतिक सम्मिलन होना अत्यावश्यक है.जैसा कि इशरत जहां प्रकरण में स्पष्ट रूप से देखा गया, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन की व्यवस्था पर घरेलू राजनीति के अवांछित हस्तक्षेप का प्रतिकूल असर पड़ता है.भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उभरते खतरों और उन के प्रसार को नियंत्रित करने का अंतिम निर्णय आसूचना ब्यूरो द्वारा लिया जाता है. इस प्रक्रिया में इस सिद्धांत की अंतर्निहित स्वीकृति शामिल है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सदैव राजनीति से बढ़कर है.
 
इसमें कोई संदेह नहीं कि आसूचना ब्यूरो ने संगठनात्मक गुणवत्ता, खुफिया जानकारी की विश्वसनीयता पर जोर देने और प्रदत्त जानकारी के लिए कुल जवाबदेही की स्वीकार्यता में नए मानदंड स्थापित किए हैं.स्थायी परंपरा के अनुसार केवल ‘विश्वसनीय और पुष्टिकृत’ खुफिया जानकारी ही आगे प्रेषित की जा सकती है. इशरत जहां मामले में जनता के बीच यह धारणा बनाई गई कि तत्कालीन राज्य सरकार ने उसकी अपनी एजेंसी द्वारा प्रदान जानकारी को नजरअंदाज कर दिया था.यह जरूरी नहीं कि सभी खुफिया जानकारी ‘ठोस प्रमाण’ हो, लेकिन   इसके के आधार पर की गई ‘कार्रवाई’ के कानूनी जांच के अधीन होने मात्र से ही खुफि या जानकारी का महत्व कम नहीं हो जाता.आशा करते हैं कि इस मामले को शीघ्र ही न्यायिक स्पष्टता मिलेगी.
 
भले ही भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए हों, लेकिन भारतीय जासूस होने के आरोप में पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण यादव की हिरासत पर सत्तारूढ़ सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया पाकिस्तान के साथ योग्यता के आधार पर निपटने की उसके निर्णय का पूर्वसंकेत है.राजग सरकार के इस कड़े फैसले का लोगों द्वारा बडे पैमाने पर स्वागत किया जाएगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)