ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पहले विवाद को आकर्षित करने और बाद में स्थिति को नियंत्रित करने की कला में महारत हासिल कर ली है. नवीनतम उदाहरण में वह भारत माता की जय के नारे पर अपने ही रुख से पलट गए हैं और साथ ही यह अवलोकन भी किया है कि किसी को भी यह नारा लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए और  लोगों के भीतर खुद ऐसा करने की इच्छा होनी चाहिए. मोहन भागवत ने कहा कि हमें अपने देश को इतना महान बना देना चाहिए कि लोगों के पास मातृभूमि के प्रति प्रेम की इस विशेष अभिव्यक्ति का समर्थन करने के अलावा और कोई विकल्प न रह जाए.

यहां ये अनिवार्य सवाल उठता है कि आखिर आरएसएस प्रमुख अपने विशिष्ट पूर्ववर्तियों के विपरीत ऐसे वाद-विवादों में पड़ते ही क्यों हैं जिन्हें संघ परिवार की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी के लिए छोड़ देना चाहिए? मामले की हकीकत यह है कि आरएसएस खुद को एक सांस्कृतिक संगठन मानता है जबकि सच्चाई ये है कि देश में हो रहे सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर आरएसएस भी भाजपा जितना ही चिंतित है. आखिरकार, राजनीति की परिभाषा माने जाने वाली सत्ता की खोज के लिए ‘संस्कृति’ भी दूसरा नाम है.

भाजपा ने आरएसएस से प्रेरणा लेते हुए अपने सम्मेलन में संक ल्प लिया था कि यह नारा हमारी मातृभूमि के प्रति व्यक्ति के स्नेह का संकेत है और इसलिए लोगों को यह नारा लगाने में गौरवान्वित महसूस करना चाहिए. कई मुस्लिम संगठनों सहित अन्य विपक्षी समूहों ने भाजपा के इस विचार पर कड़ा एतराज जताया. उनका मानना था कि इस नारे को अनिवार्य नहीं बनाना चाहिए क्योंकि देश के प्रति अपने लगाव को व्यक्त करने के और भी कई तरीके हैं. उदाहरण के लिए, जय हिंद भी देशभक्ति की भावनाओं को जागृत करता है. शायद इसलिए भागवत को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ा कि भारत माता की जय के नारे को अनिवार्य नहीं बल्कि स्वैच्छिक बनाया जा सकता है. अन्य शब्दों में कहें तो आरएसएस प्रमुख ने लोगों को अनिवार्य ढंग से यह नारा लगाने के विचार का विरोध किया. इसे अभिव्यक्त करने का कार्य व्यक्तियों अथवा नागरिकों पर थोपे जाने वाले किसी दिशा-निर्देश के बजाय आत्मबोध का मामला होना चाहिए.

 जम्मू-कश्मीर में एकबार फिर पीडीपी-भाजपा गठबंधन को अंतिम रूप दिए जाने और आरएसएस के पूर्व प्रवक्ता व भाजपा के लिए कश्मीर मामलों के मौजूदा वार्ताकार राम जाधव द्वारा महबूबा मुफ्ती को विधानसभा चुनावों के जनादेश अनुसार भगवा ब्रिगेड के साथ बने रहने के लिए राजी करने के बाद आरएसएस सरसंघचालक ने अपना दृष्टिकोण बदल लिया. भागवत जानते हैं कि कश्मीरियों को ‘भारत माता की जय’ का जयकारा लगाने के लिए बाध्य करने का कोई भी प्रयास अनुत्पादक साबित होगा क्योंकि यह नारा दोनों सांझेदारों के बीच आम सहमति का हिस्सा नहीं था. इसके अलावा, पीडीपी के कुछ अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक तत्वों के साथ तथाकथित संबंध भी हैं और घाटी के किसी भी हिस्से में यह नारा स्वीकार्य नहीं होगा.

वैसे भी जम्म-कश्मीर विधानसभा में भाजपा का कोई भी विधायक उसके सहयोगियों को यह नारा लगाने के लिए राजÞी करने में सक्षम नहीं हो सकता. और तो और श्रीनगर की सड़कों पर भी इस नारे को सर्वव्यापक स्वीकृति नहीं मिल पाएगी जहां सबसे कट्टर भाजपा/आरएसएस समर्थक भी आमतौर पर पर्याप्त सुरक्षा कवच बिना अकेले बाहर निकलने का जोखिम मोल नहीं लेते.  भागवत यह भी जानते हैं कि जब 1991 में आरएसएस ने भाजपा राष्ट्रपति डॉ. मुरली मनोहर जोशी की कन्याकुमारी से लेकर श्रीनगर तक की एकता यात्रा को मंजूरी दी थी, तब इस मिशन को बधित करने में कई व्यावहारिक एवं विविध बाधाएं उत्पन्न की गई थीं.

25 जनवरी 1992 को जम्मू से श्रीनगर जाते हुए एकता यात्रा को सुरक्षा कारणों से पत्नीटॉप में रोक दिया गया था. अंत में यह निर्णय लिया गया कि डॉ. जोशी अपने तत्कालीन अनुरक्षक नरेंद्र मोदी व कुछ अन्य सदस्यों के साथ सरकारी विमान स 26 जनवरी की सुबह श्रीनगर पहुंचेंगे. उन्होंने अंतत: कड़ी सुरक्षा के बीच लाल चौक में तिरंगा फहराया था. इस प्रकार भागवत ने इस नारे द्वारा उत्पन्न होने वाले कुछ मुद्दों का पहले ही अनुमान लगा लिया था और उनके बदले नजरिए को कई लोगों द्वारा कश्मीर में भाजपा को संकट से उबारने के लिए पूर्व-कदम के रूप में देखा जा रहा है.

भागवत को अहसास हो गया है कि भाजपा द्वारा संसद में पहली बार अपने बूते पर बहुमत प्राप्त करने के बाद आरएसएस की भूमिका और जिम्मेदारी भी बढ़ गई है. भागवत की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन वे सुनिश्चित करना चाहते हैं कि राजनीति में खेले जाने वाले सत्ता के खेल में आरएसएस व उसके सहयोगी संगठनों की सार्थकता कहीं कम न हो जाए. वह भाजपा की स्थिति मजबूत करने में उसकी मदद करने के लिए उत्सुक हैं और इसलिए असंतुष्ट समर्थकों को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं.   

(ये लेखक के निजी विचार हैं)