लुटियंस की दिल्ली के कई महान बुद्धिजीवियों के ‘स्वतंत्र’ विश्लेषणों को देखते हुए, उन्हें अमेरिकी संस्थाओं व विशेषज्ञ दलों में प्रचलित प्रवृत्तियों का गंभीरतापूर्वक अनुगमन करते हुए देखना वाकई दिलचस्प है. इसलिए, वाशिंगटन डीसी और न्यूयार्क में विशेषज्ञों की राय में हां में हां मिलाते हुए हिलेरी क्लिंटन को डोनाल्ड ट्रंप अथवा बर्नी सैंडर्स की तुलना में कहीं अधिक बेहतर बताने वाले कोलाहलपूर्ण स्वरों को सरलता के साथ सुना जा सकता है. लुटियंस की दिल्ली के बुद्धिजीवियों में आजकल सैंडर्स और ट्रंप को महज जनता की भावनाओं की ‘संस्थापन-विरोधी’ लहर पर सवार अयोग्य व्यक्तियों के रूप में देखा जा रहा है. 
 
अरबपति उद्योगपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) को समाप्त करने की मांग करते आ रहे हैं और लीबिया-सीरिया में अमेरिकी हस्तक्षेप को एक अनावश्यक व भारी चूक कहने में जरा भी नहीं हिचकिचाते. और तो और ट्रंप यह सुझाव देने का दुस्साहस भी दिखाते हैं कि वाशिंगटन के लिए व्लादिमीर पुतिन के साथ कार्य करना बिल्कुल संभव है. धन-संपत्ति और राजनीतिक विस्तार के विपरीत छोर से आने के बावजूद इन मामलों में सैंडर्स का नजरिया लगभग ट्रंप के नजरिए से मेल खाता है. वरमोंट से सीनेट सदस्य सैंडर्स स्पष्ट रूप से नाटो अथवा फ्रांस्वा ओलांद व डेविड कैमरून के साथ कार्यांवित क्लिंटन युगीन हस्तक्षेपों के हिमायती नहीं हैं. कैमरून और ओलांद ने कभी भी बराक ओबामा की इस चेतावनी को गंभीरता के साथ नहीं लिया है कि समान भौगोलिक स्थिति से संबंध रखने वाले मुट्ठी भर व्यक्तियों के पास अब दुनिया बदलने की शक्ति नहीं रह गई है. जहां तक पुतिन का संबंध है इसमें कोई दोराय नहीं कि रूस को अटलांटिक गठबंधन की महाशक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की महंगी कीमत चुकानी पड़ी है, लेकिन यह यूरोप ही है जिसे समय बीतने के साथ रूस पर लगाए प्रतिबंधों की कहीं अधिक कीमत अदा करनी पड़ेगी. गोर्बाचेव-येल्तिसन युग में दिखाई देने वाली भू-राजनीतिक अप्रासंगिकता के गर्त में गिरने से बचने के ‘अपराध’ के लिए मॉस्को को दंडित करने वाले देशों में रह रहे रूसी लोगों के भीतर उन देशों के प्रति सद्भावना में तेजी से गिरावट देखने को मिली है. 
 
हकीकत यह है कि इस तरह के लगभग सभी मुद्दों पर डोनाल्ड ट्रंप के विचार भारतीय संस्थापन के उस समान हिस्से से काफी हद तक मेल खाते हैं जिसने अभी तक वैश्विक महाशक्तियों के साथ बौद्धिक स्वतंत्रता और हमारे राष्ट्रहित का पालन की अदला-बदली के प्रलोभन के समक्ष घुटने नहीं टेके हैं. अफगानिस्तान में नाटो हस्तक्षेप के अंदाज की जांच कीजिए, एक ऐसा देश जो भारतीय राष्ट्रहित के लिए अतिमहत्वपूर्ण है और जिसे दिल्ली द्वारा पाकिस्तान के हस्तक्षेप के बिना उसके स्वयं के व्यापार संचालन की अनुमति देने के प्रयास किए जा रहे हैं. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी 2004 से 2007 तक तालिबान से मिलती-जुलती विचारधारा रखने वाले सदस्यों को अफगानी प्रणाली के लगभग हर कोने में रोपित करने में सफल रही. यही कारण है कि अफगानिस्तान में तालिबान को खदेड़ने के लिए एक खरब डॉलर से अधिक के व्यय के बावजूद वह कट्टरपंथी संगठन आज भी उस देश में अपना अस्तित्व बचाने में समर्थ रहा है. जैसा कि वियतनाम में देखा गया था, अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों को अफगानिस्तान में हार का मुंह देखना पड़ा है और इस बार उनकी हार का प्रमुख कारण शत्रु की भयंकरता नहीं अपितु उनकी स्वयं की गलतियां थीं. 
 
बेशक, इन दिनों जो तस्वीर अधिक स्पष्टता के साथ दिखाई देने लगी है वो ये कि तालिबान दो गुटों में विभाजित हो गया है, एक गुट पाकिस्तानी सेना का दास बन गया है तो दूसरा गुट पाकिस्तानी सेना से सख्त नफरत करता है. खाकी वर्दीधारी सैनिकों से लड़ाई लड़ने के लिए तालिबान के दूसरे गुट ने अपनी तरह विचारधारा रखने वाले पश्तूनों के साथ हाथ मिला लिया है. जहां तक लीबिया और सीरिया की बात है, इन देशों में हस्तक्षेपों के परिणामों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने राज्य सचिव का साहसपूर्वक सामना नहीं किया होता और सीरिया में लीबिया को दोहराने से परहेज किया होता तो आज आईएसआईएस की राजधानी दमिश्क हो सकती थी और वहां की आधी आबादी के बजाय लगभग पूरी आबादी ही विदेशों की ओर कूच कर गई होती. व्लादिमीर पुतिन की वाशिंगटन के साथ एक परिवर्तनकारी साझेदारी को आकार देने की उनकी मंशा के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि रूसी राष्ट्रपति त्यागने योग्य नहीं हैं. 
 
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल में ईरान और क्यूबा के साथ संबंधों को सुधारने में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है जो आने वाली कई पीढ़ियों तक उनकी विरासत में बरकरार रहेगा. हालांकि, बड़े दानकर्ताओं को खुश रखने के अमेरिकी राष्ट्रपति के जुनून का मतलब है कि वह इस तथ्य से दूर चले गए हैं कि केवल अमेरिका व भारत के बीच सार्वजनिक स्वस्थ साझेदारी ही उस देश को ऐसी कीमत पर उसके नागरिकों के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने में सक्षम बनाएगी जो उन्हें कंगाल नहीं बनाएगा. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि दुनिया भर में गरीबों पर बड़ी दवा निर्माता कंपनियों के एकाधिकार के अमानवीय प्रभाव को अच्छी तरह समझने वाले बर्नी सैंडर्स और चुनाव प्रचार में केवल अपना धन खर्च करने वाले डोनाल्ड ट्रंप एक बिलकुल अलग राष्ट्रपति साबित हो सकते हैं क्योंकि ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के विपरीत यह दोनों बड़े दानकर्ताओं के सेवक नहीं हैं. दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोगों ने ध्यान दिया है कि क्लिंटन फाउंडेशन को दान दिए जाना वाला अधिकांश हिस्सा मध्यपूर्व से आता है, और इसलिए अमेरिकी राष्ट्रहितों के प्रतिकूल होने के बावजूद राज्य सचिव क्लिंटन द्वारा दोहा व रियाद की वांछित नीतियों को प्रोत्साहित किया जाना संभवत: पूरी तरह से आकस्मिक नहीं है. 
 
क्लिंटन ई-मेल सर्वर के उपयोग ने इस संभावना को खोल दिया है कि शायद क्लिंटन फाउंटेशन स्टाफ द्वारा कुछ बड़े दानकर्ताओं को कई गोपनीय व संवेदनशील ई-मेल दिखाई गई हैं. भारत को फ्रांस और ब्रिटेन जैसे ‘सभ्य’ देशों के अधीनस्थ रखने के लिए व्यवहारिक रूप से दृढ़ दृष्टिकोण अपनाने के बावजूद क्लिंटन परिवार भारतीय नौकरशाही के दिलों में जगह बनाने में कामयाब रहा है. जब तक एफबीआई व्हाइट हाउस के दबाव का प्रतिरोध करते हुए ई-मेल स्कैंडल की व्यापक जांच नहीं करती, हिलेरी क्लिंटन दिल्ली को समर्थन देने का दिखावा करते हुए उसे व्यावहारिक रूप से सताना जारी रख सकती हैं. 
 इसमें कोई संदेह नहीं कि हिलेरी क्लिंटन एक राज्यसचिव की तुलना में एक राष्ट्रपति के रूप में निश्चित रूप से क्लिंटन परिवार द्वारा चलाई जा रही संस्था में अधिक धन आकर्षित कर सकेंगी. चाहे बर्नी सैंडर्स हो या फिर डोनाल्ड ट्रंप, यह दोनों हिलेरी की तुलना में कहीं अधिक बेहतर अमेरिकी राष्ट्रपति सिद्ध होंगे. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)