भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने असली भारत की खोज तब की जब उन्होंने 1946 में अपनी 595 पृष्ठ की पुस्तक ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ लिखी. अहमद नगर फोर्ट जेल में चार वर्ष ठहरने के दौरान नेहरू ने विदेशी हमलावरों द्वारा दूषित की गई भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और महानता के बारे में लिखा. चार दशकों बाद विशुद्ध उदारवादी श्याम बेनेगल ने नेहरू की पुस्तक पर आधारित ऐतिहासिक नाटक ‘भारत एक खोज’ का लेखन व निर्देशन किया. इस नाटक में नेहरूवादी और दून स्कूल के पूर्व छात्र रोशन सेठ ने पूर्व प्रधानमंत्री की भूमिका अदा की थी. इस ऐतिहासिक नाटक के पहले एपिसोड को ‘भारत माता की जय’ का शीर्षक दिया गया था. प्रथम दृश्य में ग्रामीणों के एक समूह को भारत माता की जय के नारों के साथ सार्वजनिक सभा में नेहरू का स्वागत करते हुए दिखाया गया था. जब नेहरू ने अपने दर्शकों से पूछा कि क्या वे नारे का अर्थ जानते हैं और वे किसकी जीत के इच्छुक हैं तो शुरुआत में किसी के पास उनके प्रश्नों का जवाब नहीं था. अंतत: एक युवा किसान ने कहा कि भारत माता का अर्थ है धरती (मिट्टी) जो उनकी मां है. लेकिन, नेहरू ने यह स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि भारत माता का अर्थ केवल उनके पैरों तले की जमीन है, उन्होंने कहा कि भारत माता का अर्थ है संपूर्ण देश, जिसमें इसके पहाड़, नदी, सागर से लेकर आसमान तक, और सबसे महत्वपूर्ण इसके लोग शामिल हैं. उन्होंने कहा कि भारत केवल अपने लोगों की जीत में ही अपनी जीत खोज सकता है. 

लेकिन, नेहरू ने अगस्त 1947 में लालकिले में अपने मशहूर भाषण ‘द ट्रस्ट विद डेस्टनी’ का समापन भारत माता की जय के साथ नहीं बल्कि जय हिंद के साथ किया था. भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक होने के बावजूद नेहरू ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि यह नारा इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व में अंग्रेजों से आजादी मांग रहे लोगों द्वारा गढ़ा गया था और यह कि सभी धर्मों के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में गर्व के साथ यह नारा लगाया था. लियाकत अली जैसे शक्तिशाली स्वतंत्रता सेनानियों को भारत माता की जय और वंदे मातरम का नारा लगाने के लिए अंग्रेजों द्वारा नियंत्रित निर्मम पुलिस के क्रोध का सामना करना पड़ा था.

ये स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों की बात थी. नेहरू द्वारा अपनी किताब लिखने के 70 वर्ष बाद भी उनके वंशजोें व शिष्यों में भारत माता की जय की महत्ता को परिभाषित करने की होड़ लगी हुई है. न केवल विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच, बल्कि नागरिक समाज के नेताओं, बॉलीवुड सितारों, लेखकों, सोशल मीडिया की समझ रखने वाले धर्म गुरुओं एवं संगठनों के बीच भी भारत माता की जय को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने को लेकर भीषण तनातनी चल रही है. भारत माता के हर हिमायती के पीछे एक ऐसा व्यक्ति जरूर होता है जिसे यह नारा लगाने से इंकार करने पर स्वयं को राष्ट्रविरोधी घोषित करने में गर्व महसूस होता है. वास्तव में, देश को सांप्रदायिक और राजनीतिक आधार पर बांटने में यह एक सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. 

हर कैलेंडर वर्ष में चुनावों के स्थायी विशेषता बनने के साथ, विचारों व सार्थक मुद्दों की कमी से जूझ रहे भारतीय राजनीतिक दलों ने आगामी चुनावों के लिए राष्ट्रवाद को मुख्य मुद्दा बना दिया है. जबकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले संघ परिवार ने भारत माता की जय के जयकारे को देश के प्रति वफादारी का एकमात्र विश्वसनीय परीक्षण बना लिया है, इसके विरोधियों का कहना है कि भारतीय संविधान में अडिग विश्वास ही देशभक्ति का विशेष प्रतीक है. शायद यह संघ परिवार द्वारा भारत माता की जय के नारे का अति-उत्साही अधिरोपण ही है जिसने उसके आलोचकों के समान रूप से आक्रामक विरोध में योगदान दिया है. 

राष्ट्रवादी की उपाधि हथियाने की लड़ाई ने गत सप्ताह धार्मिक रंग ले लिया जब प्रमुख इस्लामी मदरसा दारुल उलूम ने भारत माता की जय का नारा लगाने को इस्लाम-विरुद्ध बताते हुए मुस्लिमों को यह नारा न लगाने को कहा. इसी मदरसे ने देशभर के मदरसों को ‘तिरंगा लहराने और स्वतंत्रता दिवस मनाने और छात्रों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और देश की विविधता में एकता की मूल भावना की शिक्षा देने’ की सलाह भी दी थी. इससे पहले, भारत माता की जय के प्रति बढ़ते प्रतिरोध को महसूस करते हुए आरएसएस ने स्पष्टीकरण दिया है कि लोगों को यह नारा लगाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन, अब इस्लामी संगठनों से भारत माता की जय-विरोधी विरोधी संदेश उत्पन्न होने के बाद कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने अल्पसंख्यकों के राष्ट्रवाद पर सवाल खड़े किए हैं. 
यह विडंबना ही है कि जिस नारे को देश को एकजुट करने के लिए गढ़ा गया था, आज उसी का उपयोग देश के धु्रवीकरण के लिए किया जा रहा है. लगभग एक दशक पहले भी वंदे मातरम गाने पर हो-हल्ला मचा था जिसका जवाब ‘अगर इस देश में रहना होगा, वंदे मातरम कहना होगा’ जैसी धमकी भरी प्रतिक्रियाओं के साथ दिया गया था. लेकिन, इससे पहले हमने देश में ऐसे टकरावपूर्ण माहौल को नहीं देखा जिसे आज देख रहे हैं. 

नारे का विरोध करने वाले दावा करते हैं कि संविधान में कहीं भी भारत माता की जय का नारा लगाने का   प्रावधान नहीं रखा गया है. सत्तारूढ़ सरकार द्वारा राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय भौगोलिक पहचान और न्यायपालिका के महत्व को बमुश्किल मान्यता देने वाले वर्तमान पारिस्थितिकी तंत्र को ध्वस्त करने के किसी भी प्रयास से रोकने के लिए उदारवादियों, नव-सांप्रदायिकों और वामपंथियों का एक गठबंधन बनाया गया है. यह समूह अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए और देश के शेष हिस्सों पर अपनी पसंद थोपने के लिए संविधान के चयनात्मक और आत्मपरक उपयोग का आह्वान करता है. 

जब संविधान निषेध की बात करता है तो यह लोग इसे उनके व्यक्तिगत आहार चयनों के मौलिक अधिकार के लिए खतरे के रूप में देखते हैं. वे उस न्यायिक फैसले का समर्थन करते हैं जो उनकी पसंद के अनुरूप है, लेकिन अगर अदालत संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित ऐसे निर्णय देती है जो उनकी जीवनशैली में बाधा पहुंचाते हैं तो यही लोग विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आते हैं. 

इसमें कोई शक नहीं कि विदेशों में शिक्षित बुद्धिजीवियों, मीडिया सितारों, राजनीतिक नेताओं और संभ्रांतवादी व्यापारी नेताओं की नई खेप प्रतिभाशाली मानस के स्वामी हैं, लेकिन जब मातृभूमि के अभिप्राय की हो तो वे केवल अर्द्ध-शिक्षित प्रतीत होते हैं. भारत माता की जय का तोहफा हमें किसी कट्टरपंथी हिंदू संगठन अथवा संकीर्ण मानसिकता वाले हिंदू नेता द्वारा नहीं दिया गया था. भारत माता की जय स्वतंत्रता-वंचित भीड़ द्वारा गढ़ा गया सबसे सफल अहिंसक मौखिक हथियार था जिसने अंग्रेजों के 200 वर्ष पुराने शासन का अंत करने में बहुमूल्य योगदान दिया. इस नारे में निहित भावना की रूह मिटाने का कोई भी प्रयास अपने साथ राष्ट्र-विरोधी के रूप में वर्गीकृत किए जाने का जोखिम लेकर आता है. 
 

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)