सफलता आपकी क्षमता का आकलन करती है और संकट का समय व्यक्ति अथवा संस्थान की परिपक्वता और लचीलेपन की परीक्षा लेता है. 2014 आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की तीव्र लहर ने कांग्रेस रूपी बरगद को अपनी चपेट में लेकर उसके वैचारिक मुखौटे को उतार फेंका और उसकी संरचनात्मक नींव में लग गए दीमक का खुलासा किया.यह ऐसा क्षण था जिसने एक ऐसे मेधावी नेता के उद्धव की मांग की जो भारत के इतिहास में तनावपूर्ण एवं महत्वाकांक्षी समय से गुजरते हुए नवीकरण का नुस्खा लिख सके और भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सके.

लेकिन, कांग्रेस ने अपनी गलतियों से सबक सीखने के बजाय योग्यता के स्थान पर राजवंश और आत्ममंथन के बजाय चाटुकारिता को प्राथमिकता देने के अपने घातक दोष में निवेश करना जारी रखा.राहुल गांधी के हाथों में पार्टी की बागडोर सौंपने के साथ राजनीतिक दुर्बोधता और स्वच्छंद प्रबंधन से उत्पन्न अंदरूनी विवादों की दरार धीरे-धीरे और गहरी होती गई.कांग्रेस की कमजोर पड़ चुकी बुनियाद चरमराने लगी और उत्तराखंड में मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए.यह ढहते हुए साम्राज्य का एक हिस्सा भर है.इससे पहले असम और अरुणाचल प्रदेश में भी कांग्रेस सरकार अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, हालांकि तरुण गोगोई सरकार किसी तरह पार्टी के बंटवारे को रोकने में सफल रहे.2014 के चुनावी कहर में पार्टी का डटकर साथ देने वाले क्षेत्रीय नेताओं को अहसास हो चुका है कि कांगे्रस की नैया चक्रवती तूफान में बुरी तरह फंस चुकी है.एक आम शिकायत यह है कि राहुल गांधी के पास पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए समय नहीं है, और अगर राहुल उनके साथ चंद मिनट बिताते भी हैं तो उनकी बात को अनदेखा कर जाते हैं.

गत सप्ताह के अंत में न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार डेविड ब्रुक्स ने अमेरिका में बुरी तरह लड़खड़ाती रिपब्लिकन पार्टी का ज्ञानवर्धक विश्लेषण किया.बु्रक्स ने लोकतंत्र के विच्छेदन के लिए थॉमस कुन की वैज्ञानिक क्रांतियों के सिद्धांत को लागू किया.उनके अनुसार बौद्धिक प्रगति कभी भी स्थिर नहीं होती.विरोधाभास और विसंगतियों के उभर कर सतह पर प्रकट होने के साथ बौद्धिक प्रगति अनुकूल हालातों में प्राप्त सफलता से दूर होकर अस्थिरता की ओर प्रवाहित होने लगती है.अस्थिरता अपने साथ संकट और अलगाव लेकर आती है.हालातों को सामान्य बनाने के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं.हर कोई दुखी है लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि आगे क्या करना है.ब्रुक्स सुझाव देते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी का अकथनीय व्यवहार इस तथ्य के कारण है कि यह ‘मानसिक रूप से पराजित हो चुकी है’ जिसके परिणामस्वरूप उसकी नीतियां भ्रष्ट गई हैं और अव्यवस्था फैल गई है.

2009 से लेकर 2014 तक पांच वर्षों के दौरान कांग्रेस की नाव सफलता की लहरों से प्रवाहित होकर विफलता और संकट के सागर में डगमगाने लगी.हताशा, पीड़ा, दुख, संताप की भावनाएं प्रचुर मात्रा में हैं लेकिन स्थानीय विविधता के कारण कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा, फिर जटिल समस्या के नुस्खे की खोज का प्रयास करना तो दूर की बात है.सफलता और सुरक्षित रहने के समय राजवंश कुछ हद तक छूट की अनुमति दे देते हैं लेकिन जब उन पर खतरा मंडराने लगता है तब वे स्वयं को पूरी तरह से सीमित कर लेते हैं.

हमने हाल ही में कांग्रेस द्वारा उसके अपने इतिहास को नकारने का उत्कृष्ट मामला देखा है. मैंने जवाहरलाल नेहरू के जीवन का करीबी से अध्ययन किया है और इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री होने के समय से लेकर मनमोहन सिंह के एक दशक के शासनकाल तक संपादक रहा हूं.मैं पूरे विश्वास के साथ दावा कर सकता हूं कि एक भी कांग्रेसी नेता राष्ट्रवाद के प्रति कांग्रेसी प्रतिबद्धता पर उस तरीके से समझौता नहीं करता जिस तरीके से राहुल गांधी ने नए दौर के छात्र नेता की हार्दिक स्वीकृति का प्रदर्शन करके किया है.पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूंगाा कि इस छात्र नेता ने भारतीय वर्दीधारी सैनिकों को बलात्कारी और भारतीय सेना को माओवादिओं से भी बदतर बताने के अपमानजनक सुझाव का समर्थन किया था.राहुल गांधी भारतीयों और उनके अपने पूर्वजों व पूर्ववर्तियों के लिए भारतीय सेना के अमूल्य योगदान को याद किए बिना ही प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर गए हैं.अगर यह उनकी एक कार्यनीतिक चाल थी तो भी इससे उन्हें राजनीतिक लाभ होने के बजाय नुकसान ही हुआ है.

कांग्रेस को उन लोगों के साथ खड़े होकर ज्यादा वोट नहीं मिलने वाले जो इस देश का बहिष्कार करते हैं और इसके टुकड़े कर देना चाहते हैं.कांग्रेस ने अतीत में विभाजन के माध्यम से अपने संकट का समाधान किया है.इंदिरा गांधी द्वारा योजनाबद्ध विभाजन सबसे प्रसिद्ध और सबसे उत्पादक सिद्ध हुआ था.यहां ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि 1969 में कांग्रेस राजवंश द्वारा गतिहीन नहीं की गई थी, इस रोग ने केवल 1970 के मध्य में जोर पकड़ना शुरू किया.आज, कांग्रेस के भीतर वरिष्ठ व विचारशील सदस्य कभी भी अपने निजी अभिव्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं करेंगे.ऐसा करना उनकी व्यक्तिगत संभावनाओं के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है.

राजवंशों का अंत धमाके के साथ नहीं बल्कि भय अथवा पीड़ा की दुर्बल ध्वनि के साथ होता है.