संघर्षग्रस्त सीमावर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर में अनिश्चितताओं के बादल छंटने लगे हैं और महबूबा मुफ्ती ने राज्य की सर्वप्रथम महिला मुख्यमंत्री बनने की सभी तैयारियां कर ली हैं. हालांकि जनवरी में मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राज्य में पिछले कुछ महीनों से हो रही सियासत ने निश्चित रूप से भाजपा-पीडीपी के संबंधों को प्रभावित किया है. उनकी पुत्री और राजनीतिक उत्तराधिकारी महबूबा ने एक समय उनके स्थान पर मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने की अनिच्छा दिखाई थी, लेकिन लंबे समय तक दोनों पक्षों के बीच चली बातचीत के बाद अंतत: उन्होंने अपने रुख में नर्मी लाते हुए अनजाने में भाजपा को राजनीतिक रूप से उनका घेराव करने की अनुमति दे दी. दोनों दलों के बीच बातचीत से उत्पन्न सकरात्मक परिणाम से भाजपा विधायकों में जाहिर तौर पर जोश की लहर दौड़ गई है.

दोनों पक्षों के बीच हठी परस्पर-संवाद ने निश्चित रूप से भाजपा को बढ़त प्रदान की है लेकिन यह भी सच है कि इसने भगवा ब्रिगेड को ऐसी असमंजसता की स्थिति में डाल दिया है जो दोनों सत्तारूढ़ भागीदारों के लिए शून्य परिणाम का खेल साबित हो सकती है.  उनके पिता के निधन के बाद महबूबा के समक्ष कई विकल्प थे. वह चाहती तो पिता के निधन के तुरंत बाद मुख्यमंत्री पद ग्रहण कर सकती थीं और केंद्र से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ माह के समय में राज्य में दृढ़तापूर्वक अपना दावा पेश कर सकती थीं. इससे सहयोगी दल भाजपा के साथ-साथ उसकी केंद्र सरकार पर भी दबाव बनता और उन्हें पीडीपी नेता को समर्थन देने के लिए मजबूर होना पड़ता. महबूबा के समझ उपलब्ध दूसरा विकल्प यह होता कि वह घाटी के लोगों को यह बताती कि उनके पिता ने उनकी पार्टी व भाजपा के भीतर उनके सहयोगियों के साथ संपूर्ण सोच-विचार के बाद ही पीडीपी-भाजपा गठबंधन का गठन किया था. अंतर्निहित अंतर्विरोधों के बावजूद अस्तित्व में आए गठबंधन को आगे बढ़ाने के लिए मुफ्ती साहब के पास वांछित राजनीतिक वरिष्ठता और सम्मान था. उनके निधन के बाद बदली हुई परिस्थितियों में जहां पीडीपी के पास मुफ्ती साहब जैसा कोई कद्दावर नेता नहीं था, महबूबा गठबंधन सरकार को जारी रखने के बजाय भविष्य की कार्रवाई के लिए लोगों के पास जाकर उनका मार्गदर्शन पाने का प्रयास कर सकती थीं. इस कारण से घाटी में मतदाताओं का मन बूझने के लिए नए सिरे से चुनाव होना एकमात्र विकल्प रह जाता. यह जोखिम महबूबा के लिए लाभप्रद हो सकता था क्योंकि न केवल वह अपनी स्वयं की पार्टी में मजबूत बनकर उभर सकती थीं बल्कि आसानी से राज्य में पीडीपी की स्थिति को और अधिक मजबूत भी कर सकती थीं. यहां तक कि उनके आलोचकों और अन्य पार्टियों ने इस संभावना से इनकार नहीं किया था. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि या तो महबूबा को गलत सलाह दी गई या फिर उन्होंने पर्याप्त सलाह-मशवरा नहीं किया और इसलिए वह भाजपा से अधिक रियायतों की मांग करने लगीं. उनकी गणना थी कि पीडीपी भाजपा पर निरंतर दबाव डालकर उसके घुटने टिकवा देगी और भाजपा उनकी सभी मांगों को स्वीकार कर लेगी. लेकिन उनका अनुमान गलत साबित हुआ और भाजपा ने भी अपने रुख पर अड़े रहते हुए महबूबा की मांगों और शर्तों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया. राम माधव ने महबूबा व उनके सहयोगियों को दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे केवल दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद साहब के जीवनकाल में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के अनुसार ही कार्य कर सकते हैं. भगवा पार्टी के नेताओं से घिर चुकी महबूबा को एहसास हो गया कि वह उनके पिता के निधन के तुरंत बाद मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने से इनकार करके या फिर राज्य में पुन:चुनाव करवाने का जोखिमपूर्ण आदेश देकर मौके का फायदा उठाने से पूरी तरह से चूक गई हैं. महबूबा अब असहाय स्थिति में थी और वह दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलीं जहां स्वयं नरेंद्र मोदी ने उन्हें उनके पिता की प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने और भाजपा के साथ सरकार बनाने को कहा. महबूबा को अंतत: इस कटु सत्य को स्वीकार करना पड़ा कि उनके अनावश्यक विलंब और किसी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुंचने में उनकी असमर्थता के कारण कश्मीर घाटी में उनकी लोकप्रियता कम हो गई है. उन्होंने जल्दबाजी में अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया और भाजपा के परामर्श पर सहमत हो गर्इं क्योंकि उन्हें डर था कि उनकी ओर से किया गया और अधिक विलंब उन्हें मुख्यमंत्री पद से भी वंचित कर सकता है. इस प्रकार महबूबा एक मजबूत स्थिति के बजाय कमजोर स्थिति से राज्य के मामलों का संचालन करेंगी.

 पीडीपी पर इस छोटी सी जीत से संतुष्ट भाजपा के पास अभी भी चिंतित होने के लिए कई कारण हैं. अभी बीते सप्ताह ही एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने राष्ट्रवाद की आवाज को और अधिक बुलंद करने का संकल्प लिया और कहा कि समाज के हर वर्ग को देश के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शन करने के लिए ‘भारत माता की जय’ के नारे का समर्थन करना चाहिए. अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक तत्वों से संबद्ध पीडीपी के साथ सत्ता में आने के बाद भाजपा के सामने यह दुविधा है कि क्या भारत माता के जयकारे की गूंज श्रीनगर में कश्मीर विधानसभा और घाटी के अन्य भागों   में भी सुनाई देगी? क्या केंद्रीय भाजपा नेता कश्मीर जाकर इस बात पर जोर देंगे कि पार्टी और सरकार के समर्थकों को राष्ट्र के प्रति अपनी वफादारी दिखाने के लिए ‘भारत माता की जय’ के नारे का समर्थन करना चाहिए’? क्या ‘कश्मीरियों को मातृभूमि के प्रति उनकी सत्यनिष्ठा साबित करने के लिए विवश करने’ की सरकार की अक्षमता को उसके दुर्बल संकल्प अथवा राजनीतिक सरलता के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाएगा? शून्य परिणाम वाले खेल में भाजपा की जीत ने भले ही महबूबा मुफ्ती को झुक ने पर विवश कर दिया हो लेकिन इस खेल में भाजपा की सीमाओं को देखते हुए उसका प्रबल राष्ट्रवादी उत्साह कहीं न कहीं थोड़ा मंद जरूर पड़ गया प्रतीत होता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)