नई दिल्ली. राजनीति और मनोरंजन लंबे समय से एक-दूसरे के सहोदर रहे हैं. दोनों के लिए कुछ हद तक आकर्षण-शक्ति, आत्म-पदोन्नित के लिए प्रतिभा और मीडिया हेरफेर के लिए एक स्वाभाविक एहसास की जरूरत पड़ती है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि विभिन्न राजनीतिक  दल चुनाव नजदीक आने पर सिनेमा व खेल जगत के नामी सितारों के आकर्षण और लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुनाने से नहीं चूकते. खेल व सिने जगत की मशहूर हस्तियों के राजनीतिक मंच पर उतरने के साथ ही वैचारिक प्रतीकों को दरकिनार कर दिया जाता है और चुनाव प्रचार अभियान एक मनोरंजक प्रदर्शनी का रूप अख्तियार कर लेते हैं. इस संदर्भ में यह वर्ष भी कोई अपवाद नहीं होगा. 
 
पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जैसे शक्तिशाली नेताओं ने भी राजनीतिक बाजार पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाने और अपने वोट बैंक को विस्तारित करने के लिए अपने श्रेष्ठ मंत्रियों को फिल्मी सितारों और खेल जगत के दिग्गजों के साथ-साथ साहित्यकारों और विश्लेषकों की तलाश की महत्वूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी है. ऐसी परिस्थितियों में जहां एक राजनीतिक दल का किसी राज्य अथवा क्षेत्र में महज प्रतीकात्मक अस्तित्व हो, मतदाताओं को द्रवित करने के लिए क्षेत्रीय राजनीति से भली-भांति परिचित स्थानीय सितारों को चुनावी मैदान में उतारा जाता रहा है. 
 
गत सप्ताह भाजपा ने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी एस श्रीसंत को केरल के तिरुवनंतपुरम से अपने चुनावी उम्मीदवार के रूप में खड़ा करने की घोषणा की. चूंकि, अब श्रीसंत को उनकी गेंदबाजी के लिए कम और मैच-फिक्सिंग और नृत्य कला के लिए अधिक जाना जाता है, बीसीसीआई ने 2013 में उनके क्रि केट खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी का स्पष्ट रूप से मानना है कि श्रीसंत अभी भी उस राज्य में भाजपा के प्रतिद्वंदियों को पटखनी देने में समर्थ हैं जहां वो अभी तक खाता भी नहीं खोल पाई है. 
 
तमिलनाडु और अविभाजित आंध्रप्रदेश की राजनीति पर पिछले 50 वर्षों से दक्षिण फिल्मी सितारों का बोलबाला रहा है. एनटी रामाराव, जयाप्रदा, चिरंजीव, मोहन बाबू, कोटा श्रीनिवास राव और हाल ही में पवन कल्याण ऐसे लोकप्रिय फिल्मी सितारे रहे हैं जिन्होंने फिल्मों के साथ राजनीति में भी उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की. तमिलनाडु में ऐसा देखा गया है कि राज्य के फिल्मी सितारों ने विचारधारा के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए राजनीतिक दलों का गठन किया. उनके लिए यह कोई कठिन कार्य नहीं था क्योंकि उन्हें एमजी रामाचंद्रन, करुणानिधि और जयललिता जैसे शक्तिशाली नेताओं का समर्थन प्राप्त था. पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और भाजपा को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विजयकांत जैसे तमिल फिल्मी सितारों को अपने सहयोगी के रूप में राजी करने में कठिनाई पेश आ रही है. गौरतलब है कि विजयकांत ने 2005 में डीएमडीके पार्टी का गठन किया था. 
 
पश्चिम बंगाल और असम में भी विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी अभियान में सहयोग देने के लिए खेल, कला, संस्कृति, सिनेमा और समाज की मशहूर हस्तियों की ओर राजनीतिक साझेदारी का हाथ बढ़ाया है. उदाहरण के लिए, भाजपा ने पश्चिम बंगाल में सुभाषचंद्र बोस के पारिवारिक सदस्य को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ा किया है. यह और बात है कि जनवरी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 7-आरसीआर में बोस परिवार को आमंत्रित करने के अलावा उनका संघ से कोई लेना-देना नहीं है. 
 
पिछले कुछ दशकों से सभी राजनीतिक दल अपनी घोषित विचारधारा का धीरे-धीरे त्याग कर रहे हैं. इस प्रकिया की शुरुआत 1969 में हुई जब इंदिरा गांधी ने पहले अलगाव के बाद कांग्रेस की बागडोर संभाली. खादी-धोती और गांधी टोपी पाने वाले मंत्रियों को हटाकर इंदिरा के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा रखने वाले लोगों की नई खेप को पार्टी में शामिल किया गया. तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा इज इंडिया’ का नारा देकर पार्टी की विचारधारा को नई परिभाषा दी. इंदिरा गांधी को चुनाव जीतने के लिए ग्लैमर अथवा कॉरपोरेट जगत के समर्थन की निश्चित रूप से आवश्यकता नहीं थी. दरअसल, उस समय यह कहा जाता था कि अगर इंदिरा गांधी बिजली के खंबे को भी समर्थन दें तो वो भी जीत जाएगा. 
 
दिवंगत राजीव गांधी कांग्रेस को ग्लैमर और कॉरपारेट रंग में रंगने वाले पहले नेता थे. वह एक स्वाभाविक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे, उन्होंने अरुण सिंह और अरुण नेहरू जैसे टेक्नोक्रैटों को कांग्रेस में शामिल किया और प्रौद्यागिकी व उत्तरदायी सरकार के माध्यम से भारत को 21वीं सदी में ले गए. लेकिन राजीव सिने व खेल जगत की प्रसिद्ध हस्तियों के आकर्षण से अछूते नहीं रहे. उन्होंने दुर्जेय हेमवती नंदन बहुगुणा को हराने के लिए अपने मित्र अमिताभ बच्चन को चुनावी मैदान में उतारा. तत्पश्चात् राजेश खन्ना, सुनील दत्त, राज बब्बर, गोविंदा जैसे मशहूर फिल्मी सितारों ने भी कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा. केंद्र अथवा राज्यों में एक दर्जन से अधिक फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों द्वारा महत्वपूर्ण पद ग्रहण करने के साथ यह प्रचलन आज भी जारी है. 
 
कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलते हुए भाजपा ने भी अपने चुनावी अभियानों में बॉलीवुड के सितारों को उतारने के विकल्प को चुना. फिल्मों के शौकीन और क्रिकेट पे्रमी लाल कृष्ण आडवाणी ने सबसे पहले फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के लिए पार्टी के दरवाजे खोले. उन्होंने बॉलीवुड से धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना और हेमा मालिनी को, और क्रि केट की दुनिया से नवजोत सिद्धू, कीर्ति आजाद और चेतन चौहान को मतदाताओं तक उनकी व्यापक पहुंच के चलते पार्टी में शामिल किया. 
 
ऐसा नहीं है कि मतदाताओं को रिझाने के लिए केवल कांग्रेस और भाजपा ही ग्लैमर का उपयोग करते आ रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, समाजवादी पार्टी और विशेष रूप से आम आदमी पार्टी जैसे छोटे और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने भी अपने आधार के विस्तार के लिए अधिक से अधिक स्थानीय व राष्ट्रीय दिग्गजों को शामिल किया है. 
 
40 से अधिक प्रमुख फिल्मी हस्तियों और तकरीबन 20 खिलाड़ियों के राजनीति में उतरने के साथ भारत विश्व में पहले नंबर पर आता है. इसके बाद फिलीपींस और अमेरिका का नंबर आता है. लोकतंत्र का जनक कहे जाने वाले ब्रिटेन में आधा दर्जन से भी कम गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से संबद्ध राजनीतिज्ञ हैं. यूरोप में भी ऐसा देखा गया है कि राजनीतिक दल जीत दर्ज करने के लिए विरले ही फि ल्मी सितारों अथवा खिलाड़ियों की ओर संयोजकता का हाथ बढ़ाते हैं. 
 
लेकिन भारत में कहानी कुछ अलग है. अगर भारतीय राजनीतिक दल वैचारिक प्रतीकों की उपेक्षा करते रहे और अपनी विचारधारा से विमुख होते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब राजनीतिक दलों से विश्वसनीय और स्वीकार्य नेताओं का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और उनका स्थान अहंकारी नेताओं और वैचारिक रूप से कंगाल किंतु अत्यंत सफल फिल्मी व खेल सितारों द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा. A