जैसा कि हाल ही में जम्मू-कश्मीर में देखा गया कि राजनीति में नए प्रयोग करने से अजीबो-गरीब परिणाम सामने आ सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने गत वर्ष जनवरी में अपनी ‘अपराक्रम्य’ राष्ट्रवादी विचारधारा को एक ओर रखते हुए दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद की अलगाववादी समर्थक पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ राजनीतिक सौदा करने का फैसला किया. कश्मीर घाटी में गठबंधन सरकार बनाने के 14 माह बाद अब भाजपा को राज्य में उसके द्वारा उपभोग की गई सत्ता में कुछ कमियां दिखाई देने लगी हैं. राष्ट्रवाद और अलगाववाद को मिश्रित करने के साथ किया गया राजनीतिक एकीकरण का प्रयोग आपदा के लिए अचूक नुस्खा साबित हुआ है. दो माह पहले मुफ्ती मोहम्मद की मृत्यु के बाद जम्मू-कश्मीर में निष्क्रिय हो चुके गठबंधन को पुनर्जीवित करने के लिए उनकी उत्तराधिकारी महबूबा मुफ्ती और भाजपा नेतृत्व सार्वजनिक और गुप्त परस्पर संवाद का आयोजन कर रहे हैं. दोनों दल आधिकारिक रूप से नई गठबंधन सरकार के गठन को लेकर बेहद आशान्वित हैं. इसके बावजूद दोनों दलों द्वारा राजनीतिक पुनर्मिलन के लिए विश्वास बहाली की बातें की जा रही हैं.

दृढ़-विश्वास के बजाय सुविधा के आधार पर गठित कोई भी गठबंधन आज नहीं तो कल टूट ही जाता है. जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में, जहां राजनीतिक वर्णन पैसे के प्रति मोह और अतिरिक्त-देशीय विचारों के प्रति प्रेम द्वारा निर्धारित है, ऐसे किसी भी गठबंधन का विफल होना तय है जो प्रमाणित सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को खतरा पेश करता हो. भारतीय जनता पार्टी पीडीपी पर अपनी विचारधारा और राजनीतिक शैली थोपने में असफल रही है, जो भारत के साथ घाटी के एकीकरण का विरोध करने वालों को समर्थन देकर राज्य में अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए है.

पीडीपी और भाजपा के बीच राजनीतिक रस्साकसी का खेल केवल कुछ बिजली संयंत्रों अथवा किसी विशेष पैकेज पर अधिकार प्राप्त करने के लिए ही नहीं हो रहा बल्कि यह दो विचारधाराओं और भारत के विचार के बीच का टकराव है. महबूबा चाहती हैं कि जम्मू-कश्मीर भावनात्मक रूप से भारत से अलग रहे जबकि भाजपा सभी कानूनी, सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को हटा कर घाटी को राष्ट्रीय मुख्यधारा का हिस्सा बनाना चाहती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पीडीपी के साथ हाथ मिलाकर कश्मीर घाटी के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बहाल करने की उम्मीद जताई थी. उन्होंने सोचा था कि शायद वे कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी को सुगम बनाने के लिए राज्य सरकार को प्रोत्साहित कर पाएंगे. केंद्र ने संपूर्ण आर्थिक पैकेज और सशस्त्र बलों की चरणबद्ध वापसी को कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और अलगाववादियों पर नकेल कसने के साथ संबद्ध कर दिया था. लेकिन महबूबा और उनके पिता के विचारों में भिन्नता है. इसमें कोई शक नहीं कि महबूबा ने उन लोगों की भावनाओं और आंसुओं को बढ़ावा देकर ही राजनीतिक वैधता प्राप्त की है जिनके रिश्तेदार की मृत्यु आम नागरिकों और भारतीय सेना के जवानों पर हमलों में भाग लेने के दौरान हुई है. महबूबा को एहसास हो गया है कि भाजपा के साथ जुड़े रहने से वह अपना पारंपरिक जनाधार खो सकती हैं.

घाटी में वर्तमान संवैधानिक संकट महबूबा और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले दो राजनीतिक राजवंशों के बीच टकराव का प्रदर्शन भी है. यह दोनों नेता भाजपा को स्वायत्तता और कश्मीरी लोगों के कल्याण के लिए एक खतरे के रूप में चित्रित करने के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. यह दोनों कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की भूमिका को नगण्य बनाने के लिए दृढ़संकल्प हैं. जबकि अब्दुल्ला परिवार राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा रहा है, महबूबा ने हमेशा से स्वयं को घाटी तक सीमित रखा है. अब्दुल्ला परिवार को घाटी और जम्मू क्षेत्र में हिंदू अल्पसंख्यकों के एक छोटे से वर्ग का समर्थन भी प्राप्त है जबकि मुफ्ती परिवार को घाटी में केवल मुस्लिम समर्थन प्राप्त है. हालांकि, यह भाजपा और कांग्रेस की पूर्ण विफलता है कि वे नेशनल कॉन्फें्रस और पीडीपी के मूल निर्वाचन क्षेत्र को कुंद करने में पूरी तरह असफल रहे हैं. स्वतंत्रता के 69 वर्ष बाद भी अधिकांश कश्मीरी खुद को भारतीय कहने के विचार से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं.

पाकिस्तान ने कभी भी भारतीय गणराज्य के हिस्से के रूप में जम्मू-कश्मीर की सच्चाई को स्वीकार नहीं किया है और 1990 के दशक तक अलगाववादियों को समर्थन देने के साथ-साथ वित्तीय सहायता भी प्रदान की है. जब पाकिस्तान राज्य को अस्थिर करने के प्रयासों में विफल रहा तब उसने सशस्त्र घुसपैठ शुरू कर दी और नागरिकों और सेना के जवानों को मारने के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल किया. केंद्र द्वारा चरमपंथी तत्वों को प्रभावहीन बनाने के लिए राज्यपालों का उपयोग करने का प्रयास भी विफल रहा. यहां तक कि सभी दलों के पसंदीदा और वर्तमान राज्यपाल नरेंद्र नाथ वोहरा को भी स्थानीय सरकार पर अपने आकर्षण का इस्तेमाल करके राज्य का समुचित विकास सुनिश्चित करने द्वारा अलगावादियों के प्रभाव को मंद करने में सफलता नहीं मिली है. वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान का उद्देश्य राज्य के आर्थिक विकास को रोकना और आतंक के बीज बोना था और इसमें उसे काफी हद तक सफलता भी   मिली है. नई दिल्ली से उदारशील धन-प्रवाह के बावजूद 2014-15 के दौरान राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में पिछले वर्ष के 13 प्रतिशत से 1 प्रतिशत से भी कम वृद्धि दर्ज की गई. विकास की कमी और धन के दुरुपयोग ने अधिक बेरोजगारी उत्पन्न की है और युवाओं को राष्ट्र-विरोधी तत्वों के हाथों में धकेल दिया है.

लेकिन विकास कभी भी ऐसा मुद्दा नहीं रहा जिसने वैचारिक रूप से विरोधी राजनीतिक दलों को आपस में जोड़ा हो. पाकिस्तान द्वारा वार्ता बहाल करने की इच्छा प्रकट करने के साथ भाजपा के लिए श्रेष्ठ विकल्प यही रहेगा कि वो घाटी में विकास को मुख्य एजेंडा बनाए, अलगाववादियों के साथ राज्य के शत्रु समान व्यवहार किया जाए और एक ऐसा राज्यपाल नियुक्त करे जिसे अपनी कुर्सी बचाने के बजाय शासन-व्यवस्था को प्रभावी बनाने की अधिक फिक्र हो. बीते सात दशकों में कश्मीर घाटी भारत के करीब आने के बजाय अवसरवाद और सुविधा पर आधारित राजनीति के अंधकारमय गर्त में वापस चली गई है. अगर हालात ज्यों के त्यों बने रहे तो यह अंधकार हमेशा के लिए प्रबल रहेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)