देश की स्वतंत्रता के लगभग 70 वर्ष बाद कुछ भारतीयों को उनका राष्ट्रवाद सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ रही है. ‘भारत माता की जय’ के नारे से संबंधित एक ऐसा अनावश्यक विवाद पैदा हो गया है जो उन सभी को देश-विरोधी के रूप में दर्शाने का प्रयास करता है जो इस नारे को लगाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन नहीं करते. प्रत्येक राजनीतिक दल अपने राष्ट्रवादी चरित्र का प्रचार करने के लिए इस नारे के प्रति अपनी निष्ठा का उपयोग करने का प्रयास कर रहा है जबकि कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम कार्यकर्ता अपनी इस राय पर कायम हैं कि केवल ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने से ही कोई देशभक्त नहीं बन जाता और वे इसकी बजाय एक अलग ढंग से देश की प्रशंसा करेंगे. उनका मानना है कि अगर वे यह नारा नहीं लगाते हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे इस देश से प्रेम नहीं करते.

हमारे स्वतंत्रता संघर्ष ने नागरिकों में राष्ट्रीय गौरव की भावना जागृत करने के लिए कई नारे ईजाद किए हैं. स्वतंत्रता संग्राम में शामिल बीते कल के कार्यकर्ताओं ने इस तथ्य पर बल देने के लिए ‘भारत माता की जय’ का नारा गढ़ा था कि एक गुलाम देश को राष्ट्रगौरव की अपनी स्वयं की भावना खोजनी होगी ताकि लोगों को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जागरूक किया जा सके. लोगों को प्रबुद्ध और प्रोत्साहित करने के लिए ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारों का इस्तेमाल भी किया गया था जो आजतक लोकप्रिय बने हुए हैं.

आने वाले 23 मार्च को शहीद भगत सिंह की शहादत की सालगिरह है, जिन्होंने अपना तन, मन और धन मातृभूमि के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया था. महज 23 वर्ष की आयु में मौत को गले लगाने वाले देश के सबसे विख्यात क्रांतिकारियों में से एक ने यह शब्द लिखे थे, ‘दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से वतन-ए-खुशबू आएगी.’  लेकिन उन दिनों सभी क्रांतिकारियों को एकजुट होने के लिए भारत माता की जय का नारा लगाना आवश्यक नहीं था, बल्कि देश को स्वतंत्र होते हुए देखना ही उन क्रांतिकारियों का एकमात्र बेहिचक और प्रज्वलित जुनून था. नारों पर एक-दूसरे के साथ झगड़ने के लिए उनके पास न ही समय था और न ही कोई वजह. भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की बेड़ियों से मुक्त कराना ही उनका एकमात्र और प्रमुख लक्ष्य था.

लेकिन आधुनिक भारत में, जहां राजनीति हर क्षेत्र पर पूरी तरह से हावी हो चुकी है, राष्ट्रभक्ति नारों का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जा रहा है कि सत्तारूढ़ सरकार की नजरों में कौन देशभक्त है और कौन नहीं. इमसें कोई शक नहीं कि ये बिल्कुल फूहड़ और तर्कहीन मत है क्योंकि किसी भी भारतीय के लिए अपना राष्ट्रवादी परिचय-पत्र पेश करना कतई जरूरी नहीं है. आखिर कोई व्यक्ति खुद को दूसरे व्यक्ति से अधिक देशभक्त होने का दावा किस प्रकार कर सकता है? यह एक ऐसा जोखिमपूर्ण मार्ग है जो भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी की समस्याओं से जूझने वाले इस देश की अखंडता को खतरे में डाल सकता है. हर नागरिक अपने तरीके से देश के विकास में योगदान देने के लिए कुछ न कुछ कर रहा है.

निजी तौर पर कहूं तो मैं ‘भारत माता की जय’ के नारे को पूर्ण रूप से समर्थन देता हूं लेकिन इस नारे को दोहराना नहीं चाहने वाले लोगों को देश विरोधी के रूप में वर्णित करने का कोई मतलब नहीं बनता. हो सकता है कि वे लोग देशभक्ति की भावनाओं को रखते हुए स्वयं को अलग तरह से अभिव्यक्त करना चाहते हों. इसी प्रकार, हमारे समाज के एक वर्ग को ‘वंदे मातरम’ के साथ इसलिए समस्या है क्योंकि कुछ मुसलमानों द्वारा इस नारे को उनकी समग्र धारणा के विरुद्ध बताया गया है. लेकिन इससे ज्यादा जरूरी यह है कि हम कितनी अच्छी तरह से अपने देश की सेवा कर सकते हैं. जब तक हम भारत को रहने के लिए एक मजबूत एवं बेहतर देश बनाने के लिए अपने श्रेष्ठ प्रयास करते रहेंगे, तब तक बाकी सब बेमानी हो जाता है.

राजनीतिज्ञों के पास खुद को लोकप्रिय बनाने का अपना तरीका होता है और किसी भी राजनीतिक दल को कतई नहीं भाता कि कोई व्यक्ति अथवा समूह उस की मौलिक अवधारणाओं से असहमति जताए. लेकिन राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल इस देश से सर्वोच्च नहीं हैं. साहिर लुधियानवी शायद इस महाद्वीप के सबसे उत्कृष्ट उर्दू कवियों में से एक थे. जब उन्होंने गुरुदत्त की ‘प्यासा’ में मोहम्मद रफी की अतुल्य आवाज में ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं’ उपहासात्मक छंद लिखा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इतने क्रुद्ध हो गए थे कि उन्होंने इस गीत को आॅल इंडिया रेडिया पर बजाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस गीत की बारीकियों की सराहना करने वाले लोगों को यह गीत सुनने के लिए रेडियो से लोन चलाना पड़ता था.

इस प्रकार राजनीतिज्ञ आलोचना से खफा हो जाते हैं और अपने दलों की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए निरंतर रूप से वैचारिक मुद्दों को ईजाद करते रहते हैं. कांग्रेस हमेशा से खुद को एक धर्मनिरपेक्ष संगठन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करती रही है, हालांकि भाजपा के भीष्म पितामाह लालकृष्ण आडवाणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कांग्रेस को बनावटी-धर्मनिरपेक्ष पार्टी और इसके समर्थकों को झूठे-धर्मनिरपेक्षतावादी कह कर पुकारा था. गोविंदाचार्य   की सलाह पर चलते हुए आडवाणी उन दिनों में अपनी भाव-भंगिमाओं और नए शब्दों के माध्यम से जनता का ध्यान आकर्षित में माहिर थे. भाजपा ने स्वयं को एक राष्ट्रवादी संगठन और हिंदुत्व एजेंडे वाली पार्टी के रूप में खुद का प्रचार करना शुरू कर दिया था. इसका निहितार्थ यह था कि इसका विरोध करने वाले राष्ट्र-विरोधी थे.

भाजपा अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए आज भी अपनी विभाजनकारी राजनीति का अनुसरण करते हुए हिंदुत्व और राष्ट्रवादी के एजेंडे का इस्तेमाल कर रही है, जिसने इसके आलोचकों को इसे बनावटी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में परिभाषित करने के लिए मजबूर कर दिया है. इस प्रकार राजनीति लोगों को एकजुट करने के बजाय उनमें फूट डाल रही है. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हलकों में गंभीर चिंता का विषय बन गया है. भारत को गहरी लोकतांत्रिक जड़ों वाली एक जीवंत और उभरती हुई महाशक्ति बनाने के लिए भविष्य में ऐसी कई विशाल चुनौतियां हैं जिन पर ध्यान केंद्रित किए जाने की सख्त आवश्यकता है. नारों को लेकर एक-दूसरे से झगड़ने से इस उद्देश्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती.

( ये लेखक के निजी विचार हैं )