भारत को टुकड़े-टुकड़े करने के नारे भले ही जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में गूंजे हों, लेकिन क्या हम इस बात से इनकार कर सकते हैं कि हमारी राजनीति ही भारत के टुकड़े-टुकड़े करने पर आमादा है. क्या विभिन्न राज्यों के कई छोटे राज्यों में विभाजन को हम ‘टुकड़े करने’ वाले नारे से अलग रख सकते हैं? क्या बिहार को छोटा करके झारखंड की स्थापना, उत्तरप्रदेश से अलग उत्तराखंड की स्थापना और हाल ही में आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग किया जाना सामान्य घटना के रूप में लिया जा सकता है? यहां गौर करने वाली बात यह है कि हाल के तीन-चार दशक में जितने भी राज्य अलग हुए हैं उसके लिए वहां के स्थानीय लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी है. पर मंथन का वक्त है कि क्या जिन सपनों को पूरा करने के लिए भारत के बड़े राज्यों के टुकड़े किए गए वे सपने पूरे हुए? विडंबना यह है कि राज्यों को छोटा करने का हाल देखने के बावजूद कई राज्यों को टुकड़ों में करने की राजनीति अब भी जारी है.

उत्तराखंड में फिलहाल जो राजनीतिक संकट आया है उससे सबक लेने की जरूरत है. यह छोटा राज्य जब उत्तरप्रदेश के साथ था तो तमाम विसंगतियों का हवाला देते हुए एक व्यापक आंदोलन छेड़ा गया. अलग राज्य बनाने में कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति तक दी. पर लोगों के सपनों का टूटना जारी है. किसी भी राज्य की तरक्की का पैमाना वहां की राजनीतिक स्थिरता से नापा जाता है. पर यह बेहद दुखद है कि उत्तराखंड जैसा शांतिप्रिय राज्य हमेशा से ही राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा. राज्य स्थापना के करीब 16 साल हो चुके हैं. इस दौरान राज्य ने अब तक आठ मुख्यमंत्री देख लिया है. अब 9वें मुख्यमंत्री बनाने की पटकथा लिखी जा चुकी है. सबसे अहम यह है कि इन आठ मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ एक मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी हैं, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. जबकि पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने 11 महीने बीस दिन, बीएस कोश्यारी ने तीन महीने 29 दिन, बीसी खंडूरी ने दो साल तीन महीने 15 दिन, रमेश पोखरियाल निशंक ने दो साल दो महीने 17 दिन, बीसी खंडूरी ने दूसरी पारी में छह महीने दो दिन, विजय बहुगुणा ने एक साल दस महीने 17 दिन ही पूरे किए. वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत का कार्यकाल अभी 2 साल एक महीने 18 दिन का ही हुआ है, लेकिन संकट के बादल मंडराने लगे हैं. किसी राज्य के मुखियाओं का यह संक्षिप्त कार्यकाल इस बात को बताने के लिए काफी है कि छोटे राज्यों में आपसी स्वार्थ की राजनीति किस तरह हावी रहती है. इसमें अपना भला ज्यादा और राज्य का भला कम ही होता है.

ठीक ऐसा ही हाल झारखंड का रहा है. झारखंड के 16 साल के राजनीति इतिहास में अब तक झारखंडवासियों ने तीन बार राष्टÑपति शासन और 10 बार मुख्यमंत्री को बदलते देख लिया है. यह कोई मामूली बात नहीं है कि एक छोटे से राज्य में इतना राजनीतिक परिवर्तन हो. स्वार्थ और परिवार की राजनीति इस कदर हावी रही कि अर्जुन मुंडा और शिबू शोरेन ने तीन-तीन बार मुख्यमंत्री के कुर्सी की शोभा बढ़ाई. शिबू शोरेन तो एक बार अपने बेटे को भी मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब रहे. उत्तराखंड और झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम रहा कि इन राज्यों की गिनती पिछड़े राज्यों की श्रेणी में लगातार नीचे की ओर जा रही है. उत्तराखंड में वर्ष 2013 में आई आपदा और उसके बाद की लूट-खसोट ने तो इस राज्य को तरक्की के कई साल पीछे धकेल दिया है. ठीक इसी तरह झारखंड में स्थानीय आंदोलन और नक्सलवाद की जड़ ने इस राज्य को कभी ऊपर ही नहीं बढ़ने दिया. औद्योगिक विकास की गति धीमी है. रोजगार का संकट यथावत है. नक्सलवाद लगातार बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में दूसरे राज्यों के लोगों को भी सोचना चाहिए कि क्या हम क्षेत्रीयता के हिसाब से जिन अलग राज्यों की मांग कर रहे हैं वह सही है?

हाल ही में आंध्रप्रदेश को छोटा करके तेलंगाना राज्य की स्थापना की गई है. अलग राज्य बनने और बनाने में लंबा आंदोलन हुआ. हजारों करोड़ रुपए बर्बाद हुए. यह अनुमान लगाना कठिन है कि इस राज्य का भविष्य क्या होगा, लेकिन जिस तरह किसानों की आत्महत्या का मामला सामना आता जा रहा है उससे यह अनुमान लगाना भी कठिन नहीं है कि आने वाले वर्षों में यह राज्य भी राजनीतिक उठापठक का केंद्र बनेगा.

तेलंगाना बनने के बाद अब फिर से भारत के कई राज्यों में अलग राज्य बनाने की राजनीति तेज हो गई है. महाराष्टÑ में अलग विदर्भ बनाने की राजनीति लंबे समय से चल रही है. अब फिर से इसकी सुगबुगाहट शुरू है. पश्चिम बंगाल को एक बार फिर से बांट कर गोरखालैंड बनाने की राजनीति तेज हो चुकी है. वहां आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में गोरखालैंड का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में होगा. नॉर्थ-ईस्ट को भी बांटने की बातें धीरे-धीरे उठती ही रही हैं. उत्तरप्रदेश को बांटने की राजनीति भी चलती ही आ रही है. भारत के इस सबसे पडेÞ प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो उत्तरप्रदेश को चार टुकड़ों में बांटने का राजनीतिक पासा काफी पहले ही फेंक दिया था. मायावती ने उत्तरप्रदेश को पूर्वांचल, बुदेंलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिमांचल में बांटने की मांग करके यहां के लोगों से राजनीतिक लाभ   लेने का सपना बुन रखा है. हो सकता है आने वाले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से इन्हीं टुकड़ों पर राजनीतिक रोटी सेंकी जाए.

पर भारत के लोगों के लिए यह समझने और तार्किक दृष्टि से मंथन का वक्त है कि हम अलग राज्य की मांग अपने हितों के लिए करते हैं या सच में हम राजनीति दलों और चंद राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाते हैं. अस्तित्व में बने छोटे-छोटे राज्यों से सबक लेने की जरूरत है, ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ी का भविष्य बेहतर कर सकें. नहीं तो हम यूं ही किसी विश्वविद्यालय में भारत को टुकड़े-टुकड़े करने की कसमें खाते रह जाएंगे.टुकड़े-टुकड़े होता भारत और बिखरते सपने

कुणाल वर्मा

भारत को टुकड़े-टुकड़े करने के नारे भले ही जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में गूंजे हों, लेकिन क्या हम इस बात से इनकार कर सकते हैं कि हमारी राजनीति ही भारत के टुकड़े-टुकड़े करने पर आमादा है. क्या विभिन्न राज्यों के कई छोटे राज्यों में विभाजन को हम ‘टुकड़े करने’ वाले नारे से अलग रख सकते हैं? क्या बिहार को छोटा करके झारखंड की स्थापना, उत्तरप्रदेश से अलग उत्तराखंड की स्थापना और हाल ही में आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग किया जाना सामान्य घटना के रूप में लिया जा सकता है? यहां गौर करने वाली बात यह है कि हाल के तीन-चार दशक में जितने भी राज्य अलग हुए हैं उसके लिए वहां के स्थानीय लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी है. पर मंथन का वक्त है कि क्या जिन सपनों को पूरा करने के लिए भारत के बड़े राज्यों के टुकड़े किए गए वे सपने पूरे हुए? विडंबना यह है कि राज्यों को छोटा करने का हाल देखने के बावजूद कई राज्यों को टुकड़ों में करने की राजनीति अब भी जारी है.

उत्तराखंड में फिलहाल जो राजनीतिक संकट आया है उससे सबक लेने की जरूरत है. यह छोटा राज्य जब उत्तरप्रदेश के साथ था तो तमाम विसंगतियों का हवाला देते हुए एक व्यापक आंदोलन छेड़ा गया. अलग राज्य बनाने में कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति तक दी. पर लोगों के सपनों का टूटना जारी है. किसी भी राज्य की तरक्की का पैमाना वहां की राजनीतिक स्थिरता से नापा जाता है. पर यह बेहद दुखद है कि उत्तराखंड जैसा शांतिप्रिय राज्य हमेशा से ही राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा. राज्य स्थापना के करीब 16 साल हो चुके हैं. इस दौरान राज्य ने अब तक आठ मुख्यमंत्री देख लिया है. अब 9वें मुख्यमंत्री बनाने की पटकथा लिखी जा चुकी है. सबसे अहम यह है कि इन आठ मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ एक मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी हैं, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. जबकि पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने 11 महीने बीस दिन, बीएस कोश्यारी ने तीन महीने 29 दिन, बीसी खंडूरी ने दो साल तीन महीने 15 दिन, रमेश पोखरियाल निशंक ने दो साल दो महीने 17 दिन, बीसी खंडूरी ने दूसरी पारी में छह महीने दो दिन, विजय बहुगुणा ने एक साल दस महीने 17 दिन ही पूरे किए. वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत का कार्यकाल अभी 2 साल एक महीने 18 दिन का ही हुआ है, लेकिन संकट के बादल मंडराने लगे हैं. किसी राज्य के मुखियाओं का यह संक्षिप्त कार्यकाल इस बात को बताने के लिए काफी है कि छोटे राज्यों में आपसी स्वार्थ की राजनीति किस तरह हावी रहती है. इसमें अपना भला ज्यादा और राज्य का भला कम ही होता है.

ठीक ऐसा ही हाल झारखंड का रहा है. झारखंड के 16 साल के राजनीति इतिहास में अब तक झारखंडवासियों ने तीन बार राष्टÑपति शासन और 10 बार मुख्यमंत्री को बदलते देख लिया है. यह कोई मामूली बात नहीं है कि एक छोटे से राज्य में इतना राजनीतिक परिवर्तन हो. स्वार्थ और परिवार की राजनीति इस कदर हावी रही कि अर्जुन मुंडा और शिबू शोरेन ने तीन-तीन बार मुख्यमंत्री के कुर्सी की शोभा बढ़ाई. शिबू शोरेन तो एक बार अपने बेटे को भी मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब रहे. उत्तराखंड और झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम रहा कि इन राज्यों की गिनती पिछड़े राज्यों की श्रेणी में लगातार नीचे की ओर जा रही है. उत्तराखंड में वर्ष 2013 में आई आपदा और उसके बाद की लूट-खसोट ने तो इस राज्य को तरक्की के कई साल पीछे धकेल दिया है. ठीक इसी तरह झारखंड में स्थानीय आंदोलन और नक्सलवाद की जड़ ने इस राज्य को कभी ऊपर ही नहीं बढ़ने दिया. औद्योगिक विकास की गति धीमी है. रोजगार का संकट यथावत है. नक्सलवाद लगातार बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में दूसरे राज्यों के लोगों को भी सोचना चाहिए कि क्या हम क्षेत्रीयता के हिसाब से जिन अलग राज्यों की मांग कर रहे हैं वह सही है?

हाल ही में आंध्रप्रदेश को छोटा करके तेलंगाना राज्य की स्थापना की गई है. अलग राज्य बनने और बनाने में लंबा आंदोलन हुआ. हजारों करोड़ रुपए बर्बाद हुए. यह अनुमान लगाना कठिन है कि इस राज्य का भविष्य क्या होगा, लेकिन जिस तरह किसानों की आत्महत्या का मामला सामना आता जा रहा है उससे यह अनुमान लगाना भी कठिन नहीं है कि आने वाले वर्षों में यह राज्य भी राजनीतिक उठापठक का केंद्र बनेगा.

तेलंगाना बनने के बाद अब फिर से भारत के कई राज्यों में अलग राज्य बनाने की राजनीति तेज हो गई है. महाराष्टÑ में अलग विदर्भ बनाने की राजनीति लंबे समय से चल रही है. अब फिर से इसकी सुगबुगाहट शुरू है. पश्चिम बंगाल को एक बार फिर से बांट कर गोरखालैंड बनाने की राजनीति तेज हो चुकी है. वहां आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में गोरखालैंड का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में होगा. नॉर्थ-ईस्ट को भी बांटने की बातें धीरे-धीरे उठती ही रही हैं. उत्तरप्रदेश को बांटने की राजनीति भी चलती ही आ रही है. भारत के इस सबसे पडेÞ प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो उत्तरप्रदेश को चार टुकड़ों में बांटने का राजनीतिक पासा काफी पहले ही फेंक दिया था. मायावती ने उत्तरप्रदेश को पूर्वांचल, बुदेंलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिमांचल में बांटने की मांग करके यहां के लोगों से राजनीतिक लाभ   लेने का सपना बुन रखा है. हो सकता है आने वाले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से इन्हीं टुकड़ों पर राजनीतिक रोटी सेंकी जाए.

पर भारत के लोगों के लिए यह समझने और तार्किक दृष्टि से मंथन का वक्त है कि हम अलग राज्य की मांग अपने हितों के लिए करते हैं या सच में हम राजनीति दलों और चंद राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाते हैं. अस्तित्व में बने छोटे-छोटे राज्यों से सबक लेने की जरूरत है, ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ी का भविष्य बेहतर कर सकें. नहीं तो हम यूं ही किसी विश्वविद्यालय में भारत को टुकड़े-टुकड़े करने की कसमें खाते रह जाएंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)