मीडिया में नरेंद्र मोदी सरकार के समग्र प्रदर्शन पर असंतोष प्रकट किए जाने के बावजूद उनकी सरकार और पूर्ववर्ती सरकारों की कार्यशैली में स्पष्ट रूप से जमीन-आसमान का अंतर है. बहरहाल, चायवाले से प्रचारक बने गुजराती प्रधानमंत्री द्वारा कार्यान्वित किए गए बदलावों की जानकारी के प्रसारण को जानबूझकर या फिर गलती से जनता तक उचित तरीके से प्रेषित नहीं करने के परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री द्वारा कार्यान्वित बदलावों के वास्तविक लाभों से जनता अभी भी अपरिचित है. नई सरकार के प्रारंभिक आर्थिक सर्वेक्षण में भारी चूक हुई जिसमें पिछली सरकार के प्रदर्शन पर एक उत्साहित और सकारात्मक रिपोर्ट कार्ड पेश किया गया था. ऐसा इसलिए था क्योंकि दोनों विवरण नौकरशाहों के एक ही समूह द्वारा लिखे गए थे और यह स्वाभाविक था कि वे यह तथ्य स्वीकार नहीं करना चाहते थे कि यूपीए सरकार के अंतिम 6 ‘अनर्थ वर्षों’ के दौरान उनके द्वारा अपनाए गए उपायों ने अर्थव्यवस्था को लगभग बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया था. राजकोषीय और वित्तीय नीति को निश्चित रूप से भारत में प्रतिवर्ष पर्याप्त रूप से अतिरिक्त रोजगार अवसर उत्पन्न करने के अपरिहार्य उद्देश्य की सेवा करने की आवश्यकता है ताकि 2019 में अगले लोकसभा चुनाव होने से पहले देशभर के शहरों में सरकार-विरोधी आंदोलनों को शुरू होने से रोका जा सके.

नॉर्थ ब्लाक के बाबुओं को उच्च-विकास के माध्यम से राजस्व घाटे की क्षतिपूर्ति करने वाली कर-संरचनाओं की बनावट करने के बजाय लंबे समय से बजट को एकल वर्षीय शर्तों के नजरिए से देखने के लिए अनुकूलित किया गया है. निम्न-कर, भद्र अनुपालन और सीबीआई द्वारा खुद को बैंकिं ग प्रणाली के सर्वशक्तिमान लोकायुक्त अवतार में प्रस्तुत करने के प्रयास को त्यागने के बाद निवेशकों का भरोसा भारतीय अर्थव्यवस्था में एकबार फिर से जगेगा और धन-संपन्न कंपनियां फिर से देश में भारी निवेश करने की संभावनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगी. इसके अलावा शेयरों की कीमतों में भी वृद्धि होगी ताकि राज्य द्वारा समता-मंदन के किसी भी प्रयास से कम कीमतों के कारण थोड़े समय के लिए हुए कर-नुकसान की पर्याप्त भरपाई की जा सके. उदाहरण के लिए, अगर काला धन विधेयक में निम्न कर दरों और अर्थदंडों को सम्मिलित किया गया होता तो इसने अब तक अपने मौजूदा एकत्रीकरण सेकई गुणा अधिक राजस्व का संचय कर लिया होता. प्रत्यक्ष करों के मामले में 300 प्रतिशत का जुर्माना आमतौर पर किसी भी व्यक्ति अथवा कंपनी को दिवालिया बना देगा.

जैसा कि तमिलनाडु में नोकिया के साथ हुआ, किसी कंपनी को बर्बाद करने अथवा किसी कारोबारी को जेल भेजने से आम जनता को किसी भी तरह का कोई फायदा नहीं होता. लेकिन विश्वास और आर्थिक दंडों की रााशि को कम करके ऐसा माहौल बनाया जा सकता है जिसमें व्यक्ति अथवा कंपनी को धन-प्रकटीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात में स्थिरता एवं विकास सुनिश्चित करने की कहानी को अपनी आंखों से देखने वाले लोग अब प्रधानमंत्री से शीघ्र ही ऐसी अनावश्यक एवं कष्टदायी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से मुक्ति दिलाने की आस लगाए बैठे हैं जिनका एकमात्र मकसद भ्रष्ट अधिकारियों की जेबें भरना है. वे स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात सम्मिलित किए गए औपनिवेशिक कानूनों को दरकिनार किए जाने की उम्मीद कर रहे होंगे जिनमें से प्रत्येक कानून औपनिवेशिक अवमानना और नागरिक के अविश्वास से परिपूर्ण है.

जब एक नागरिक और अधिकारी का आमना-सामना होता है तो अधिकारी अपनी भाव-भंगिमाओं से यह संकेत देने का प्रयास करता है कि नागरिक या तो मूर्ख है या फिर धूर्त है और इसलिए वह अधिकारी के विवेक अथवा विचार के अयोग्य है. भ्रष्टाचार-विरोधी कानून की हर परत और परिणामी एजेंसियों ने कम नहीं बल्कि अधिक रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया है और यह गंदगी केवल तभी दूर की जा सकती है जब पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रियाओं को शुरू किया जाए. एक प्रक्रिया और प्रणाली उस समय तक निरर्थक है जब तक उससे लोगों के लिए फायदेमंद उत्पाद को उत्पन्न नहीं किया जाता. भारत में कई प्रक्रियाएं उत्पादों और परिणामों को सुगम बनाने के बजाय उन्हें अवरुद्ध करती हैं. मतदाता नरेंद्र मोदी से आशा करते हैं कि वह शासन की वर्तमान औपनिवेशिक प्रणाली के स्थान पर 21वीं सदी का ऐसी शासन प्रणाली स्थापित करें जो कार्य की स्वायत्तता और स्वतंत्रताओं के प्रति व्यक्ति के अधिकार को मान्यता दे.

भारत एक ऐसी विदेश नीति की भी प्रतीक्षा कर रहा है जो लौकिक सिद्धांतों के अनुपालन के बजाय पूरी तरह से देश की सुरक्षा और विकास की आवश्यकताओं के अनुकूल हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संदर्भ में विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (चीन व अमेरिका) के बीच संतुलन बैठाने का प्रयास करते हुए दिखाई पड़ते हैं. अमेरिका के संदर्भ में भारत को सुरक्षा के मामलों में वाशिंगटन को अपना प्राथमिक भागीदार बनाना होगा और तीन डिफेंस फाउंडेशन अनुबंधों पर हस्ताक्षर करना इस दिशा में एक सही शुरुआत होगी. जहां तक चीन का सवाल है, उसमें अगले पांच वर्ष में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और हमारे कॉरपारेट क्षेत्र को बड़े कर्ज देने के माध्यम से इस देश में सबसे बड़े निवेशक के रूप में उभर कर   सामने आने की प्रबल संभावना है. इसमें कोई संदेह नहीं कि बीजिंग भारत व अमेरिका के बीच घनिष्ठ सुरक्षा संबंधों पर पैनी निगाह रखेगा लेकिन जिस तरह भारत की व्याकुलता ने चीन को पाकिस्तान के प्रति उदारशील रवैया अपनाने से रोका नहीं है, ठीक उसी तरह भारत को भी चीन की शंकाओं की परवाह किए बगैर अमेरिका के साथ मजबूत रक्षा संबंध बनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखानी चाहिए. अगर भविष्य में आईएसआईएस भारत पर हमला करता है तो भारत को उसके नियंत्रण वाले स्थानों पर हमला करके प्रतिक्रिया देनी होगी और उस स्थिति में अमेरिका के साथ पारस्परिक रूप से लाभप्रद अनुबंधों में प्रवेश करने से भारत के लिए जवाबी कार्रवाई के कई विकल्प मौजूद रहेंगे. उसी समय, भारत में चीनी निवेश और पयर्टन पर पूर्ववर्ती बाधाओं को हटाना होगा ताकि देश में नौकरियों का स्थानांतरण संभव हो सके.

प्रधानमंत्री के आलोचकों और निंदकों के बावजूद यह भविष्यवाणी करना सुरक्षित होगा कि मोदी की अनूठी कार्यशैली द्वारा किए गए बदलावों को हमारे देश में अगले दो वर्षों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा. इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि 2019 तक भाजपा कितने राज्य चुनाव जीतती और हारती है क्योंकि नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण तो 2019 लोकसभा चुनाव में ही होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)