16 मई 2016 को होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों की पूर्व तैयारी में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने तमिल टाइगर्स के कट्टर समर्थकों से लाभ उठाने के एक स्पष्ट प्रयास में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई से संबंधित मुद्दे को एकबार फिर उठाया है. राज्य सरकार ने केंद्र से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 के अंतर्गत दोषियों की रिहाई का आदेश देने की अनुमति मांगी है. हालांकि केंद्र ने राज्य सरकार के अधिकारिक संपर्क पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन कांग्रेस और द्रमुक दोनों द्वारा मुख्यमंत्री पर लोगों की भावनाओं का शोषण करके लाभ उठाने का आरोप लगाने के साथ इस मामले ने प्रतिद्वंदी गुटों के बीच शब्दों के युद्ध को भड़का दिया है. इसके अलावा, मुख्यमंत्री की कार्रवाई को अपने आप में चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन के रूप में समझा जा सकता है.

राजीव गांधी की वीभत्स हत्या के रहस्य का आज भी राज्य में होने वाले हर चुनाव में केंद्र बिंदु बना रहना जारी है लेकिन आज भी पुलिस और राजनीतिक हलकों में कई का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री को खत्म करने की साजिश को कभी भी पूरी तरह से सुलझाया नहीं गया था और हत्याकांड की जांच में कई महत्वपूर्ण खामियां रह गई थी. मार्क साल्टर की हाल ही में प्रकाशित किताब लिट्टे के विचारक दिवंगत एंटन बालासिंघम को उद्घृत करती है कि राजीव गांधी की हत्या उनकी सबसे बड़ी गलती थी. बालासिंघम ने कहा था कि हालांकि लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरण और उसके खुफिया प्रमुख पोट्टु अम्मान ने शुरू में अपनी संलिप्तता से इनकार किया था, उन्होंने अंतत: स्वीकार किया था कि पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या लिट्टे का ही काम था. जो सवाल यहां सामने आता है वो यह कि क्या प्रभाकरण ने उसके संगठन द्वारा इस हत्याकांड में शामिल न होने के बावजूद क्या सिर्फ इसलिए राजीव गांधी की हत्या का श्रेय लिया था क्योंकि इससे दुनियाभर में उसके नाम की दहशत फैल जाती? चूंकि लिट्टे ने कभी भी आधिकारिक तौर पर कभी यह दावा नहीं किया कि राजीव की हत्या उसके गुप्तचरों का काम था, लोगों को सच जानने का पूरा अधिकार है. लेकिन एक प्रासंगिक सवाल जिसका आज तक कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया है वो यह कि भारतीय जांचकर्ताओं के अनुसार अगर लिट्टे इस हत्या में वास्तव में शामिल था तो फिर मुख्य संदिग्ध और कथित मास्टरमाइंड सिवारासन उर्फ राजा अरुमइनायगम और उसके साथी मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के बाद वापस जाफना लौटने के बजाय तमिलनाडु और कर्नाटक में अलग-अलग स्थानों पर छुपने क्यों चले गए? राजीव गांधी की हत्या के ठीक 3 माह बाद सुरक्षा एजेंसियों ने सिवारासन, सुब्बा और कुछ अन्यों को बैंगलोर में एक मकान में खोज निकाला और उन्हें चारों ओर से घेर लिया. लेकिन जब तक एनसीजी कमांडो अत्याधिक विलंब के बाद आखिरकार मकान के अंदर दाखिल हो पाते, उससे पहले ही सभी सात सहवासी कथित तौर पर आत्महत्या कर चुके थे.

सिवारासन ने 9एमएम पिस्टल के साथ स्वयं को गोली मार ली थी, जबकि अन्यों ने साइनाइड कैप्सूल का सेवन किया था. हैरत की बात है कि मृत आतंकवादियों के शवों को पाए जाने के समय वे सभी एक-दूसरे का अलिंगन करते हुए पाए गए थे. सिवारासन और सुब्बा को ढूंढने की मुहिम की शुरुआत तब हुई जब पुलिस को एक फ्रीलांस फोटोग्राफर व लिट्टे समर्थक एस हरिबाबू के चिनोन कैमरे से दस तस्वीरें मिली. ऐसा माना जाता है कि हरिबाबू को हत्यारों ने घटना का फिल्मांकन करने के लिए काम पर लगाया था. तस्वीरें खींचने के समय हरिबाबू भी कथित हत्यारे धानू द्वारा मानव बम को विस्फोट से उड़ाने के परिणामस्वरूप हुए शक्तिशाली विस्फोट में मारा गया था.

विशेष जांच दल ने धारणा बनाई कि हरिबाबू द्वारा खींची गई तस्वीरें प्रामाणिक रूप से असली हत्यारों की ओर संकेत कर रही थी और उन्होंने इसे पुख्ता सुराग मानते हुए जांच को आगे बढ़ाया. दुनियाभर में राजनीतिक हत्याओं ने इस तथ्य को दृढ़ता के साथ स्थापित किया है कि गुप्त रखने का प्रयास किसी भी षड्यंत्र का प्रमुख अंग है. यही वजह है कि इसी पहलू के कारण आज भी जॉन एफ कैनेडी, अब्राहम लिंकन, राबर्ट एफ कैनेडी, मार्टिन लूथर किंग और कई अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तियों की हत्या का रहस्य आज भी जासूसों को परेशान करता है. क्या राजीव गांधी की हत्या में सिवारासन और उसके साथियों के बजाय अन्य कई बड़े नाम भी शामिल थे? क्या हत्या की योजना को अमल में लाने वाला सिवारासन उस समय लिट्टे का एक कार्यकर्ता था या फिर अपने आकाओं से अलग हो चुका था? फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के दिवंगत नेता यासर अली अराफत ने 1991 में राजीव गांधी को उन्हें खत्म करने के लिए बनाए जा रहे षड्यंत्र के बारे में सतर्क किया था. क्या यह चेतावनी अराफत द्वारा प्राप्त अंतरराष्ट्रीय खुफिया जानकारी पर आधारित थी जिसे बाद में गांधी परिवार तक पहुंचाया गया था? गौरतलब है कि शुरू में राजीव गांधी को कांग्रेसी प्रत्याशी और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष मर्गथम चंद्रसेखन की पुत्री लता प्रियाकुमार के लिए चुनाव प्रचार करने श्री पेरुमबुदूर नहीं जाना था. राजीव ओडिशा की यात्रा पर थे और उन्हें 21 मई 1991 को दिल्ली वापस पहुंचना था,   लेकिन अंतिम समय पर उनके कार्यक्रम में फेरबदल करते हुए तमिलनाडु को भी उनकी चुनावी यात्राओं में जोड़ दिया गया था.

राजीव के कार्यक्रम में बदलाव करने वाले आखिर कौन थे और क्या विशेष जांच दल ने कभी उन लोगों से पूछताछ की?  राजीव गांधी की हत्या के समय पर इस मामले से संबंधित राजनीतिक अफवाहों में कई प्रमुख राजनेताओं और एक प्रमुख धर्मगुरु के नाम पर भी संदेह व्यक्त किया गया. जांच करने वाले कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की आपराधिका मामलों में उनकी अनुभवहीनता को देखते हुए उनकी योग्यता पर भी सवाल उठाए गए. क्या राजीव गांधी की हत्या में किसी विदेशी ताकत अथवा राजनीतिक प्रतिष्ठान का हाथ था? क्या इंदिरा गांधी और उनके दो पुत्रों की अप्राकृतिक मौतों के बीच कोई कड़ी थी? यह राष्ट्र इन कई अनसुलझे सवालों का जवाब जानना चाहता है.   

(ये लेखक के निजी विचार हैं)