नई दिल्ली.  छोटी मछली को पकड़ने के बजाय बड़ी मछली को जाल में फंसाने के लिए भारत को अमेरिकी शैली वाले कानूनों के उदारचित कार्यान्वयन की आवश्यकता है, जो बड़े सह-अपराधियों के बारे में दोषसिद्ध करने वाले सबूत जुटाने की स्थिति में अपराध के संदिग्धों के लिए प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं. सार्वजनिक संस्थानों की लूट में जितना हाथ कारोबारियों का है, उतना ही भ्रष्टाचार में गुप्त रूप से सहयोग देने वाले और वित्तीय धोखाधड़ी में हिस्सा मांगने वाले उच्च स्तरीय राजनीतिज्ञों और अधिकारियों का भी है. यदि उच्च पदों में ऐसे ही अधिक सह-अपराधियों को बाहर निकाला जाएगा, यह देश उतनी ही तीव्र गति से एक पारदर्शी और नैतिक शासन प्रणाली की ओर अग्रसर होगा.
 
आजकल सुर्खियों में छाए युनाइटेड ब्रेवरीज (यूबी) के पूर्व स्वामी विजय माल्या को एक उत्तम मेजबान के रूप में जाना जाता है. माल्या के आलीशन बंगलों में मेहमान के रूप में गए मंत्री, पूर्व-मंत्री, अधिकारी और पूर्व-अधिकारी माल्या के उत्कृष्ट अतिथि-सत्कार और आकर्षण से प्रभावित होकर मुख पर बड़ी मुस्कान के साथ वहां से लौटते हैं. ऐसे अनुभव के बाद अस्थिर उद्यमों को धन देने के लिए हजारों करोड़ों रुपए के चेक पर हस्ताक्षर करने के लिए उन्हें कौन दोष दे सकता है और वो भी जब यह धन उनका नहीं बल्कि करदाताओं का हो? ऐसा माना जाता है कि भारत में मीडिया स्वतंत्र रूप से कार्य करती है, इसलिए किंग ऑफ गुड टाइम्स की विलासितापूर्ण मेहमाननवाजी का नियमित रूप से आनंद लूटने वाले राजनीतिक और सरकारी कुलीन लोगों की विस्तृत सूची का सार्वजनिक न होना हैरान करता है. 
अब जबकि विजय माल्या अरबपतियों का सम्मान करने वाले लंदन में आराम फरमा रहे हैं, वह वहां रहने के दौरान यूके में अपने नियंत्रण वाले कारोबार के साथ अपने दूसरे विदेशी व्यापार का संचालन भी कर सकते हैं. वह अपने भारतीय पासपोर्ट की उचित कीमत पर नागरिकता प्रदान करने वाले कई देशों में से एक के पासपोर्ट के साथ अदला-बदली कर सकते हैं.
 
अनुपस्थित माल्या की कमी भारत में महसूस की जाएगी लेकिन चूंकि उनके अधिकांश दोस्त अक्सर विदेश यात्राएं करते रहते हैं, उन्हें विदेश में माल्या द्वारा आयोजित भव्य पार्टियों में भाग लेने का अवसर मिलता रहेगा. चाहे भारत हो या लंदन या अमेरिका, माल्या की रंगीन मिजाजी में कोई बदलाव नहीं आने वाला. अगर माल्या अपने आलोचकों को भौचक्का करते हुए भारत लौटते हैं तो उन्हें उन लोगों की पहचान का खुलासा कर देना चाहिए जिन्होंने बैंकिं ग प्रणाली को माल्या की डांवाडोल कंपनियों को हजारों करोड़ रुपए का कर्ज देने के लिए विवश किया. अगर माल्या वीवीआईपी लोगों की संलिप्ता का ठोस सबूत देते हैं तो वह निश्चित रूप से उदार और नर्म व्यवहार के हकदार हैं. यह व्यक्ति पहले से जितना नुकसान कर सकते थे, कर चुके हैं. अगर माल्या वीवीआईपी सहयोगियों द्वारा दी गई अवैध सहायता का पुख्ता सबूत प्रदान करके प्रायश्चित करते हैं तो अमेरिकी मॉडल का अनुसरण करते हुए उन्हें दोषमुक्त करने में कोई बुराई नजर नहीं आती. 
 
एक कारोबारी को केवल जेल भेजने से उसकी गतिविधियों के परिणामस्वरूप बैंक कोषों में आए अंतर को पूरा नहीं किया जा सकता. कारावास के तीसरे वर्ष में प्रवेश करने वाले सहारा प्रमुख सुब्रतो रॉय को के मामले को ही लें. रॉय के लिए कारावास के भीतर रहने के बजाय वहां से बाहर आकर उनसे मांगे गए धन को जुटा पाना शायद थोड़ा आसान हो, लेकिन जेल में रहकर एक संतोषजनक व्यापारिक सौदे को अंजाम देना नामुमकिन नहीं तो बेहद कठिन जरूर है. कारोबारी को जेल भेजने के बजाय गंवाए गए धन की वसूली ज्यादा आवश्यक है. इसलिए ऐसे नए तरीके खोजने की आवश्यकता है जिनमें ऐसे धन की वसूली की जा सके. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने हाल ही में इस आधार पर नकदी संपन्न कंपनी(एफटीआईएल) के साथ (एनसईएल) के जबरन विलय का आदेश दिया है कि दोनों का प्रबंधन एक ही व्यक्ति द्वारा किया जा रहा था. 
 
दिलचस्प बात यह है कि जबकि इस व्यक्ति को विदेशी मुद्रा में आई मंदी के बाद कानून की कठोरता का सामना करना पड़ा, सेबी या अन्य सरकारी एजेंसियों द्वारा संदिग्ध लेन-देन में शामिल दलालों और बकाएदारों के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई की जाती हुई नहीं प्रतीत होती. यह तो तय है कि ऐसी शरारत केवल एक व्यक्ति द्वारा ही नहीं की जा सकती. अब से दो माह बाद, निवेशकों को दोषपूर्ण उत्पादों की बिक्री करने वाले संदिग्ध दलाल तीन वर्षीय नियम के तहत उन लेन-देन के सबूत मिटाने में सक्षम हो जाएंगे. अगर सेबी इस निष्क्रिय स्पॉट एक्सचेंज में संदिग्ध लेनदेन के विस्तृत फोरेंसिक आॅडिट कराने की अनुमति नहीं देती तो सीबीआई को इस पर सवाल उठाना चाहिए. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने एनएसईएल-एफटीआईएल पर नवप्रवर्तनशील निर्णय के साथ दो कंपनियों के जबरन विलय की नई मिसाल कायम की है. सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने सुझाव दिया है कि किंगफिशर एयरलाइंस मामले में युनाइटेड बे्रवरीज में उस इकाई के विलय के माध्यम से उसी मार्ग का अनुसरण किया जाना चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों के विलय से किंगफिशर एयरलाइंस में एकबार फिर नए जीवन का संचार होगा. अधिकांश   प्रतिद्वंदी एयरलाइंस से बेहतर सेवाएं एवं सुविधाएं प्रदान करने वाली किंगफिशर एयरलाइंस को बचाने के लिए दोनों का विलय करना आवश्यक हो जाता है. 
 
केवल किंगफिशर मामले में ही नहीं बल्कि वित्तीय लापरवाही के कारण वाणिज्यिक बैंकों के साथ अन्य ऋण-दोष मामलों में भी एनएसईएल-एफटीआईएल विलय का अनुसरण करते हुए इस तरह के विलयों को कार्यान्वित किया जाना चाहिए. अगर लाभ कमाने वाली इकाइयां तकनीकी रूप से विदेशी स्वामित्व की हैं तब भी भारत में कानूनों को संशोधित करके उन इकाइयों का एक ही प्रबंधन द्वारा संचालित अन्य इकाइयों के साथ विलय किया जा सकता है जिन्होंने घरेलू बैंकों के ऋणों का जानबूझ कर भुगतान नहीं किया है. 
वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली को उनके मंत्रालय द्वारा कायम मिसाल का विस्तार करने की आवश्यकता है. करदाता पर अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय अनर्जक परिसंपत्तियों में महत्वपूर्ण कटौती करके नरेंद्र मोदी सरकार बैंकिंग प्रणाली को वापस स्वस्थ कर सकती है. 
    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)