नई दिल्ली. लोग कहते हैं कि धर्मगुरुओं के व्यवसाय जैसा और कोई व्यवसाय नहीं क्योंकि धर्मगुरुओं को रोजाना शेव करने की जरूरत नहीं पड़ती, उनका काम करने का कोई निश्चित समय तय नहीं होता, विदेश यात्रा करने का अवसर मिलता है और आगे-पीछे चापलूसों की भीड़ लगी रहती है. कोई आश्चर्य नहीं कि संतों और स्वयंभू देवदूतों को चिरकाल से हमारे आसपास देखा गया है, जिनमें से अधिकांश बलिदान और ज्ञान का प्रतीक हैं. कुछ ने पहाड़ों और गुफाओं को अपना प्राकृतिक निवास बनाया तो दूसरों ने सिंहासन के परामर्शदाताओं के रूप में महलों और किलों में अपना डेरा जमाया, जहां राजा और रानी समस्याओं के समाधान के लिए और मोक्ष की प्राप्ति के लिए उन संतों की शरण में जाते थे.
 
आज 21वीं सदी में हमारे बीच अभी भी सभी रंगों और धर्मों के गुरु और धर्मोपदेशक हैं, जिनके पास मजबूत सामुदायिक, जातीय अथवा धार्मिक समर्थन प्राप्त है. अगर अतीत में वे राजघरानों के संरक्षण में थे तो आज वे राज्य-व्यवस्था के शीर्ष नेताओं के संरक्षण का आनंद उठा रहे हैं क्योंकि वे वोट बैंकों का प्रतिनिधित्व करते हैं और जनता की राय को प्रभावित करते हैं. पंजाब से केरल तक, गुजरात से असम तक, यह राष्ट्र ऐसे पुरुषों व महिलाओं से भरा पड़ा है जो शासक वर्ग के लिए आध्यात्मिक सलाहकारों की भूमिका निभाते हैं और आम जनता के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं. इस प्रक्रिया में, उनमें से कुछ किंगमेकरों की छवि और सरकार की नीतियों के प्रभावकों की छवि अर्जित कर लेते हैं.
 
श्रीश्री रविशंकर और बाबा रामदेव को ही लीजिए, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किया है. मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में उनकी बढ़ती हुई दृश्यता और रसूख संस्थापन में गुरु के नए सिरे से महत्व का संकेत है. दोनों की इस राष्ट्र के उच्चतर व पराक्रमी हस्तियों तक सुगम पहुंच है और प्रत्येक राजनीतिक दल में इन दोनों के अनुयायिओं को आसानी से पाया जा सकता है. चाहे कॉरपोरेट दिग्गज हों, बॉलीवुड सितारे या राजनयिक, हर कोई इनका आदर करता है और पांव छूता है.
 
प्रधानमंत्री मोदी भी उनके आकर्षण से अछूते नहीं रहे हैं. गत सप्ताह, जब प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में यमुना किनारे आयोजित विश्व सांस्कृतिक महोत्सव में भाग लेने और वहां उपस्थित जनसभा को संबोधित का मन बनाया तो इसने भारत के पवित्र प्रतीकवाद की प्रासंगिकता, प्रभावशीलता, स्वीकार्यता और विश्वसनीयता को पुन: प्रबलित किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समारोह स्थल पर तीन घंटे से अधिक समय तक रहे और श्रीश्री रविशंकर और उनके आर्ट आॅफ लिविंग फाउंडेशन में प्रधानमंत्री के अडिग विश्वास पर किसी को किंचित मात्र भी संदेह नहीं रहा. न केवल और उनके मंत्रियों ने इस कार्यक्रम की आलोचना को सिरे से खारिज किया, बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि विश्व सांस्कृतिक महोत्सव को सफल बनाने के लिए राज्य की सारी ताकत झोंक दी जाए. नरेंद्र मोदी ने विश्व सांस्कृतिक समारोह को सभी संस्कृतियों का महाकुंभ बताया.
 
प्राचीनकाल के महाराजाओं की तरह, नरेंद्र मोदी भी नए जमाने के गुरुओं की उपयोगिता को भली-भांति समझते हैं. प्रधानमंत्री मोदी को बारीकियों पर ध्यान देने के लिए जाना जाता है और वे जानते हैं कि आर्ट आॅफ लिविंग प्रमुख और बाबा रामदेव दोनों ही दो प्रमुख सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं. श्रीश्री रविशंकर प्रधानमंत्री को संभ्रांत वैश्विक अनुयायी वर्ग के साथ जोड़ते हैं. श्रीश्री के प्रशंसकों और अनुयायिओं में भारत के सभी हिस्सों का उच्च मध्यम वर्ग के साथ-साथ पश्चिमी जगत और मुस्लिम प्रभुत्व वाले पश्चिमी एशिया के नेता भी शामिल हैं. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उनका संगठन दुनिया के कई हिस्सों में लोगों की बड़ी संख्या जुटाने में बहुत कौशल और विशेषज्ञता रखता है. यह देखते हुए कि मोदी अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय प्रवासी और रसूखदार लोगों को आकर्षित करने का इरादा रखते हैं, आर्ट आॅफ लिविंग के रूप में उन्हें एक स्वाभाविक सहयोगी मिल गया है. नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने के बाद से आर्ट आॅफ लिविंग फाउंडेशन ने उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ मिलाया है. हालांकि, भारत-पाक संबंधों पर रविशंकर का नजरिया प्रधानमंत्री व संघ परिवार के नजरिए से भिन्न है, नरेंद्र मोदी ने आर्ट आॅफ लिविंग के गुरु को पाकिस्तान के लोगों के साथ संपर्क बनाने की अनुमति दे दी है. गौरतलब है कि आर्ट आॅफ लिविंग के जम्मू-कश्मीर में भी प्रभावशाली संपर्क हैं, जहां इसे केंद्र सरकार के साथ सबसे धर्मनिरपेक्ष कड़ी के रूप में देखा जाता है.
 
अगर रविशंकर विश्व और उदार भारत के साथ अपने संबंध के कारण प्रधानमंत्री के लिए उपयोगी हैं तो वहीं बाबा रामदेव ग्रामीण व शहरी मध्यम एवं गरीब वर्ग को मोदी तक पहुंचाते हैं. पिछड़ी जाति से संबंध रखने वाले बाबा रामदेव ने ‘सबकुछ देसी’ को अपनी सफलता का मूलमंत्र बना लिया है और वह ऐसे दुर्लभ आध्यात्मिक गुरुओं में से हैं जिनके पास शायद ही कोई औपचारिक शिक्षा और प्रशिक्षण है. 50 वर्षीय बाबा रामदेव ने आम आदमी तक योग पहुंचाने के लिए पतंजलि संस्थान शुरू किया और दो दशकों की अवधि में देशभर में 2.5 करोड़ से अधिक अनुयायी बना लिए हैं. उनके योग शिविरों में रोजाना 10 हजार से अधिक लोग भाग लेते हैं. जबकि श्रीश्री अच्छे स्वास्थय के लिए श्वास को एक साधन के रूप में बढ़ावा देते हैं तो वहीं बाबा रामदेव शारीरिक व्यायामों पर जोर देते हैं. पिछले कुछ वर्षों में, नरेंद्र मोदी हरिद्वार स्थित बाबा रामदेव के आश्रम में अक्सर जाते रहे हैं और आध्यात्मिकता से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण आधिकारिक समारोह में शिरकत करने के लिए हमेशा बाबा को आमंत्रित करते रहे हैं.
 
रामदेव और श्रीश्री और नरेंद्र मोदी के बीच आस्था का संबंध हो सकता है, लेकिन समालोचकों का मानना है कि यह संबंध परस्पर-लाभ की समझ पर आधारित है. मोदी विरोधियों ने पहले से ही राजग सरकार पर दोनों गुरुओं को भारी वित्तीय व अन्य रियायतें देने का आरोप लगाया है. वे ध्यान दिलाते हैं कि नई दिल्ली में विश्व सांस्कृतिक महोत्सव के लिए के लिए केंद्र सरकार ने न केवल भारी ग्रांट दी बल्कि समारोह स्थल पर बुनियादी ढांचे का निर्माण करने के लिए सेना से भी काम लिया. आर्ट आॅफ लिविंग द्वारा मिनरल वाटर और टूथपेस्ट जैसे दैनिक उपयोग के उत्पादों की बिक्री के साथ उनके संदेह और पुख्ता हो रहे हैं. वहीं दूसरी ओर बाबा रामदेव ने कभी भी अपने व्यावसायिक हितों को जनता से छुपाया नहीं है. उनकी पतंजलि के नियमित ग्राहकों में आम जनता के साथ-साथ विभिन्न सरकारी एजेंसियां व रक्षा मंत्रालय भी शामिल हैं. 
 
दोनों के प्रशंसकों व संसाधनों की बड़ी संख्या को देखते हुए, आर्ट आॅफ लिविंग और पतंजलि की सरकार पर निर्भरता काफी चौंकाने वाली है और उनकी विश्वसनीयता को मंद करती है. लेकिन, ब्रांड मोदी के लिए भारत और विदेशों में भारतीयों के मौलिक खंड को सम्मोहित करने वाले श्रीश्री और रामदेव का समर्थन करना एक सस्ता व फायदेमंद सौदा है. 
    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)