नई  दिल्ली. विजय माल्या को विदेश भागना ही था, वह भाग भी गया. बैंक वाले सिर पीटते रह गए. माल्या के देश से निकल जाने के बाद भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) ने भी अपने नए नियम लागू किए हैं. केंद्र सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री ने भी शनिवार को आईएमएफ की ओर से आयोजित एडवांसिंग एशिया शिखर सम्मेलन में बड़ा बयान दिया है. प्रधानमंत्री ने कहा है कि बैंकों और रेगुलेटर्स के फैसलों में भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी. राजनीतिक बयानबाजी भी अलग तरीके से संभल-संभल कर लगातार जारी है. पर इन सबसे इतर सबसे अधिक खुश भारत का आम आदमी है. 
 
भारत के एक साधारण आदमी या किसी बैंक के एक साधारण कस्टमर के खुशी के वैसे तो अनेक कारण हो सकते हैं, पर इस वक्त सबसे अधिक खुशी इस बात से है कि एक कस्टमर ने ही बैंकों को उनकी हैसियत से रू-ब-रू करा दिया है. वह भी दबंग तरीके से. नहीं तो भारत की सरकारी बैंकिंग प्रणाली इस हद तक भ्रष्टाचार की दलदल में धंसती जा रही है, जहां सबसे अधिक प्रताड़ित आम आदमी ही होता है. एक साधारण व्यक्ति को होम लोन से लेकर एजुकेशन लोन लेने के लिए जिस तरह मानसिक प्रताड़ना के दौर से गुजरना पड़ता है उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. अगर किसी कारण से आपकी ईएमआई लेट हो गई तो पेनाल्टी लगाकर आपको आपकी औकात याद दिलाई जाती है. इससे भी अधिक कई बार ऋण वसूली के लिए रखे गए लोगों की दबंगई भी आप सरेआम देख सकते हैं. ऐसे में जब विजय माल्या जैसा डिफॉल्टर बैंकों की तमाम हेकड़ी को दरकिनार करते हुए उन्हें ठेंगा दिखाता है तो दिल को सुकून जरूर मिलता है, चलो कोई तो है जो इन बैंकों को उनकी औकात से रू-ब-रू करा रहा है. 
 
 
आज के दौर में नौ हजार करोड़ रुपए कोई बड़ी रकम नहीं है. पर जब यह रकम लोन के पैसे की हो तो हाय-तौबा मचनी तय थी. इस वक्त विजय माल्या को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर बखूबी चल रहा है. पर इन आरोपों के बीच असली मुद्दे गौण हैं. कोई इस बात पर चर्चा करने को तैयार नहीं है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि बैंक लगातार विजय माल्या जैसे डिफॉल्टर को लोन पर लोन दिए जा रही थी. आप एक साधारण लोन लेने के लिए बैंकों के दरवाजे तक पहुंचते हैं तो आपकी हैसियत से लेकर आपका सिविल तक निकाल लिया जाता है. पर लंबे समय से डिफॉल्टर घोषित माल्या को लोन देने के लिए बैंक मुंह खोले खड़े रहते थे.
 
दरअसल, यह माल्या की माया और सरकार की ढुलमुल नीतियों का ही परिणाम रहा है कि माल्या ने पूरे देश के सामने एक ऐसे विषय पर बहस का प्लॉट तैयार कर दिया है, जो आने वाले समय में नींव का पत्थर साबित हो सकता है. यह मंथन का वक्त है कि माल्या और एक आम बैंकिंग कस्टमर में इतनी बड़ी और गहरी खाई क्यों है. आखिर ऐसा क्यों है कि एक आम मध्यमवर्गीय परिवार का मुखिया अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए अपना सब कुछ मॉरगेज करने के बाद भी बैंक से एजुकेशन लोन लेने में सफल नहीं हो पाता है और दूसरी तरफ माल्या जैसे लोग करोड़ों रुपए का लोन सेकेंड्स में पा जाते हैं. ऋण के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है और माल्या जैसे लोग ऋण लेकर घी का स्वाद ले रहे हैं. 
 
पिछले दिनों लोकसभा में वर्ष 2016-17 के लिए केंद्रीय बजट का पाठ करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि भारत सरकार सार्वजनिक बैंकों को फिर से सुदृढ़ करेगी. इसके लिए इन बैंकों को नए फाइनेंशियल ईयर में 25 हजार करोड़ रुपए की मदद दी जाएगी. यह बताने की जरूरत नहीं है कि बैंकों को यह हजारों करोड़ रुपए की मदद आम आदमी से वसूले गए टैक्स से जुटाए गए रकम से ही दी जाएगी. यह विडंबना नहीं तो क्या है कि एक आम आदमी सरकार को टैक्स दे और सरकार उस टैक्स का पैसा बैंकों को दे और बैंक उन पैसों को रसूखदार बिजनेसमैन को लोन के रूप में दे. जब लोन का दायरा बढ़ जाए तो वह बिजनेसमैन विदेश उड़ जाए. तकनीकी भाषा में ऐसे लोगों को ‘विलफुल डिफॉल्टर’ कहा जाता है. भारतीय बैंकिंग प्रणाली का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही रहा है कि इन विलफुट डिफॉल्टर्स के सामने सरकार और बैंक हमेशा से नतमस्तक ही रहे हैं.
 
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के वसूल नहीं हो रहे कर्ज पर गंभीर चिंता जाहिर की थी. कोर्ट ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से ऐसे कर्जदारों की लिस्ट मांगी थी जिन पर पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज बकाया है. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि आम आदमी के टैक्स के पैसे से ऐश कर रहे ये विलफुल डिफॉल्टर्स देश की प्रगति में सीधे तौर से बाधक हैं. एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2015 में ऐसे ही लोन के करीब चालीस हजार करोड़ रुपए डूब चुके हैं. जिससे सरकारी बैंकों का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है. आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों से उम्मीद जताई है कि वह 2017 तक कर्ज में फंसी राशि वसूल सकने में समर्थ होंगे. पर विजय माल्या जैसे डिफॉल्टर कस्टमर्स से ऋण वसूली कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि राजनीतिक प्रतिबद्धता के बगैर यह संभव नहीं.
फिलहाल मंथन का वक्त है कि कैसे विजय माल्या जैसे लोगों पर लगाम लगाया जाए और सरकारी बैंकिंग प्रणाली को एक आम आदमी के लिए सुलभ बनाया जाए.