वीरवार को कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रिडऊ के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को विचारशील मुद्रा में देखा गया. उनका तेज दिमाग पारंपरिक राजनीतिक वचनबद्धता की सीमित मांगों से कहीं आगे जा चुका था. व्हाइट हाउस में दो अशांत कार्यकालों के दौरान ओबामा एक दार्शनिक-राष्ट्रपति तो नहीं बन पाए लेकिन उनके अंतिम चरण में प्रवेश करने के साथ ही वह स्पष्ट रूप से अमेरिकी राजनीति के ऐसे रिक्त स्थान में प्रवेश कर रहे हैं, जिसे लंबे समय से खाली छोड़ दिया गया है. कुछेक अपवादों को छोड़कर, दुनिया के किसी भी कोने में निर्वाचित नेता हमेशा से होशियार और समझदार रहे हैं लेकिन सही मायने में बुद्धिजीवी कहे जाने वाले नेता बहुत कम हुए हैं. ओबामा शीघ्र ही अमेरिका के सबसे युवा श्रेष्ठ राजनेता बनने जा रहे हैं. 
 
इसका संकेत कनाडा के राष्ट्रपति के साथ आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में देखने को मिला. एक पत्रकार ने दबंग और बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप के निर्वाचित होने की स्थिति में अमेरिका-कनाडा के संबंधों के बारे में सवाल पूछा. एक हाजिरजवाब नेता ने पहले से ही घोषित कर दिया है कि ऐसी संभावना में अमेरिकियों के लिए कनाडा एक उत्कृष्ट पुनर्वास देश होगा. लेकिन, रिपब्लिकन सम्मेलन के निकट आने के साथ, और डोनाल्ड ट्रंप की लहर बरकरार रहने के साथ यह थोड़ा सा मजाकिया सवाल अब गंभीर रूप धारण करता जा रहा है. 
 
पत्रकार के सवाल पर ओबामा ने अपनी राय प्रकट करते हुए कहा कि आखिर यह कोरी कल्पना संभवता के दायरे में कैसे और क्यों प्रवेश कर रही है? ओबामा ने कहा कि उनके राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होने के बाद से रिपब्लिकन पार्टी हमेशा उनके बयानों और कार्यों को लेकर निष्ठुर नकारात्मकता की संस्कृति पैदा करती रही है. उनकी योग्यताओं के आधार पर उनका आकलन कभी नहीं किया गया और उनके हर कार्य को अनुचित करार दिया गया. पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों ने भी आलोचना का सामना किया था लेकिन किसी को भी इस तरह के अलगाव का सामना नहीं करना पड़ा था. ओबामा ने ‘घृणा’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन वह ये संकेत देने के करीब थे कि उन्हें विशेष रूप से घृणा का पात्र बनाया गया. उन्होंने ‘जाति’ का जिक्र नहीं किया लेकिन यह निहित संकेत दिया कि उनके साथ ‘अनाधिकारी’ की तरह व्यवहार किया गया. रिपब्लिकन पार्टी को यह सच्चाई स्वीकार करने में दिक्कत हो रही थी कि ओबामा को अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित किया गया है. उन्होंने झूठ को हथियार बनाया और उनके जन्मतिथि प्रणामपत्र की वैधता पर सवाल खड़े किए. ओबामा के प्रति इस उन्मादी प्रतिक्रिया के नेता थे डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने संकेत दिया कि एक ‘गैर-अमेरिकी’ व ‘मुस्लिम’ होने के नाते ओबामा एक ‘बाहरी’ राजनीतिज्ञ हैं. यह महज एक इत्तेफाक नहीं है कि ट्रंप की उम्मीदवारी बाहरी लोगों से अमेरिका को ‘खतरे’ के इर्द-गिर्द निर्मित है, चाहे वे नौकरी की तलाश में मेक्सिको से आए प्रवासी हों या फिर जेहाद लड़ने आए मुस्लिम. 
 
अधिकांश अमेरिकियों ने इस सनकी, भ्रामक और खतरनाक वर्णन को खारिज कर दिया और इसलिए ओबामा दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बने. लेकिन अधिकांश रिपब्लिकन स्पष्ट रूप से ओबामा को बाहरी व्यक्ति मानते थे और इसलिए उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के विचित्र विचारों और अपरिपक्व साहस प्रदर्शन के बावजूद उन्हें एक ‘आदर्श’ में बदल दिया है. रिपब्लिकन पार्टी को ट्रंप की विवादास्पद लोकप्रियता पर विश्वास नहीं हो पा रहा है. जब आप विपक्ष में हो तब उन्माद की राजनीति एक मानक प्रलोभन होती है, लेकिन एक विषाक्त सेब का स्वाद चखकर कोई नहीं बचता. 
 
क्या हमारे देश में कांग्रेस पार्टी को कभी भी यह अहसास होगा कि ऐसी उन्मादी नकारात्मकता का उसी पर प्रतिगामी प्रभाव पड़ सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उसके अथक अभियान से असंगतता, तर्कहीनता और व्यक्तिगत षड्यंत्र की बू आती है. प्रधानमंत्री का कोई भी प्रस्ताव सही नहीं होता, फिर चाहे उनके प्रस्ताव में कांग्रेस के सुझाव ही शामिल क्यों न हों. जीएसटी विधेयक इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. कांग्रेस की बयानबाजी घृणा व ईर्ष्या से प्रेरित है और सत्य के प्रति दुस्साहसी अपमान से तथ्यों को विकृत किया जा रहा है. 
 
ताजा उदाहरण को ही लें जहां कांगेस भाजपा पर बदनाम उद्योगपति विजय माल्या की भारत से लंदन की उड़ान में उसकी सहायता करने का आरोप लगा रही है. सरल सच्चाई यह है कि यह कांग्रेस ही थी जिसने सरकारी बैंकों को पहले से दिवालिया घोषित किंगफिशर एयरलाइंस को कर्ज देने की अनुमति दी थी. मैं पाठकों को यहां 21 फरवरी 2012 को पत्रकार एसपीएस पन्नू और संजय सिंह द्वारा लिखित इस प्रकाशित रिपोर्ट का हवाला दूंगा, ‘भारतीय स्टेट बैंक ने अरबपति विजय माल्या की डूबती किंगफिशर एयरलाइंस को सहारा देने के लिए 1500 करोड़ रुपए दिए. आयकर विभाग ने भी घाटे में जा रही हवाई सेवा के प्रति अपने रुख में नर्मी लाते हुए एयरलाइंस के सील किए गए बैंक खातों को दोबारा सक्रिय कर दिया है.’ 
 
कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में माल्या की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के बावजूद उसकी कंपनियों को दिल खोलकर आर्थिक रियायतें दीं. केवल राजग सरकार के सत्ता   में आने के बाद ही माल्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू  की गई. माल्या हड़बड़ी में इसलिए भागा क्योंकि उसे पता था वो अब ज्यादा दिन तक सरकार की कार्रवाई से बच नहीं पाएगा और बैंकों को उसे घेरने का निर्देश दे दिया गया है. लेकिन यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. अगर माल्या अगली नियत तारीख को अदालत में पेश नहीं होता है तो उसे जल्दी ही पता लग जाएगा कि जब सरकार का समर्थन हो तो कानून के हाथ बहुत लंबे हो जाते हैं. 
 
जैसा कि ओबामा ने ध्यान दिलाया कि चिंता का सबब यह नहीं है कि क्या अमेरिका ट्रंप को निर्वाचित करने अपने मूल्यों और समझबूझ को त्याग देगा, बल्कि यह है कि क्या रिपब्लिकन पार्टी स्वत: दंडित घावों से उबर पाएगी या नहीं. एक लोकतंत्र को जितनी जरूरत एक विश्वसनीय सरकार की होती है, उतनी ही जरूरत एक प्रासंगिक विपक्ष की भी होती है. पुरानी कहावत है कि जहां फरिश्ते भी जाते हुए डरते हैं, वहां केवल मूर्ख ही जाने की हड़बड़ाहट दिखाते हैं. लोकतंत्र की एक ताकत यह है कि यह मूर्खों को उम्मीवार बनाने की अनुमति देता है. लेकिन मतदाता इतने दयालु नहीं हैं. जो राजनीतिक पार्टियां स्वेच्छा से मूर्खों को गले लगाती हैं, उन्हें इसकी कीमत अपनी विश्वसनीयता गंवाकर अदा करनी पड़ती है.