नई दिल्ली. चुनाव के समय पर अवसरवादिता आदर्शवाद पर हावी रहती है. यह सिद्धांत विधानसभा चुनावों के लिए चल रही उल्टी गिनती में एक तथ्य का आकार लेता हुआ दिखाई देता है. आगामी कुछ हफ्तों के दौरान असम, केरल, पश्चिम बंगाल, पांडिचेरी और तमिलनाडु के मतदाता 824 नए नेताओं को निर्वाचित करेंगे. लेकिन, उपरोक्त राज्यों में एक भी नामांकन होने से पहले ही राजनीतिक दलों और उनके सुप्रीम नेताओं ने न्यायसंगत जनादेश प्राप्त करने के लिए नए सहयोगियों की तलाश शुरू कर दी है. चूंकि राजनीति प्रतीकात्मक-अहंकारी असंभावना को लाभकारी संभावना में परिवर्तित करने की कला है, नेता ऐसे नकारात्मक एजेंडे पर कार्य कर रहे हैं जहां उनकी स्वयं की जीत के बजाय प्रतिद्वंदी उम्मीदवार की पराजय अधिक महत्वपूर्ण है. 
 
तमिलनाडु में करुणानिधि गुट ऐसे दलों के साथ गठबंधन बनाकर मौजूदा मुख्यमंत्री जयललिता को सत्ता से उखाड़ फेंकना चाहता है जिनकी धर्म और जाति सहित द्रमुक के साथ बमुश्किल ही कोई समानता है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को पराजित करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन बना लिया है. राज्य के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि सत्तारूढ़ सरकार को हराने के लिए कांग्रेस और मार्क्सवादियों में औपचारिक गठबंधन बनाया गया हो. केरल में युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को सत्ता ग्रहण करने से रोकने के लिए भाजपा ने छोटे-छोटे जातीय दलों के साथ गठबंधन बनाया है. भाजपा केरल में सत्तारूढ़ पार्टी तो नहीं बन सकती लेकिन एक नजदीकी परिणाम आने की संभावना में कम से कम दो सीट जीतना चाहेगी ताकि राज्य में अपनी सशक्त राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा सके. असम में संपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र को क्षेत्रीय और सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करके भाजपा को वैध तरीके से निर्वाचित अपनी सर्वप्रथम सरकार गठित करने का पूरा भरोसा है. भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस में फूट डालकर विद्रोही कांग्रेस सरकार को नियुक्त करने में सफलता हासिल की है. असम में भाजपा ने पिछले कुछ महीनों में बड़ी संख्या में कांग्रेसी सदस्यों की भर्ती करके कांग्रेस में फूट डाल दी है. 
 
चुनावी लड़ाई जीतने के लिए तार्किक रूप-रेखाओं और संरचनाओं की जटिल तैनाती अत्यंत आवश्यक है. इसलिए, एक वैकल्पिक नेता अथवा शासन के लिए एजेंडा प्रस्तुत करने के बजाय पार्टियों में फूट डालना अधिक महत्वपूर्ण है. इसलिए, तिरुवनंतपुरम से लेकर गुवाहाटी तक राजनीतिक दलों ने जातीय सरदारों, धार्मिक गुरुओं, कॉरपोरेट दिग्गजों और स्थानीय नीति-निर्माताओं के साथ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सौदेबाजी करने के लिए राजनीतिक सौदेबाजी करने वाले शातिर सिपाहियों को चुना है. गौरतलब है कि किसी भी राजनीतिक दल ने अभी तक जनादेश प्राप्त करने के लिए अपनी विचारधारा अथवा नेतृत्व से सहमत रणनीति का प्रदर्शन नहीं किया है. 
 
आगामी विधानसभा चुनावों के परिणाम के पांच व्यक्तियों के लिए गंभीर निहितार्थ होंगे जो हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, तमिलनाडु मुख्यमंत्री जयललिता, द्रमुक प्रमुख करुणानिधि और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. इन सभी के पास साबित करने के लिए कुछ न कुछ जरूर है. लेकिन विशेष रूप से भाजपा के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है, जो अभी भी इस असमंजसता से जूझ रही है कि उसे प्रधानमंत्री के नाम पर चुनाव लड़ना चाहिए अथवा नहीं. 2011 के राज्य चुनाव में कुल 824 विधानसभा सीटों में भाजपा दोहरे अंकों तक भी नहीं पहुंच पाई थी. लेकिन मई 2014 में मोदी लहर पर सवार होते हुए भाजपा ने 114 विधानसभा क्षेत्रों में प्रतिद्वंदी दलों पर बढ़त हासिल की. वर्तमान में, भाजपा के पास सभी राज्यों में कुल मिलाकर सबसे अधिक 1000 के करीब विधायक हैं. 
 
हालांकि, असम को छोड़कर भाजपा अन्य किसी भी राज्य में सरकार बनाने की उम्मीद नहीं कर रही है. इनमें से किसी भी राज्य में भाजपा न ही सत्तारूढ़ पार्टी है और न ही प्रभावशाली समूह की भूमिका निभा रही है. दिल्ली और बिहार में भारी हार के बाद पार्टी के चुनावी भाग्य को एकबार फिर विजयी दिशा में ले जाने के लिए अमित शाह और उनकी टीम को चुनावी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है. 
 
लेकिन दिल्ली और बिहार की तरह, भाजपा के पास चारों राज्यों में से किसी में भी एक भी स्थानीय नेता नहीं है. हकीकत में भाजपा को सशक्त स्थानीय नेताओं से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. असम में एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद तरुण गोगोई जैसा 79 वर्षीय मुख्यमंत्री भी भाजपा को कठिन चुनौती दे रहा है. भले ही भाजपा ने असम गण परिषद् के साथ औपचारिक गठबंधन बना लिया है और नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है, वह अभी भी बहुमत प्राप्त करने के लिए कांग्रेस विद्रोहियों पर निर्भर है. 2014 में 14 लोकसभा सीटें जीतने से उत्साहित भाजपा स्वयं के बूते पर सरकार बनाने को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रही है. हालांकि भाजपा 2011 में महज 5 सीटें जीत पाई थी, लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान 126 विधानसभा क्षेत्रों में 79 सीटों पर आगे थी. 
 
पार्टी प्रबंधकों के अनुसार मोदी और शाह ने असम में किसी भी कीमत पर जीत दर्ज करने के लिए राज्य में मानवशक्ति और संसाधन भेजने का   फैसला किया है. हालांकि, भाजपा ने केंद्रीय खेल राज्यमंत्री सरबनंदा सोनावाल को अप्रत्यक्ष रूप से अपना मुख्यमंत्री पद के उम्मीवार के रूप में पेश किया है, उसे करीब 30 सीटों पर चुनाव परिणाम निर्धारित करने वाले मुस्लिम समुदाय के अप्रत्याशित प्रतिघात का भय सता रहा है. 
 
मुस्लिम प्रभुत्व वाले एआईयूडीएफ ने 2014 में 16 अल्पसंख्यक सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस पार्टी भाजपा-एजीपी गठबंधन को हराने के लिए एआईयूडीएफ के साथ रणनीतिक गठबंधन बनाने के प्रयास कर रही है. पश्चिम बंगाल का मामला अधिक गंभीर है. वहां भाजपा को ममता-विरोधी मतदाताओं के बंटवारे को रोकने के लिए धार्मिक आधारों पर वोटों के धु्रवीकरण की इसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. मौजूदा विधानसभा में पार्टी के पास केवल एक विधायक है और 24 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त प्राप्त करने के बावजूद एक भी राज्य स्तरीय नेता को विकसित नहीं कर पाई है. 
 
खैर जो भी हो, 2016 कई मायनों में 2014 से भिन्न है जब प्रधानमंत्री मोदी का कद अन्य सभी राजनीतिक नेताओं से कहीं अधिक ऊंचा था. नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से 2016 में अभी भी सबसे कद्दावर नेता हो सकते हैं, लेकिन उनके अतिरिक्त भाजपा ऐसा कोई नेता तैयार नहीं कर सकी है जो जयललिता, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे मजबूत मुख्यमंत्रियों को चुनौती दे सके. प्रारंभिक संकेतों को देखते हुए, ममता और जयललिता से बड़ी जीत दर्ज करने की उम्मीद की जा रही है जबकि केरल में लेफ्ट शायद सत्ता में वापसी कर सकती है. मोदी-शाह की प्रभावशाली जोड़ी को एकबार फिर दुर्जेय जोड़ी के रूप में दिखाने के लिए भाजपा को वोट शेयर के संदर्भ में 2014 का लोकसभा प्रदर्शन दोहराना होगा. 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)