नई दिल्ली. गत सप्ताह लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच हुए शब्दों की लड़ाई ने सभी प्रकार के संदेहों को दूर करते हुए दिखा दिया कि महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित करने के लिए संसद की प्रासंगिकता आज भी क्यों बनी हुई है, हालांकि सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के व्यवहार संबंधी कई सवाल अभी भी अनुत्तरित रह जाते हैं. कई वर्षों बाद दो कद्दावर नेताओं के बीच मौखिक युद्ध को लेकर राजनीतिक हलकों के साथ-साथ बाहरी दुनिया में भी कौतूहल दिखाई दिया. दोनों नेताओं ने मजबूती के साथ अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए और उनके भाषणों को शक्तिशाली बनाने के लिए उनकी सहायक टीमों की उचित उदाहरण एकत्रित करने के लिए की गई कड़ी मेहनत को भी प्रतिबिंबित किया. 
 
एक निष्पक्ष समीक्षक को राहुल गांधी एक समझौताकारी मुद्रा में और सदन की कार्यवाही को सुगम बनाने के लिए अपना हाथ सत्ता पक्ष की ओर आगे बढ़ाते हुए जरूर दिखाई दिए. लेकिन ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और उनकी योजनाओं पर ताना मारना छोड़ दिया है. राहुल ने प्रधानमंत्री को एक बार फिर घेरते हुए काले धन को सफेद में परिवर्तित करने सहित उनकी कुछ योजनाओं पर जमकर व्यंग्य कसा और इसे ‘फेयर एंड लवली योजना’ के रूप में वर्णित किया. यह और बात है कि कई सांसदों ने राहुल की टिप्पणियों को ‘जातिवादी’ बताते हुए यह राय दी है कि टीवी विज्ञापन से चुराई गई इस पंक्ति का उपयोग संसद में नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे एक विशेष उत्पाद का प्रचार होता है. अन्य जानना चाहते हैं कि अगर ऐसा है तो फिर कुछ सांसद विभिन्न ब्रांडों का प्रचार करने के लिए टीवी विज्ञापनों में क्यों दिखाई देते हैं. ऐसे कुछ सांसदों में गुजरे जमाने की सुपरस्टार हेमा मालिनी, उर्दू लेखक जावेद अख्तर और महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर शामिल हैं. 
 
यह थोड़ा हैरान जरूर करता है कि जिस समय राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर उनके सहयोगियों राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और लालकृष्ण आडवाणी के अतिरिक्त अन्य साथी सांसदों के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर परामर्श नहीं करने का आरोप लगा रहे थे, तब सत्ता पक्ष की ओर से किसी भी व्यक्ति ने उनका खंडन करने का प्रयास नहीं किया. वास्तव में, कुछ मंत्रियों को बनावटी ढंग से मुस्कुराते हुए देखा गया जिससे यह धारणा पैदा हुई कि वे राहुल के अवलोकन के साथ सहमत हैं. राहुल ने प्रधानमंत्री पर अपने हमले को और तीखा करते हुए कहा कि उन्हें योजनाओं की घोषणा करने और अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने से पहले विविध विचारों को ध्यान में रखना चाहिए. राहुल के इस बयान ने उनके आलोचकों को इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन कांग्रेसी अध्यक्ष देवकांत बरुआ के इस चाटुकारितापूर्ण कथन को स्पष्टता के साथ याद करने के लिए विवश कर दिया कि ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा.’ 
 
राहुल के तीखे प्रहारों का उचित जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को अंतत: आगे आना पड़ा. प्रधानमंत्री ने अप्रत्यक्ष रूप से राहुल का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष में ऐसे कई नेता हैं जिन्हें कुछ बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा क्योंकि वे उन नेताओं से कई गुणा श्रेष्ठ वक्ता हैं जो अभी अपने विचारों को अभिव्यक्त कर रहे हैं. प्रधानमंत्री ने संसद में विधायी कार्य के संचालन के दौरान प्रोटोकॉल बनाए रखने की महत्ता पर ध्यान दिलाने के लिए अपनी चिर-परिचित जुझारू शैली में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का हवाला दिया और इसके साथ-साथ सदन को बार-बार स्थगित करने की कांग्रेसी रणनीति पर भी निशाना साधा. जब प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को याद दिलाया कि उसे अपने बुजुर्गों से सीख लेनी चाहिए तो कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्रियों को बगलें झांकते हुए देखा गया. प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष से सरकार पर बार-बार निशाना साधने के बजाय राष्ट्र-निर्माण कार्य में सरकार का साथ देने को कहा. नरेंद्र मोदी ने जोर देते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष का सारा ध्यान गरीबी दूर करने के बजाय उन्हें सत्ता से उखाड़ने पर केंद्रित है. 
 
नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधना जारी रखा और उन पर सुर्खियां बटोरने के लिए संसदीय कार्यवाही में बाधा डालने का आरोप लगाया. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण के अंत में मेक इन इंडिया और अन्य योजनाओं को सफल बनाने के लिए विपक्ष से सहयोग की मांग की. लेकिन कई सांसदों के मन में यह सवाल घर कर रहा है कि कांग्रेस पर इतने तीखे हमले के बाद दोनों सदनों में कार्य संचालन के लिए माहौल अनुकूल बन पाएगा भी या नहीं. 
 
दो दिन की अवधि में हुई संसदीय कार्यवाही की गूंज बाहर भी सुनाई दी और कई नेताओं ने दोनों नेताओं के तीखे भाषणों पर अपनी-अपनी राय प्रकट की. रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू में हाल की घटनाओं से संबंधित ज्वलंत मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी उनके निंदकों में चर्चा का विषय बनी रही. जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद प्रधानमंत्री के भाषण में स्टालिन और खुर्शचेव के उदाहरण पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि उसे प्रधानमंत्री के साथ हिटलर पर बहस करने में मजा आता. 
 
लेकिन, निष्पक्ष रूप से संसदीय   आदान-प्रदान का अवलोेकन करते हुए इस निष्कर्ष पर आसानी के पहुंचा जा सकता है कि दोनों नेताओं ने देश के विभिन्न स्थानों में कई नीरस और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के मद्देनजर बढ़ते हुए राजनीतिक तापमान को कम करने में मदद की है. कांग्रेसी इस बात से खुश थे कि उनके नेता ने लोकसभा में प्रशंसनीय भाषण दिया जबकि भाजपा नेता प्रधानमंत्री द्वारा उनकी अपनी विशिष्ट शैली में दिए गए व्यंग्य, अक्खड़पूर्ण और स्पष्टवादी जवाबी हमले से संतुष्ट दिखाई दिए. 
 
वास्तव में, दोनों नेता लोकतंत्र के मंदिर में हुए घटनाक्रमों से सीख ले सकते हैं. अपनी शिकायतों को अभिव्यक्त करने और योजनाओं की घोषणा करने के लिए संसद एक सर्वश्रेष्ठ मंच है. इसलिए संसद की गरिमा और पवित्रता को सभी द्वारा बरकरार रखा जाना चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि दोनों पक्षों के कुछ सदस्यों द्वारा संसद की प्रासंगिकता को कम करने के प्रयास किए गए हैं. इसलिए, लोकसभा के नेता और सरकार के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री और प्रमुख विपक्षी नेताओं के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वे इस संस्था में लोगों के विश्वास को पुन: बहाल करें.
    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)