पांच राज्यों में चुनाव का शंखनाद हो चुका है और बिसात तैयार है. सभी खिलाड़ियों को भी उनके काम पर लगा दिया गया है. गठबंधन से लेकर प्रत्याशियों तक को लगभग फाइनल कर लिया गया है. पर सबसे अधिक मंथन इस बात पर किया जा रहा है कि चुनाव में क्या बोलना है और क्या नहीं. किससे क्या बोलवाना है और कब,  इन सब पर बेहतर तरीके से वर्क किया जा रहा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में कन्हैया की जेल यात्रा के बाद दिखा.

देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया कुमार को अदालत ने भले ही तमाम नसीहत देते हुए सशर्त जमानत दी है, पर राजनीति के इस दौर में उसे भी सिखा ही दिया गया ‘बोल कि लब तेरे आजाद हैं’ तुझे कब क्या बोलना है. और कब क्या नहीं बोलना है,  इसकी ट्रेनिंग का पहला फेज भी पूरा हो चुका है. चुनाव के दौरान तुम्हें अपने सभी भाषणों में लालझंडे की जगह तिरंगा थामना है, ताकि तुम पर देशविरोधी का दोबारा ठप्पा न लगे. साठ-पैंसठ साल में जिस भुखमरी और गरीबी से लोगों को आजादी नहीं मिली है उसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा करना है.  

लोग गरीबी में जी रहे हैं और पूंजीवादी देश को दीमक की तरह खा रहे हैं,  उसके लिए मौजूदा सरकार को दोषी बनाना है . गोबर थामने वाली को तुम बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर देख सकते हो,  लेकिन एक पूर्व अभिनेत्री को एचआरडी मिनिस्टर बनने पर तुम्हारे पेट में दर्द होता है.  कन्हैया के बाहर निकलते ही सीताराम येचुरी का बयान सामने आया कि कन्हैया पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए जरूर जाएगा. इसी के साथ जेएनयू में कन्हैया के भाषण का स्क्रिप्ट भी तैयार कर दिया गया था. तमाम मीडिया चैनल के लाइव टेलिकास्ट ने भी स्पष्ट कर दिया कि देश को एक और युवा नेता मिल चुका है.और वह आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में खूब सेलेबल आइटम होगा.

अफजल गुरु को ज्यूडिशयल किलिंग का शिकार बनाए जाने की बात कहने वाले तमाम छात्रों को जेनएयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की जमानत ने ज्यूडिशियल सिस्टम पर थोड़ा तो भरोसा जरूर दिलाया होगा. शायद यही कारण है कि जेल से बाहर आकर हीरो की तरह भाषण देने वाले कन्हैया को सभा में तिरंगा झंडा लहराते हुए पूरे देश ने देखा.  देश से आजादी मांगने वालों की जुबान पर अचानक से देश में आजादी की जयघोष सुनाई देने लगी. भूख से आजादी, पूंजीवाद से आजादी मांगने वालों को कुछ नहीं सूझ रहा था तो नारे लगाकर उन्होंने अपनी भड़ास निकाली. प्रधानमंत्री सहित तमाम ऐसे नेताओं को ललकारा गया जिससे यह संदेश साफ हो गया कि कन्हैया और उसके जैसे छात्र नेता कैसे राजनीति का शिकार होते हैं.

वाम दलों को तो पहले से ही जेनएयू का कैंपस काफी बेहतर लगता रहा है. यही कारण है कि सीताराम येचुरी ने स्पष्ट कर दिया कि कन्हैया को पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए ले जाया जाएगा. बात सिर्फ विचारधारा और उससे उपजे हालातों की नहीं है. मंथन करने का वक्त है कि हम एक राष्टÑ की बात करने के लिए तिरंगा हाथों में उठाते हैं या अदालत के डंडे के कारण हाथ में तिरंगा उठाना आपकी मजबूरी थी. कहते हैं हाथी के दो दांत होते हैं, एक दिखाने के और दूसरा खाने के. जब आपने अपने दिलों में राष्टÑ को बांटने और टुकड़े-टुकड़े करने की हसरत पाल रखी हो तो दिखावे के लिए आपको हाथों में तिरंगा लेना राष्टÑभक्ति कम और नौटंकी ज्यादा ही लगती है. सच है कि राष्टÑभक्ति या राष्टÑभक्त का प्रमाण देने के लिए किसी को जरूरत नहीं है. कम से कम भारत में. न ही इसके लिए कोइ सर्टिफिकेट सेंटर खोलने की जरूरत है.पर इतना जो जरूर किया जा सकता है कि विचारधारा के नाम पर जो भारत की अखंडता और संप्रभुता को बांटने की कोशिश करे उसे सिरे से खारिज करने की बात कही जाए.

आज पूरे भारत में मुख्य तौर पर विचारधारा दो गुटों में बंटी है. एक जो मोदी के समर्थक हैं और दूसरा जो मोदी के विरोधी हैं. कहते हैं चोर-चोर मौसेरे भाई.जो समर्थक हैं, वो तो भक्त हैं ही,  लेकिन कभी धुर विरोधी रहे जब दो दल विरोधी को पटखनी देने के लिए एक साथ जेएनयू कैंपस में पहुंच जाएं तो समझ लीजिए सबकुछ ठीक नहीं है. कांग्रेस ने संसद में जेएनयू में देशविरोधी गतिविधियों की जमकर निंदा की.पर वोट की राजनीति के मोहपाश में बंधे हुए कांग्रेस नेता जिस तरह जेएनयू कैंपस में जाकर आनन-फानन में भाषणबाजी कर आए, संसद में इस प्रश्न का उनके नेताओं के सामने कोई जवाब नहीं था.

पूरे देश ने इसे देखा और समझा है. इसमें कोई शक नहीं कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपको राष्टÑभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं न ही आपके लबों से बोलने की आजादी कोई छीन नहीं सकता है. पर अगर आपको लब खोलने की इजाजत मिली है तो इसका दुरुपयोग करने की इजाजत भी किसी ने आपको नहीं दी है. यह बोलने की ही तो आजादी है कि हर कोई अपनी बात कह रहा है. खुलेआम प्रधानमंत्री को गाली दे रहा है.नहीं तो इमरजेंसी के वक्त के हालात के किस्से कहानियों को आज भी सुना और पढ़ा जा सकता है.पांच राज्यों में चुनाव का शंखनाद हो चुका है और बिसात तैयार है.

सभी खिलाड़ियों को भी उनके काम पर लगा दिया गया है. गठबंधन से लेकर प्रत्याशियों तक को लगभग फाइनल कर लिया गया है. पर सबसे अधिक मंथन इस बात पर किया जा रहा है कि चुनाव में क्या बोलना है और क्या नहीं. किससे क्या बोलवाना है और कब,  इन सब पर बेहतर तरीके से वर्क किया जा रहा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में कन्हैया की जेल यात्रा के बाद दिखा.

देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया कुमार को अदालत ने भले ही तमाम नसीहत देते हुए सशर्त जमानत दी है, पर राजनीति के इस दौर में उसे भी सिखा ही दिया गया ‘बोल कि लब तेरे आजाद हैं’ तुझे कब क्या बोलना है. और कब क्या नहीं बोलना है,  इसकी ट्रेनिंग का पहला फेज भी पूरा हो चुका है. चुनाव के दौरान तुम्हें अपने सभी भाषणों में लालझंडे की जगह तिरंगा थामना है, ताकि तुम पर देशविरोधी का दोबारा ठप्पा न लगे. साठ-पैंसठ साल में जिस भुखमरी और गरीबी से लोगों को आजादी नहीं मिली है उसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा करना है.  लोग गरीबी में जी रहे हैं और पूंजीवादी देश को दीमक की तरह खा रहे हैं,  उसके लिए मौजूदा सरकार को दोषी बनाना है . गोबर थामने वाली को तुम बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर देख सकते हो,  लेकिन एक पूर्व अभिनेत्री को एचआरडी मिनिस्टर बनने पर तुम्हारे पेट में दर्द होता है.  

कन्हैया के बाहर निकलते ही सीताराम येचुरी का बयान सामने आया कि कन्हैया पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए जरूर जाएगा. इसी के साथ जेएनयू में कन्हैया के भाषण का स्क्रिप्ट भी तैयार कर दिया गया था. तमाम मीडिया चैनल के लाइव टेलिकास्ट ने भी स्पष्ट कर दिया कि देश को एक और युवा नेता मिल चुका है.और वह आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में खूब सेलेबल आइटम होगा.

अफजल गुरु को ज्यूडिशयल किलिंग का शिकार बनाए जाने की बात कहने वाले तमाम छात्रों को जेनएयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की जमानत ने ज्यूडिशियल सिस्टम पर थोड़ा तो भरोसा जरूर दिलाया होगा. शायद यही कारण है कि जेल से बाहर आकर हीरो की तरह भाषण देने वाले कन्हैया को सभा में तिरंगा झंडा लहराते हुए पूरे देश ने देखा.  देश से आजादी मांगने वालों की जुबान पर अचानक से देश में आजादी की जयघोष सुनाई देने लगी. भूख से आजादी, पूंजीवाद से आजादी मांगने वालों को कुछ नहीं सूझ रहा था तो नारे लगाकर उन्होंने अपनी भड़ास निकाली. प्रधानमंत्री सहित तमाम ऐसे नेताओं को ललकारा गया जिससे यह संदेश साफ हो गया कि कन्हैया और उसके जैसे छात्र नेता कैसे राजनीति का शिकार होते हैं.

वाम दलों को तो पहले से ही जेनएयू का कैंपस काफी बेहतर लगता रहा है. यही कारण है कि सीताराम येचुरी ने स्पष्ट कर दिया कि कन्हैया को पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए ले जाया जाएगा. बात सिर्फ विचारधारा और उससे उपजे हालातों की नहीं है. मंथन करने का वक्त है कि हम एक राष्टÑ की बात करने के लिए तिरंगा हाथों में उठाते हैं या अदालत के डंडे के कारण हाथ में तिरंगा उठाना आपकी मजबूरी थी.

कहते हैं हाथी के दो दांत होते हैं, एक दिखाने के और दूसरा खाने के. जब आपने अपने दिलों में राष्टÑ को बांटने और टुकड़े-टुकड़े करने की हसरत पाल रखी हो तो दिखावे के लिए आपको हाथों में तिरंगा लेना राष्टÑभक्ति कम और नौटंकी ज्यादा ही लगती है. सच है कि राष्टÑभक्ति या राष्टÑभक्त का प्रमाण देने के लिए किसी को जरूरत नहीं है. कम से कम भारत में. न ही इसके लिए कोइ सर्टिफिकेट सेंटर खोलने की जरूरत है.पर इतना जो जरूर किया जा सकता है कि विचारधारा के नाम पर जो भारत की अखंडता और संप्रभुता को बांटने की कोशिश करे उसे सिरे से खारिज करने की बात कही जाए.

आज पूरे भारत में मुख्य तौर पर विचारधारा दो गुटों में बंटी है. एक जो मोदी के समर्थक हैं और दूसरा जो मोदी के विरोधी हैं. कहते हैं चोर-चोर मौसेरे भाई.जो समर्थक हैं, वो तो भक्त हैं ही,  लेकिन कभी धुर विरोधी रहे जब दो दल विरोधी को पटखनी देने के लिए एक साथ जेएनयू कैंपस में पहुंच जाएं तो समझ लीजिए सबकुछ ठीक नहीं है. कांग्रेस ने संसद में जेएनयू में देशविरोधी गतिविधियों की जमकर निंदा की.पर वोट की राजनीति के मोहपाश में बंधे हुए कांग्रेस नेता जिस तरह जेएनयू कैंपस में जाकर आनन-फानन में भाषणबाजी कर आए, संसद में इस प्रश्न का उनके नेताओं के सामने कोई जवाब नहीं था.

पूरे देश ने इसे देखा और समझा है. इसमें कोई शक नहीं कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपको राष्टÑभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं न ही आपके लबों से बोलने की आजादी कोई छीन नहीं सकता है. पर अगर आपको लब खोलने की इजाजत मिली है तो इसका दुरुपयोग करने की इजाजत भी किसी ने आपको नहीं दी है. यह बोलने की ही तो आजादी है कि हर कोई अपनी बात कह रहा है. खुलेआम प्रधानमंत्री को गाली दे रहा है.नहीं तो इमरजेंसी के वक्त के हालात के किस्से कहानियों को आज भी सुना और पढ़ा जा सकता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)