हर साल जिस दिन का पूरे भारत के लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं, आज वह दिन एक बार फिर से आ चुका है. इस सालाना कार्यक्रम में आम लोगों का सरोकार सबसे अधिक उनसे जुड़े मसलों से होता है. आंकड़ों की बाजीगरी से न तो आम लोगों को सरोकार होता है और न वे यह जानना चाहते हैं. क्योंकि, आंकड़ों की बाजीगरी एक सपने की तरह महसूस होती है. ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली से भारत की जनता यह अपेक्षा करती है कि वह एक सपनों का बजट नहीं, बल्कि एक ऐसा बजट पेश करेंगे जो हकीकत में सभी के सामने हो.

इस बार का आम बजट कई मायनों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि भारतीयों की अपेक्षाएं सातवें आसमान पर हैं. भारत में आर्थिक सुधारों की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले एक साल से किए जा रहे प्रयासों के बाद लोगों का ध्यान इस तरफ है कि इस बजट में उनके लिए क्या खास होगा. प्रधानमंत्री ने अपने विदेश दौरों के दौरान जिस तरह विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित करने और सुविधाएं देने का महा मेगा प्रोग्राम चलाया उस पर भी सभी की निगाहें जमी हैं.

हर बजट में किसानों, युवाओं, उद्यमियों, आम मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए काफी लोकलुभावन बातें होती हैं. इनमें से ज्यादातर का सरोकार आम जिंदगी से होता है, लेकिन सभी दूरगामी प्रभावों से प्रेरित रहते हैं. एक आम भारतीय अपने तात्कालिक फायदों पर ज्यादा ध्यान देता है. ऐसे में नरेंद्र मोदी और उनकी कोर टीम के पास यह बड़ा मौका है कि वह भारतीयों को क्या तात्कालिक राहत या फायदा पहुंचाते हैं. दूरगामी कार्यों का लेखा-जोखा पहले से ही दुनिया देख रही है. जिस तरह ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम चलाया जा रहा है वह निश्चित तौर पर आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित होगा. पर यह बजट इससे इतर आम लोगों के लिए क्या लेकर आएगा? यह बहस का विषय बनेगा.

आज का भारत बेचैन है. खासकर युवा पीढ़ी जिस तरह बेचैनी का अनुभव कर रही है वह कई मायनों में अलग है. विचारधारा की लड़ाई के बीच एक बड़े युवा वर्ग की हिंसात्मक घटना का गवाह अभी हाल ही में हरियाणा बना है. पूरे देश ने देखा है कि आरक्षण की आग में जलता हुआ हरियाणा अपनी किस्मत पर किस तरह आंसू बहा रहा है. तमाम सीसीटीवी फुटेज और लोगों द्वारा बनाई गई मोबाइल क्लिपिंग में पूरा देश देख रहा है कि किस तरह बेरोजगारी की मार झेल रहा युवा वर्ग अपनी फ्रस्टेशन दुकानों, कारों, मोटरसाइकिलों और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर निकाल रहा है. हरियाणा की आग को साधारण तरीके से लेने की भूल नहीं करनी चाहिए. एक बड़ा युवा वर्ग इसी अवसाद के कारण हैदराबाद से लेकर दिल्ली तक मार्च पास्ट करते हुए और मोमबत्ती की आग में अपनी विचारधारा से लोगों को रू-ब-रू करा रहा है.

हाल के आर्थिक आंकड़ों पर गौर करें तो हालात स्पष्ट हैं कि इस वक्त हमारी अर्थव्यवस्था उस हालत में नहीं है कि युवाओं को मास लेवल पर रोजगार उपलब्ध कराया जा सके. पिछले एक साल में बढ़ती कीमतों ने भी आम आदमी को मुश्किल में डालने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है. प्रधानमंत्री द्वारा कई राज्यों में चुनाव के दौरान युवाओं के लिए किए गए वादों पर भी अब सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं. युवा अपने भविष्य को लेकर सशंकित हैं. ऐसे में हरियाणा के रूप में परिणाम सामने है.

आने वाले वर्ष में डिजिटल युग भारत को कई पायदान ऊपर तक पहुंचाएगा. इसलिए, बजट में इस विषय पर भी लोगों की खास नजर होगी. सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल इंडिया का सपना दिखाने वाली मोदी सरकार इस सपने को हकीकत में तब्दील करने की दिशा में कितना कारगर साबित हो सकती है यह भी इस बजट में स्पष्ट हो जाएगा. ग्रामीण भारत को डिजिटल करने की जगह वहां के किसानों को यह बजट कितना राहत दे पाता है, यह गौर करने वाली बात होगी. पिछले कई सालों में किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति अचानक से बढ़ गई है. वर्ष 2015 में पंजाब, हरियाणा, विदर्भ के किसानों ने जिन विषम परिस्थितियों में आत्महत्या की है उसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं. कभी बारिश की अनियमितता, कभी ओले, आंधी और सूखे के कहर ने किसानों को बेचैन कर रखा है. कृषि की निर्भरता पर रहने वाले भारत को अगर खाद्यान्न का भारी मात्रा में आयात करना पड़ रहा है तो यह चिंताजनक स्थिति है. बजट में किसानों के लिए क्या प्रावधान होंगे और ये प्रावधान कितने कारगर होंगे यह सबसे ज्वलंत मुद्दा होगा. भारी मात्रा में बड़े उद्योग घरानों के लिए कर्ज माफी के प्रावधानों ने हाल के दिनों में इस बड़े बहस को जन्म दिया है कि क्या किसानों के कर्ज माफी के लिए भी सरकार सोच रही है. ऐसे में यह बजट किसानों की बेचैनी को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण होगा.

हर साल प्रस्तुत होने वाला बजट एक रूटीन की प्रक्रिया बनकर न रह जाए, इस पर मोदी सरकार ने जरूर ध्यान देने की कोशिश की है. इसकी एक झलक हमें पिछले दिनों प्रस्तुत किए गए रेल बजट में स्पष्ट तौर पर देखने को मिली है. ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूरे भारतवर्ष की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं. उन्हें आम भारतीय की कसौटी पर खरा उतरने के लिए एक बेहतर   बजट पेश करना होगा, जिसका टैग लाइन हो सकता है…‘सपनों का नहीं, हकीकत का बजट.’

(ये लेखक के निजी विचार हैं)