चलिए मान लेते हैं कि कन्हैया लाल एक राष्ट्र-विरोधी नहीं है और उस पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाना उचित नहीं है. तब भी, यह सवाल उठता है कि उसे भारतीय लोकतंत्र के पवित्रतम स्थल पर हमले का षड्यंत्र रचने के दोषी अफजल गुरु की फांसी की वर्षगांठ वाले दिन(9 फरवरी) जेएनयू में बैठक बुलाने की आखिर क्या जरूरत पड़ गई थी? अगर इस बैठक का मकसद अफजल ‘गुरुजी’ को श्रद्धांजलि देना नहीं था, जैसा कि कुछ दिन पहले कांग्रेस प्रवक्ता ने आतंकवादी कहकर संबोधित किया था, तो फिर 9 फरवरी को विद्यार्थियों की बैठक बुलाने का क्या मकसद था? जाहिर है कि हालांकि कन्हैया निश्चित रूप से एक राष्ट्र-विरोधी नहीं है लेकिन वह गुप्त अभिप्रायों से वंचित भी नहीं था.

एकत्रित विद्यार्थियों द्वारा अफजल की फांसी को ‘न्यायिक हत्या’ करार दिए जाने की हठ के बावजूद अगर हम अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि कन्हैया एक राष्ट्र-विरोधी है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि इस देश में छात्रों को काफी हद तक ढील देना आवश्यक है. युवाओं की लापरवाही अक्सर दूसरों द्वारा समझे जाने वाले राष्ट्रीय हित की खुली पूछताछ में प्रतिबिंबित होती है. किसी भी अधिकार अथवा सत्ता को चुनौती देना छात्र नेताओं की खास विशेषता है.  बात जब जेएनयू छात्र संघ की हो तो आपको यह तथ्य स्वीकारना होगा कि सीताराम येचुरी और प्रकाश करात के उत्तराधिकारियों को प्रतिवाद और नास्तिवाद को अंतर्निहित करके अपने अतिवादी चरमपंथ को और अधिक चमकाने की जरूरत है. आशा करते हैं कि न ही करात और न ही येचुरी इस तथ्य से इनकार करेंगे कि जेएनयू में छात्र संघ के नेता कन्हैया द्वारा आयोजित बैठक में लगाए जा रहे नारे किसी भी प्रकार से राष्ट्रीय हित की उन्नति की ओर संकेत कर रहे थे.

जेएनयू विवाद में सारा दोष केवल छात्र नेताओं के सिर पर ही नहीं मढ़ा जा सकता. सरकार ने कन्हैया की गिरफ्तारी करवाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. एक विश्वविद्यालय में चंद छात्रों की भीड़ की कोलाहलपूर्ण प्रतिक्रिया को बेवजह एक अखिल भारतीय गतिरोध में परिवर्तित करने के लिए सरकार भी बराबर की दोषी है. अफजल की फांसी की प्रत्येक वर्षगांठ पर जेएनयू में इस तरह की बैठकों का आयोजन पहले भी होता रहा है और ऐसे ही नारे लगाए जाते रहे हैं जो इस वर्ष सुनने को मिले हैं. लेकिन गृहमंत्रालय की मूर्खता के कारण कन्हैया द्वारा आयोजित बैठक में लगाए गए भयावह नारे पृष्ठभूमि में चले गए. संपूर्ण गैर-राजग गुट ने अब सरकार को निशाने पर ले लिया है. राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविदों और छात्र संगठनों ने सरकार के आलोचकों का पक्ष लिया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे को बेहद गलत ढंग से संभाला है. कन्हैया के खिलाफ जारी किए गए वारंटों में राजनीतिक अपरिपक्वता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी. चाहे कुछ सप्ताह पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या हो या फिर भारतीय आचार संहिता की पुरातन धारा 124-ए के तहत कन्हैया की हिरासत हो, सत्तारूढ़ सरकार ने छात्रों से संबंधित मुद्दों पर आवश्यकता से अधिक कठोर कार्रवाई करके विश्वविद्यालय परिसरों में अलोकप्रियता को आमंत्रित किया है.

 मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के रूप में आप के पास एक ऐसी मंत्री है जो सदैव दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास करती रहती हैं. नौकरशाही, कुलपतियों और यहां तक की मीडिया के साथ उनके प्रत्येक संवाद में उनकी बेरुखी एवं अप्रियता देखने को मिलती है. शायद एक दिन कोई न कोई उनके लिए डिग्री का इंतजाम कर देगा. वह एक चतुर मंत्री हैं और उनकी भाषा पर पकड़ मजबूत है. उनकी समस्या मनोवैज्ञानिक है, उनका मानना है कि उनके वार्ताकारों को उनकी बौद्धिक योग्यताओं पर संदेह है और इसलिए अपना रोब बरकरार रखने के लिए वार्ताकारों को नीचा दिखाना उनके लिए अत्यंत आवश्यक है. यहां तक कि जेएनयू विवाद में स्मृति का आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप संघ परिवार में उनके प्रधानों को प्रसन्न करने की उनकी उत्सुकता को प्रतिबिंबित करता है जबकि मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में उचित यही होता कि वह सार्वजनिक रूप से कोई भी टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की जांच करती. स्वयं को राष्ट्रवादी करार देना बेहद आसान है लेकिन एक सड़ी-गली, रटने पर निर्भर शिक्षा प्रणाली को परिवर्तित करना ही एक सच्चा देशभक्त कार्य होगा.

इसी बीच, राहुल गांधी ने भी गृहमंत्री की तरह जल्दबाजी करने की गलती की. अगर राजनाथ सिंह ने भारत-विरोधी नारे लगाने वाले जेएनयू के छात्रों के खिलाफ ‘सख्त’ कार्रवाई का आदेश दिया था तो राहुल गांधी ने भी नारे लगाने वालों के प्रति सहानुभूति जताने के लिए जेएनयू परिसर की ओर कूच करने में कतई देरी नहीं की. सच्चाई यह है कि राहुल गांधी की पार्टी का एक वर्ग हमेशा से अफजल गुरु के मुद्दे पर अनिश्चितता की स्थिति में रहा है और जम्मू-कश्मीर में तो पार्टी विधायकों ने अफजल के परिवार के लिए उसके अवशेषों की मांग करने वाले ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किए थे. जो भी हो, राहुल गांधी को यह स्मरण रखने की जरूरत है कि अफजल गुरु की दया याचिका खारिज होने के बाद यूपीए सरकार ने फांसी पर लटकाया था. वह उन लोगों से समर्थन की उम्मीद बिलकुल न करें जो छतों पर खड़े होकर चिल्लाते हैं कि अफजल गुरु की फांसी एक न्यायिक हत्या थी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)