धूल और भीड़ भी वाराणसी के आकर्षण को मिटा नहीं पाई, एक ऐसा शहर जिसे लगभग एक अरब लोगों की आध्यात्मिक धुरी के रूप में जाना जाता है जबकि लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डा आधुनिक है, एक वर्ष पहले इस स्तंभलेखक की पिछली यात्रा के दौरान यहां साफ-सफाई की व्यवस्था को किसी भी हाल में संतोषजनक नहीं कहा सकता था. खुले स्थानों पर कूड़े के ढेर लगे हुए थे और दीवारों पर जमे मैल ने उनका रंग बिगाड़ दिया था. टिकट काउंटरों और यात्रियों के सामान के बेल्ट पर कार्यरत कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उदासीन रहते हुए इधर-उधर टहल रहे थे. हालांकि, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की ओर जाने वाली सड़क की हालत की तुलना में हवाई अड्डा कहीं बेहतर था, जो कूड़े-करकट से भरी पड़ी थी और जिस पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उन लोगों के लिए खाने-पीने के बूथ मौजूद थे जो उनमें बिकने वाले सामान का उपभोग कर पेचिश या उससे भी बदतर बीमारी का जोखिम उठा सकते हैं.

लापरवाह वाहन चालक तेज गति और बेतरतीब ढंग से एक-दूसरे को ओवरटेक कर रहे थे और केवल ईश्वर की कृपा से हर कुछ मिनटों बाद हादसा होने से बचता रहा. यहां तक कि मंदिरों के आसपास जिन रिक्त स्थानों को पवित्र माना जाता है, वहां भी गंदगी के ढेर लगे हुए थे. नदी किनारे होते लगातार अंतिम संस्कारों और उपेक्षित ऐतिहासिक निर्माणों की दुर्दशा देखने के परिणामस्वरूप नाव में घाटों के दर्शन करना अधिक परेशान कर देने वाला अनुभव था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से ही ‘स्वच्छ भारत’ निर्माण करने के अपने इरादे की घोषणा की थी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा मौजूदा विदेश नीति पर आयोजित सम्मेलन के शुरुआती एवं समापन समारोह पर भाषण देने के अनुरोध को स्वीकार करने के पीछे के कारण का एक हिस्सा यह देखना था कि प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र ने उनके बुलावे पर कितनी अच्छी तरह या फिर कितनी न्यूनता से प्रतिक्रिया दी थी. हवाई अड्डा साफ-सुथरा था और बिल्कुल नया दिखाई पड़ता था जबकि बाहर की सड़कें बेदाग थीं. कचरे के ढेर नदारद थे क्योंकि हर पान की दुकान और खाने-पीने की अन्य दुकानों को कूड़ादान प्रदान किया गया था. ये सब बीते सात दशकों के दौरान भी किया जा सकता था, लेकिन नहीं किया गया. कूड़ेदानों के अभाव में राज्य बदबूदार हो गया था.

जहां तक सड़कों की बात है, अब कार अथवा दो पहिया चालकों को फुटपाथ पर माल बेचने वालों से टकराने से बचने के लिए पैदल चलने की गति तक नहीं आना पड़ता क्योंकि वे अब ओझल हो गए हैं. क्या यह मुंबई अथवा दिल्ली में समय-समय पर होने वाली कार्रवाई की तर्ज पर पुलिस द्वारा की गई सख्त कार्रवाई का नतीजा था? ऐसा प्रतीत होता था कि ऐसा नहीं है और यातायात में बाधा उत्पन्न न करने वाले स्थानों की ओर स्थानांतरण, स्वैच्छिक निर्णय था. इससे भी अधिक चमत्कारिक ढंग से दुनिया को थूकदान के रूप में देखने की बनारसी आदत, इस मकसद के लिए रखे गए थूकदानों के इस्तेमाल के साथ गायब हो गई है. बेशक अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें अपनी पुरानी आदत से मुक्ति नहीं मिल पा रही क्योंकि अभी भी थूक और पान के अनियत धब्बों को देखा जा सकता है. हालांकि, जहां ये धब्बे सर्वव्यापी थे, वहीं अब ये बहुत कम स्थानों तक सीमित रह गए हैं. केवल एक वर्ष के भीतर वाराणसी के ऐसे प्रत्यक्ष परिवर्तन के नायक कौन हैं?

अब जबकि वह प्रधानमंत्री बन चुके हैं जो लोग नरेंद्र मोदी के गुणों के प्रति कुछ हद तक बेपरवाह थे, वही अब उनकी प्रशंसा के गीत गा रहे हैं. फिर भी मोदी अपने स्वच्छ अभियान में कभी सफल न हो पाते अगर वाराणसी के निवासियों ने अंतत: ये फैसला न किया होता कि अगर वे दुबई या सिंगापुर में गंदगी फैलाने से बचते हैं तो ऐसा ही काम वे अपने शहर में भी सरलता से कर सकते हैं. परिवर्तन आया है व्यवहार में, अपने शहर पर गर्व करने में और यह सुनिश्चित करने की चाह में वाराणसी को उसके अपने ही लोगों द्वारा विरूपित नहीं किया जाएगा. थूकना अब कम आम हो गया है और सार्वजनिक स्थानों पर तो बहुत मुश्किल से किसी को थूकते देखा जा सकता है. वाराणसी के लोगों ने अचानक इस तथ्य का सामना किया है कि उनका शहर एक अंतर्राष्ट्रीय विरासत है और एक ऐसी परंपरा का भंडार है जो हजारों वर्ष पीछे जाती है. हर तरफ देखे जाने वाले बिजली के तारों को अब भूमिगत कर दिया है ताकि कोई अचेत राहगीर उनकी चपेट में न आने पाए.

नालियों की गंदगी साफ कर दी गई है और उन्हें फिर से दुरुस्त कर दिया गया है. ऐसा श्रम राज्य का नहीं बल्कि लोगों का है, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि देशभर के अन्य शहरों में भी व्यवहार में ऐसा ही परिवर्तन, गर्व में ऐसी ही वृद्धि न हो सके ताकि दूर से आए सैलानी, इस देश के लोगों की फूहड़ता के लिए उनकी हंसी न उड़ा सकें. नरेंद्र मोदी में भारत के पास पहला उत्तर-औपनिवेशिक प्रधानमंत्री है और वह उस देश पर शासन कर रहे हैं जहां के लोग अपने संशय और अपर्याप्तता की भावना से शीघ्रता के साथ छुटकारा पा रहे हैं. भले ही अभी भी औपनिवेशिक नौकरशाही के बोझ तले दबे हुए हैं, मोदी से ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वह गुलामों के लिए बनाए गए अंग्रेजों के कानूनों को हटा कर स्वतंत्र लोगों के लिए बनाए गए कानूनों को स्थापित कर, ‘अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार’ के वायदे को पूरा कर दिखाएंगे. कई पूर्व प्रधानमंत्रियों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा करने से रिश्वतखोरी की गुंजाइश में तेजी से कमी आएगी. एक उपनिवेश के विपरीत एक स्वतंत्र देश स्वच्छ रखने लायक है, ईमानदार रखने लायक है और उम्मीद करते हैं कि वाराणसी में देखा गया परिवर्तन देश के अन्य हिस्सों में भी तेजी से फैलेगा. अगर इस कचरा-ग्रस्त शहर को तबदील किया जा सकता है, अगर छह दशकों के स्थानीय प्रशासन के बावजूद चंढीगढ़ साफ-सुथरा और लुभावना बना रह सकता है तो शेष भारत में भी ऐसा होने के लिए ठोस कारण मौजूद हैं.

 (यह लेखक के निजी विचार हैं.)