जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था. हरियाणा में शायद ऐसा ही हुआ और हो रहा है. पूरा हरियाणा जल रहा है और सरकार सिर्फ आश्वासन दे रही है. अपील कर रही है. ऐसा तब है तब सबकुछ पहले से तय था. आए दिन नेताओं की बयानबाजी से इस आग को हवा मिल रही थी. आग सुलग रही थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक इस आग ने इतना भयावह रूप ले लिया कि पूरा प्रदेश जल उठा. हिंसक घटनाएं शुरू हो गर्इं. सरकारी इमारतों और वाहनों को जलाया जाने लगा. पूरे हरियाणा की रफ्तार पर ब्रेक लग गई.

क्या हरियाणा में जो कुछ भी हुआ वह पूर्व नियोजित नहीं था? सरकार तो ऐसा ही मानकर चल रही है. जबकि सच्चाई यह है कि पिछले कई महीनों से जाट आंदोलन के लिए युवाओं की भर्ती की जा रही थी. ‘जाट सेना’ को लाठी, डंडे, तलवार व अन्य हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा था, जिसके प्रति मीडिया ने स्पष्ट चेतावनी भी जारी की थी. दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थक जाट नेताओं और आरक्षण का विरोध कर रहे नेताओं के बीच जुबानी जंग भी अपने चरम पर थी. एक-दूसरे की लाश गिराने की धमकी दी जा रही थी. एक-दूसरे को घर में घुसकर मार देने की धमकी का सिलसिला चल रहा था. लेकिन, सरकार की तरफ से जाट आंदोलन की तैयारी और संबंधित जुबानी जंग को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए. अगर समय रहते ऐसा कर लिया जाता तो शायद यह विषम स्थिति पैदा नहीं होती.

24 घंटे के भीतर-भीतर हरियाणा में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सेना को मैदान में उतरना पड़ गया. हरियाणा में इस तरह के आंदोलन की परिपाटी काफी पुरानी है. जब-जब इस तरह के आंदोलन की सुगबुगाहट हुई सरकार पहले से तैयार रहती है. पर इस बार ऐसा नहीं हुआ. कहने को भारी भरकम खुफिया विभाग के अधिकारियों की फौज है. तो क्या मान लिया जाए कि इस बार भी सरकार का खुफिया तंत्र नाकारा साबित हुआ. या अगर खुफिया तंत्र ने अपनी रिपोर्ट पहले दे दी थी कि यह आंदोलन हिंसक हो सकता है तो क्या सच में सरकार आग फैलने का इंतजार कर रही थी?

हरियाणा ने कुछ ऐसे ही हालात रामपाल प्रकरण में देखे थे. उस वक्त भी चंद लोगों ने कैसे हरियाणा की पुलिस और प्रशासन को विवश कर दिया था, पूरे देश ने टीवी पर लाइव देखा था. चुपचाप एक आश्रम के अंदर गोला-बारूद का भंडार इकट्ठा हो गया और सरकार का खुफिया विभाग कुछ पता नहीं कर सका. हालात उस वक्त हास्यास्पद हो गए थे जब पूरे हरियाणा की पुलिस फोर्स इन गुंडों के आगे बेबस और लाचार हो गई थी. सरकार सिर्फ आश्वासन देती रही. उस वक्त महिलाओं और बच्चों को ढाल बनाने की बात कहकर सरकार ने अपना बचाव किया. पर इस बार के जाट आंदोलन के लिए सरकार के पास न तो कोई तर्क बचा है और न हरियाणा की आम जनता को इन तर्कों से कोई सरोकार है. हरियाणा की जनता सिर्फ हिसाब मांगेगी. हिसाब उस नुकसान का जो दंगाइयों ने आरक्षण की आग में स्वाहा कर दिया. हिसाब उस मानसिक स्थिति और दहशत का जो लंबे समय तक इनके दिलो-दिमाग में छाई रहेगी. हिसाब उस विश्वास का, जिसके कारण हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी.

हरियाणा सरकार ने गुजरात के पाटीदार आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए अफवाहों से बचने के लिए हरियाणा के करीब आठ से नौ जिलों की इंटरनेट और मोबाइल सेवा बंद कर दी. पर इस सेवा के बंद होने से कुछ ऐसी सच्चाइयों पर भी परदा पड़ गया है जो शायद तत्काल सरकार या आम जनता तक पहुंच सकती थी. आरक्षण की आग कब जातिगत दंगे में तब्दील हो जाएगी, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. इंटरनेट सेवा बंद कर देने के बावजूद जातिगत दंगों ने भयानक रूप ले लिया. इसलिए यह अफवाहों का तर्क भी बेमानी हो जाता है. रोहतक, झज्जर, भिवानी, सोनीपत सहित कई जगहों से छन-छन कर सूचनाएं मिलीं कि यहां आरक्षण की मांग तो पीछे हट गई, लोगों ने एक-दूसरे पर जाति के नाम पर हमले शुरू कर दिए. चुन-चुन कर घरों और दुकानों में आग लगाई गई. लोगों से उनकी जाति पूछकर मारपीट की गई.

हरियाणा में यह कैसा खेल चल रहा है. खट्टर सरकार को गंभीर चिंतन करने की जरूरत है. मुख्यमंत्री के तौर पर मनोहर लाल खट्टर भले ही एक ईमानदार छवि के राजनेता के रूप में सामने आ रहे हैं. पर अपने मंत्रिमंडल और पार्टी नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश हर बार उन्हें एक नए संकट में डाल देती है. न तो वह पार्टी नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने के लिए ठोस और कड़े फैसले ले पा रहे हैं और न इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए.

राज्य की सड़कों पर सेना को उतारने को मामूली तौर पर नहीं लिया जा सकता है. हरियाणा में जाटों के प्रतिशत पर बहस करने की बजाय सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे. जब हरियाणा की जनता ने पूर्ण बहुमत से मंत्रिमंडल की बागडोर सौंपी है तो ठोस फैसले लेने में सरकार क्यों पीछे हो रही है? मंत्रिमंडल में जातिगत गणना से ऊपर उठकर खट्टर सरकार को ऐसे हालातों पर काबू करने की जरूरत है.

प्रदेश में सौ फीसदी लोगों को संतुष्ट करके सरकार नहीं चलाई जा सकती है. मैनेजमेंट का सबसे बड़ा फंडा है आपका पतन उसी दिन से शुरू हो जाता है जिस दिन आपके मन में   सौ फीसदी लोगों को संतुष्ट करने का विचार आ जाता है. आंदोलन तो चलते ही रहेंगे. पर इन आंदोलनों का खामियाजा अगर आम जनता को उठाना पड़ेगा तो यकीन मानिए आगे की राह आसान नहीं होगी. हरियाणा की मनोहर सरकार के लिए मंथन का वक्त है. उसे तुष्टिकरण की राजनीति का त्याग करना होगा और सख्त फैसले लेने होंगे. अब निर्णय सरकार को करना है कि या तो वह ठोस और कड़े फैसले लेकर जनता के मन में अपनी छवि सुधारे या फिर नीरो की तरह चुपचाप बैठकर बंसी बजाती रहे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)