विदेशों में राष्ट्रीय शक्ति और आर्थिक प्रगति के निर्माण के प्रति दृढ़संकल्प देश के रूप में भारत की छवि स्थापित करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अर्जित अप्रत्याशित सफलता के बीच हमारे देश में ऐसी प्रवृत्तियां देखने को मिल रही हैं जो हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं. एक लोकतंत्र में राजनीतिक विपक्ष अपनी मर्जी से सत्तारूढ़ शक्ति की जितनी चाहे उतनी आलोचना कर सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गैर-राजनीतिक मामले में सत्तारूढ़ सरकार के साथ सम्मिलन की उम्मीद की जाती है. इसी तरह, सरकार की किसी भी नीति अथवा कार्यकारी कार्रवाई के खिलाफ सार्वजनिक रूप से राय देने के लिए लोगों द्वारा उनकी विरोध करने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन वे राज्य का नाश करने के लिए अथवा अलगाववाद का समर्थन करने के लिए हिंसा की आवश्यकता की मांग नहीं कर सकते.

एक लोकतंत्र में राष्ट्र की स्थिरता और संबद्धता को बरकरार रखने के लिए आवश्यक है कि पुलिस को देश की आचार संहिता को लागू करने के लिए बिना किसी भय अथवा पक्षपात के कार्य करने की स्थिति में होना चाहिए. पुलिस को भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती पेश करने वाले व्यक्तियों अथवा संगठनों पर कठोर कार्रवाई करने में पूरी तरह से स्वायत्त होना चाहिए. जेएनयू में एक आतंकवादी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फांसी की सजा दिए जाने के विरोध में भारत को तबाह करने की मांग करने वाले राष्ट्र-विरोधी तत्वों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस के शीघ्र हस्तक्षेप की सराहना की जानी चाहिए. परिसर में हो रही गतिविधियों पर नजर रखने में विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा है. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता राष्ट्रीय संप्रभुता की अवहेलना नहीं कर सकती.

जैसे-जैसे भाजपा सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने को हैं, भारत का आंतरिक दृश्य विपक्ष और गैर-सरकारी मंचों द्वारा बाहरी दुनिया को भारत में विरोध-प्रदर्शन के प्रति असहिष्णुता दिखाने के विनाशकारी प्रयास द्वारा चिह्नित है. उन्होंने इसके साथ-साथ पहचान आधारित राजनीति को इस ढंग से उत्तेजित किया है कि यह देश सांप्रदायिक तनावों और टकरावों के प्रति संवेदनशील बन गया है. यह सब ऐसे समय पर हो रहा है जब भारत को एक दृढ़संकल्प प्रतिद्वंदी के हाथों लंबे समय से छद्म युद्ध का सामना करना पड़ रहा है और खुद हमारे लोगों को उसके एजेंटों और समर्थकों के रूप में भर्ती होते हुए देख रहा है.

कमजोर नीति के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है. इसका उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब उत्तरप्रदेश के चरखी दादरी में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से उत्पन्न घटना से निपटने में राज्य सरकार की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी की पूरी तरह से अनदेखी करते हुए संपूर्ण घटनाक्रम की जिम्मेदारी केंद्र पर डाल दी गई. विपक्ष और उसके सहयोगी दलों ने असहिष्णु राज्य का एक और संकेत दिखाने के लिए चरखी दादरी घटना पर जमकर बवाल काटा. वास्तव में, सच्चाई यह है कि विकास और सुरक्षा क्षेत्र में केंद्र सरकार के प्रदर्शन में किसी प्रकार की कमी के बजाय कानून एवं व्यवस्था मोर्चे पर कई राज्य सरकारों की सुस्पष्ट विफलता के कारण विदेशों में भारत की छवि को अधिक नुकसान पहुंच रहा है.

यही समय है कि सरकार को किसी भी राजनीतिक अवरोधों को पार करते हुए ऐसे तत्वों के साथ सख्ती से निपटना चाहिए जिन्होंने न केवल सरकार पर किए जा रहे हमलों को तेज किया है बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा और आंतरिक शांति का ध्वंस करने के लिए लोकतंत्र के तर्क का दुरुपयोग भी किया है. कोई भी राजनीतिक दल आखिर कैसे उन आतंकवादियों के पक्ष में सार्वजनिक लामबंदी की अनुमति दे सकती है जिन्हें देश की सर्वोच्च न्यायपालिका द्वारा दंडित किया गया था?

हाल के सभी घोटालों में लिप्त छोटे या बड़े संदिग्धों से लेकर जेएनयू कैंपस में भारत को नष्ट करने की मांग करने वाले राष्ट्रविरोधी एजेंटों तक, कानून का उल्लंघन करने वाले सभी तत्वों को बिना किसी भय अथवा पक्षपात के दंडित किया जाना चाहिए. अपनी आजादी के इस्तेमाल का तर्क देकर राज्य के खिलाफ गंभीर अपराध करने वालों को दंडित करने के लिए हमारी न्यायपालिका से बेहतर संस्थान कोई नहीं हो सकता.

राज्यों में कानून एवं व्यवस्था को नियंत्रित करने में पुलिस की अक्षमता पर केंद्र द्वारा जांच करवाए जाने की जरूरत है. ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस कर्मियों की संख्या और उनकी गुणवत्ता के साथ कोई न कोई गड़बड़ जरूर है. जिला पुलिस अधीक्षक और डिप्टी एसपी को स्टेशन हाउस आॅफिसर (एसएचओ) के असंतोषजनक प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. केंद्र आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की भर्ती करता है और उन्हें प्रशिक्षण देने के बाद विभिन्न राज्यों में नियुक्त करता है. केंद्र इन अधिकारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता और राज्यों के प्रशासनिक स्तर में निरंतर गिरावट पर मूकदर्शक नहीं बना रह सकता.

राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतर-सामुदायिक संबंधों और कानून एवं व्यवस्था में राजनीति के आवश्यकता से अधिक दखलअंदाजी के कारण राष्ट्र की अखंडता और स्थिरता प्रभावित हो रही है. अलगाववाद का समर्थन करने वालों, राष्ट्रीय तिरंगे का अपमान करने वालों और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वालों पर कड़ी   कार्रवाई की जानी चाहिए. सोशल मीडिया पर भी कानूनी निषेध लगाए जाने की जरूरत है क्योंकि यह सार्वजनिक मंच की भूमिका अदा करता है. राजनीति हमारे उच्च शिक्षा केंद्रों के शैक्षिक मानकों को नष्ट कर रही है. वयस्क मतदाताओं के रूप में छात्र कैंपस के बाहर अपने राजनीतिक उपक्रमों का पीछा कर सकते हैं.

विदेश नीति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मिली अभूतपूर्व सफलता की तुलना में घरेलू शासन क्षेत्र में नरेंद्र मोदी सरकार के प्रदर्शन के अधिक महत्व ग्रहण करने की संभावना है. सुरक्षा खतरों के लिए अत्यावश्यक प्रतिक्रियाओं की प्रणाली के निर्माण के लिए और देशभर में पुलिस के आधुनिकीकरण की देखरेख करने के लिए गृहमंत्री के अधीन पेशेवर पृष्ठभूमि वाले आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री को नियुक्त करके भारत सरकार समझदारी भरा निर्णय ले सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)