पंजाब में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनावी अभियान की योजना बनाने के लिए जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को नियुक्त करने के निर्णय को हरी झंडी देकर कांग्रेसी आलाकमान अनजाने में यह स्वीकार करता हुआ प्रतीत होती है कि उसका मौजूदा नेतृत्व अकाली दल-भाजपा के सत्तारूढ़ गठबंधन और आम आदमी पार्टी की दोहरी चुनौती का सामना करने के लिए अपर्याप्त है. प्रशांत किशोर के बायोडाटा में कई प्रभावशाली उपलब्धियां हैं लेकिन कांग्रेस और उसकी कार्यशैली का ज्ञान कभी-भी प्रशांत की विशेषता नहीं रही. पार्टी कार्यकताओं के लिए प्रशांत अभी तक एक अजनबी हैं और अगले वर्ष फरवरी में होने वाले चुनावी महायुद्ध से पहले प्रशांत की उपस्थिति से कार्यकर्ताओं को किसी भी ढंग से प्रेरित किए जाने की संभावनाएं अत्यंत क्षीण हैं.

बेहतर होता यदि राज्य की राजनीति से अभी तक अपरिचित प्रशांत किशोर के बजाय समग्र रणनीति, उम्मीदवारों का चयन और रसद विभाग का जिम्मा पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष (पीसीसी) कैप्टन अमरेंद्र सिंह और अंबिका सोनी (प्रभारी अभियान समिति) के हाथों में सौंप दिया गया होता. अमरेंद्र सिंह और अंबिका सोनी ने शायद प्रशांत किशोर की नियुक्ति में अहम भूमिका निभाई हो लेकिन अगर यह सच्चाई भी है तो उनके द्वारा प्रशांत को नियुक्त किए जाने के पीछे ठोस कारण जरूर रहे होंगे.

कैप्टन अमरेंद्र सिंह पंजाब के राजनीतिक अखाड़े और मतदाताओं की रग-रग से पूरी तरह वाकिफ हैं और उन्हें पंजाब में वैकल्पिक सरकार प्रदान करने के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति माना जाता है. हालांकि, कैप्टन अमरेंद्र सिंह की राज्य में सत्ता वापसी के प्रयासों में आम आदमी पार्टी नेतृत्व द्वारा बाधा पहुंचाई जा सकती है. कांग्रेसी आलाकमान के एक वर्ग ने वर्ष 2007 और 2012 में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए असफल रहने पर सीधे तौर पर कैप्टन अमरेंद्र सिंह को जिम्मेदार ठहराया था जबकि हकीकत यह थी कि टिकटों के अनुचित वितरण और अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण कांग्रेस को पंजाब में हार का मुंह देखना पड़ा था.

अगले कुछ महीनों में यह साफ हो जाएगा कि पंजाब में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में प्रशांत किशोर की भूमिका का विस्तार किस हद तक रहेगा. भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे पुरानी व भव्य पार्टी की गतिशीलता को समझना ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद कठिन है जिसने इसे करीब से नहीं देखा और न ही कभी इसकी संरचना का हिस्सा रहा है. दिवंगत इंदिरा गांधी हमेशा कहती थीं कि कांग्रेसी अनोखे लोग हैं जो अपनी समस्याओं और विरोधियों से निपटने के लिए अपनी स्वयं की तिकड़में लड़ाते हैं. यह बात और है कि विशेष रूप से बीते दशक के दौरान शीर्ष नेतृत्व में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को छोड़कर कई ‘बाहरी’ सदस्यों को शामिल किया गया है. वर्ष 2014 में यूपीए सरकार की भारी पराजय के लिए कई कारणों में से एक कारण ‘बाहरी’ कारक भी था क्योंकि कांग्रेस के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने ‘बाहरी’ आधिकारिक प्रत्याशियों की सफलता के लिए कार्य करने से इंकार कर दिया था. कांग्रेस में कई चेहरे इन ‘बाहरी’ तत्वों के हैं जो किसी समय अन्य दलों की ओर से कार्य किया करते थे. इस तरह के पात्रों में मधुसूदन मिस्त्री, मोहन प्रकाश, संजय निरुपम और रेणुका चौधरी के नाम प्रमुख हैं. हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने वाले अधिकांश पार्टी प्रत्याशी तो टिकट वितरण के समय आधिकारिक रूप से कांग्रेस में शामिल भी नहीं हुए थे. एक शीर्ष कांग्रेसी नेता ने कथित तौर पर एक विश्वासपात्र को बताया कि पार्टी में केवल वही लोग बचे हैं जिन्हें और किसी दल में स्थान नहीं मिल सका है. इसी मानसिकता के कारण पार्टी के राजनीतिक भाग्य का संपूर्ण हृास हुआ है. दलित-अल्पसंख्यकों को रिझाने के कांग्रेस के अथक प्रयासों ने कांग्रेस को अन्य समुदायों के वर्गों से दूर कर दिया जबकि सच्चाई यह है कि इस मोड़ पर न ही दलित और न ही अल्पसंख्यक समुदाकय कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैंं. इसके अतिरिक्त, सोनिया गांधी मंडली के सदस्यों ने भी संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाया है. यह सर्वविदित तथ्य है कि असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के खिलाफ विद्रोह करने के लिए हिमंता बिस्वा शर्मा को पार्टी के तीन रसूखदार नेताओं द्वारा भड़काया गया था.

पंजाब के चुनावी संग्राम में प्रशांत किशोर को उतारने का निर्णय एक मनमानी कार्रवाई भी प्रतीत होती है. किशोर के कई प्रशंसक संसदीय चुनावों में नरेंद्र मोदी और बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए पूरा श्रेय उन्हें देते हैं. यह बयान आंशिक रूप से सत्य हो सकता है क्योंकि दोनों अभियानों को गति नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के नेतृत्व द्वारा प्रदान की थी और इसका और किसी के साथ कुछ खास लेना देना नहीं था. निश्चित रूप से किशोर के पास संगठनात्मक कौशल है लेकिन उनसे किसी बड़ी चुनावी सफलता की उम्मीद रखना सही नहीं है.

पिछले कुछ समय से पंजाब कांग्रेस गुटबाजी की समस्या से ग्रस्त है और कांग्रेसी आलाकमान ने कैप्टन अमरेंद्र सिंह को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर सूझ-बूझ भरा निर्णय लिया है. अकाली-भाजपा गठबंधन और आप की चुनौती को पराजित   करने के लिए कांग्रेस को एक सशक्त इकाई के रूप में मैदान में उतरना पड़ेगा. यह सामंजस्य किसी बाहरी रणनीतिकार द्वारा नहीं बल्कि केवल पार्टी नेतृत्व द्वारा ही उत्पन्न किया जा सकता है. 2014 संसदीय चुनावों और 2015 बिहार विधानसभा चुनावों का नतीजा विजेताओं के पक्ष में चल रही लहर से प्रभावित थे. फिलहाल, पंजाब में ऐसी कोई अनुकूल राजनीतिक हवा नहीं है जो कांग्रेस की नैया पार लगा सके. पंजाब में पार्टी कार्यकर्ताओं का सामूहिक उत्साह और उनकी एकता ही कांग्रेस के पक्ष में खेल को मोड़ सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)