यह साफ है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप इर्दोगन जुए में विश्वास रखते हैं. वह इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि रूस की तुलना में उनके देश की सैन्य शक्ति अपेक्षाकृत दुर्बल है और नाटो में अपने भागीदारों को रूस के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के लिए उत्तेजित करने के लिए स्वयं एक प्रलोभन के रूप में कार्य कर रहे हैं. सीरिया के साथ लगती तुर्की की सीमा में ‘नो फ्लाई जोन’ की उनकी मांग के पीछे यही तर्क है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का भरपूर समर्थन प्राप्त है. गौरतलब है कि हिलेरी क्लिंटन ने राज्यसचिव के अपने कार्यकाल में एक के बाद एक विनाशकारी निर्णय लिए थे. उदाहरण के लिए, उग्रवाद के बजाय उदारवाद के प्रति असंदिग्ध प्रतिबद्धता रखने वाले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समर्थन देना, मिस्र में हुस्नी मुबारक को अपदस्थ करने वाले मुस्लिम ब्रदरहुड को समर्थन देना, लीबिया में गद्दाफी को खदेड़ने वाले गठबंधन की वाहवाही करके और उस देश का नियंत्रण चरमपंथी लड़ाकों को सौंपना और सीरिया में जहां हिलेरी क्लिंटन आईएसआईएस, अल नुसरा और अलकायदा के जुनूनी कट्टरपंथियों के समरूप ‘नियंत्रित’ लड़ाकों के सशस्त्रीकरण, प्रशिक्षण और निधीयन को समर्थन दे रही हैं. तुर्की राष्ट्रपति अपनी नीतियों के माध्यम से अपने देश में गृहयुद्ध और नागरिक अशांति के लिए स्थितियां उत्पन्न करके जिया-उल-हक  के पदचिह्नों पर चल रहे हैं.

यह देखते हुए कि तेल की कीमतों में गिरावट के बाद आयुध उद्योग ही रूस का एकमात्र विकासक्षम निर्यात है, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का उपहास करना एक अत्यंत जोखिमपूर्ण रणनीति साबित हो सकती है. रूसी सैन्य विमान को दूसरी बार गिराए जाने पर मॉस्को की ओर से जवाबी हमले की संभावना बेहद मजबूत है और तुर्की के राष्ट्रपति इर्दोगन रूसी प्रत्युत्तर पर अपनी नजरें गड़ाए बैठे हैं. इर्दोगन को पूरा विश्वास है कि अमेरिका और अन्य नाटो सदस्य राष्ट्रों को संधि-बाध्यता के परिणामस्वरूप हस्तक्षेप करके रूस के साथ हवाई युद्ध में शामिल होना पड़ेगा. इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर ऐसा होता है तो कई लड़ाकू विमानों को मार गिराया जाएगा. इस तरह के प्रदर्शन से सैन्य उपकरणों के खरीदारों को निश्चित रूप से फायदा होगा क्योंकि उन्हें वास्तविक युद्ध में अमेरिकी, रूसी और फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता का प्रदर्शन देखने को मिलेगा.

भारतीय रक्षा मंत्रालय में लोकप्रिय होने के बावजूद सीरिया की लड़ाई में ‘राफेल’ एसयू-35 और एसयू-27 की तुलना में खुद को विशिष्ट साबित नहीं कर पाता हुआ प्रतीत होता है. इससे कुछ लोग यह सोचने के लिए मजबूर हो गए हैं कि क्या भारत सरकार ने भारतीय वायु सेना के लिए फ्रांस से ‘राफेल’ लड़ाकू विमान खरीदने के लिए अत्यंत महंगा सौदा करके सही चयन किया है अथवा नहीं. सीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिकी, फ्रांसीसी और ब्रिटिश सैन्य प्रयास वास्तव में मामूली रहे हैं और पुतिन द्वारा बशर अल असद की मदद के लिए वायु सेना भेजे जाने के बाद ही आईएसआईएस को गंभीर क्षति पहुंचाई जा सकी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चित अवस्था को देखते हुए और पूर्वी एशिया, यूरोप व उत्तरी अमेरिकी बैंकों द्वारा निम्न बयाज दरों के माध्यम से व्यय को प्रोत्साहित करने के प्रयासों के बावजूद वैश्विक आर्थिक  मंदी के गति पकड़ने की संभावनाओं के साथ इस बात की संभावना बहुत क्षीण है कि बु्रसेल्स स्थित नाटो मुख्यालय रूस का मुकाबला करने के लिए तुर्की सेना के साथ हाथ मिलाएगा. तुर्की राष्ट्रपति नाटो के संशय को दूर करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. वह रूस को भड़काकर उसकी ओर से ऐसी मजबूत प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे हैं जिसका परिणाम नाटो के संयुक्त रक्षा खंड के संक्रीयण में होगा. इर्दोगन सीरिया, इराक और तुर्की के आकाश में रूसी और तुर्की लड़ाकू विमानों की भिड़ंत शुरू करने के लिए नाटो सदस्य देशों को भरोसे में लेना चाहते हैंं. रूस के साथ टकराव करना आईएसआईएस को प्रत्यक्ष लाभ पहुुंचाने के समान होगा क्योंकि फिलहाल आईएसआईएस को सबसे अधिक खतरा रूस से है. यह उनके देश का दुर्भाग्य है कि कुर्दियों पर हमला करके इर्दोगन ने तुर्की वायु सेना को चरमपंथियों की वायु शाखा में तब्दील कर दिया है जबकि सच्चाई यह है कि कुर्दी लड़ाके आईएसआईएस को जमीन पर चुनौती देने वाले सबसे शक्तिशाली सैन्य बलों में से एक हैं. ठीक 1990 के प्रारंभिक वर्षों की तरह, इस बार भी ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका ने अपने मंद सैन्य अभियान में कुर्दियों से पर्याप्त सहायता प्राप्त करने के बाद उनको उनके हाल पर छोड़ दिया है. आईएसआईएस के खिलाफ इस मंद सैन्य अभियान में फ्रांस और ब्रिटेन की भूमिका व्यंग्यपूर्ण है.

यह स्तंभकार अमेरिका व भारत के बीच तीन ‘बुनियादी समझौतों’ पर हस्ताक्षर करने सहित लंबे समय से दोनों देशों के बीच नजदीकी सैन्य संबंधों का पक्ष लेता रहा है. गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच घनिष्ठ संपर्क को सक्षम करने वाले ‘बुनियादी समझौतों’ को मनमोहन सिंह सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था. एडमिरल गोर्शकोव जैसे कबाड़ की खरीद पर अरबों डॉलर खर्च करने के बजाय भारतीय नौसेना को अमेरिकी   ट्रेनटॉन मॉडल पर आधारित कई जलपोतों की आवश्यकता है, ताकि नौसेना यह सुनिश्चित कर सके कि उसके पास इस देश और उसके सहयोगियों की समुद्रों पार नौचालन करने की आजादी की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त शक्ति है. अमेरिका ही एकमात्र ऐसा मित्र राष्ट्र है जो वहनीय लागत पर वैश्विक ताकत बनने में भारतीय सेना की मदद कर सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जमीनी हकीकतों से स्पष्ट रूप से वाकिफ हैं. आशा करते हैं कि तुर्की राष्ट्रपति इर्दोगन विश्व की सबसे घातक सेनाओं के बीच युद्ध कराने का जोखिमपूर्ण जुआ हार जाएंगे और अगर वह चरमपंथियों की मदद करने वाली और मॉस्को को उकसाने वाली अपनी नीतियों को जारी रखते हैं तो नाटो सदस्य देशों द्वारा उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)