अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी में अपने कार्यकाल के पहले साल में ही अपनी स्थिति मजबूत कर ली है और अब उसकी नजरें पंजाब पर गढ़ी हुई हैं. गौरतलब है कि पंजाब में फरवरी 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं और भ्रष्टाचार और नशे के जाल में फंसे हुए इस राज्य में आम आदमी पार्टी एकबार फिर से कमाल दिखाने का मादा रखती है. पिछले वर्ष दिल्ली में अपने समर्थकों सहित सबको चौंकाते हुए 70 में से 67 विधानसीटें जीतने में सफलता प्राप्त करने वाली इस पार्टी को अभी काफी दूरी तय करनी है. आप ने दिल्ली में आगे बढ़ते हुए कांग्रेस को लगभग गौण कर दिया है और उसी समय आप के गढ़ में सेंध लगाने में कठिनाई का सामना कर रही भाजपा को भी नियंत्रित रखने में सफल रही है.

 राजनीतिक शब्दों में कहें तो ‘मफलर मैन’ अरविंद केजरीवाल की उनके संगठन पर मजबूत पकड़ है जिसे कुछ वर्ष पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए अभियान के समय गठित किया गया था. उन्होंने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे अपने विरोधियों को पार्टी से बाहर निकाल दिया है और अपने वफादारों की बड़ी संख्या के कारण पार्टी मामलों पर मजबूत नियंत्रण बनाए हुए हैं. यह सच है कि कई आप के कई समर्थक केजरीवाल और उनकी पार्टी से अलग हो गए हैं लेकिन पार्टी समर्थकों का मूलभूत समूह अभी भी बरकरार है. इसलिए आप सरकार को फिलहाल किसी प्रकार का खतरा दिखाई नहीं देता. दिल्ली में आप सरकार की मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा है और जब तक भाजपा राजधानी में नई ऊर्जा के साथ काम नहीं करती, तब तक अगले वर्ष दिल्ली में होने वाले नगर निगम निकाय चुनावों में इसके जीतने की संभावनाएं कमजोर रहेंगी. एक मुख्यमंत्री के तौर पर केजरीवाल के प्रदर्शन पर काफी बहस हुई है. उनके आलोचकों ने उन्हें ऐसे विघटनकारी अथवा अराजकतावादी के रूप में वर्णित किया है जो सामंजस्य की राजनीति के बजाय टकराव की राजनीति में यकीन रखता है. चुनावों से पहले, केजरीवाल इस तथ्य के प्रति पूरी तरह सतर्क थे कि दिल्ली सरकार की शक्तियां सीमित थीं और उसे कई मुद्दों पर केंद्र सरकार के अधीन रहना पड़ना था. लेकिन विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व जनादेश प्राप्त करके केजरीवाल एक राजनीतिक संकेत देना चाहते हैं.

एक मध्यम स्तरीय नौकरशाही निर्वाचित प्रतिनिधियों के निर्णय अथवा इच्छा को कैसे अस्वीकार कर सकता है? क्या निर्वाचित विधायकों का गृह मंत्रालय एवं शहरी विकास मंत्रालय में बैठे गैरजिम्मेदार बाबुओं के अधीन काम करना लोकतंत्र का विनाश नहीं है? क्या यह उचित है? क्या केंद्र को दिल्ली से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर फिर से विचार करके विधायकों को सशक्त करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाने चाहिए?

मौजूदा सरकारी मॉडल की कल्पना 1993 में बालाकृष्णन नाम के एक नौकरशाह ने की थी जिसे अधिकार की बहुलता के साथ-साथ दिल्ली में एक नया निकाय गठित करने के लिए कहा गया था. जस्टिस सरकारिया का स्थान लेने वाले बालाकृष्णन ने दिल्ली सरकार और नगम में निर्वाचित प्रतिनिधियों को शक्तियों से वंचित रखा. इस प्रकिया में महत्वपूर्ण निर्णय लेने का पूरा अधिकार नौकरशाहों के हाथों में था लेकिन जब भाजपा के तेजतर्रार नेता मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने तो नौकरशाहों की भूमिका को काफी हद तक सीमित कर दिया गया. खुराना दिल्ली के अब तक के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री रहे हैं और जनसंघ व भाजपा के शुरुआती दिनों में विपक्ष के निष्ठावान समर्थक के तौर पर अपने लंबे कार्यकाल के दौरान उनका राजनीतिक कद और अधिक ऊंचा हुआ था. किसी अधिकारी में उनके फैसलों पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं थी और उन्होंने फरवरी 1996 को अपने स्वेच्छिक प्रस्थान तक सरकार की कार्यशैली को सुव्यवस्थित किया. तत्पश्चात्, सभी मुख्यमंत्री काफी हद तक नौकरशाही पर निर्भर रहे हैं और इस प्रकार अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने में सदैव असमर्थ रहे.

सबसे लंबे समय तक सेवारत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को कार्यकाल में होते हुए 26 हजार 500 वोटों से हारने की संदिग्ध विशिष्टता प्राप्त थी. कई मायनों में केजरीवाल खुराना की तरह हैं. वह सरकार के हाथों से नियंत्रण छीनकर निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस देने का प्रयास कर रहे हैं और इसलिए इस प्रक्रिया में उन्होंने कई नौकरशाहों को अपना दुश्मन बना लिया है. वह दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के प्रति दृढ़संकल्प हैं और भाजपा एवं कांग्रेस को निरंतर रूप से याद दिलाते आ रहे हैं कि उन्होंने भी विभिन्न चरणों में इस मांग का समर्थन किया था लेकिन अब इस पर चर्चा करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे.  अरविंद केजरीवाल ने अपने पास किसी विभाग का प्रभार नहीं रखा ताकि वह अपना सारा समय राजनीतिक कार्य के प्रति समर्पित कर सकें. जब से उनकी सरकार सत्ता में आई है, तब से वो केंद्र सरकार के साथ निरंतर रूप से टकराव की स्थिति में रही है. केंद्र सरकार उपराज्यपाल नजीब जंग के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए प्रस्तावों को टालमटोल करने का प्रयास कर रही है. कुछ अस्प्ष्ट कारणों से पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी भी इस अजीबोगरीब लड़ाई में कूद पड़े हैं.

 यह केजरीवाल के विरोधियों का दुर्भाग्य   है कि वह कभी अपने विरोधियों को खुद पर हावी नहीं होने देते. उनकी राजनीतिक चतुरता उन्हें दूसरे राजनीतिज्ञों पर बढ़त प्रदान करती है. मुख्यमंत्री वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं से टकराव करते हुए अपने मूल निर्वाचन क्षेत्र को भी बरकरार रखने में सक्षम रहे हैं. लेकिन चूंकि केजरीवाल की जुझारू शैली मीडिया के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही है, उनकी सरकार की कई उपलब्धियां जनता की नजरों से ओझल रही हैं.

केजरीवाल ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में खुद को अपने पूर्ववर्तियों से श्रेष्ठ साबित किया है. उन्होंने बिजली और पानी वितरण के साथ-साथ प्रदूषण की समस्या से निपटने में अत्यंत समझदारी का परिचय दिया है. अरविंद केजरीवाल अब अपना सारा ध्यान पंजाब पर केंद्रित कर रहे हैं जहां उनकी पार्टी ने एक व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क बनाया है. वह धीरे-धीरे आम आदमी पार्टी की भूमिका को व्यापक करने की दिशा में काम कर रहे हैं. इसलिए उनका एक दुर्जेय सेनानी बने रहना जारी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)