स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में यह सुनिश्चित करने के कुछ कमजोर प्रयास किए गए थे कि केंद्रीय बजट में लोगों से अधिकतम संभव राजस्व निचोड़ने के औपनिवेशिक उद्देश्य के बजाय मुक्त समाज की आर्थिक अनिवार्यताओं को प्रतिबिंबित किया जाए. वित्तीय प्रणाली के भीतर सहक्रियाओं का ताला खोलने के लिए शनमुखम् चेट्टी, जॉन मथाई और चिंतामन डी देशमुख जैसे वास्तविक विशेषज्ञों को नियुक्त किया गया था, लेकिन अनुक्रमिक प्रधानमंत्रियों द्वारा क्रमबद्ध ढंग से उस भूमिका में अधिकारियों के प्रति नीति तैयार करने में सहायक साधारण राजनीतिज्ञों को स्थापित करने के साथ ऐसे पुरुष शीघ्र ही अपवाद साबित हुए. चूंकि, कोई अलग भारतीय वित्त सेवा नहीं है, वित्त मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा बजटीय अभ्यास को उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र में तीव्र विकास के साधन के बजाय राजस्व बढ़ाने के एक तरीके के रूप में देखा जाना जारी है.
 
बजट तैयार करते समय योजनाओं और कर्मियों पर होने वाले व्यय के मूल्यांकन पर अत्यधिक रूप से ध्यान केंद्रित किया जाता है. इसके बाद बजटीय खर्चों को पूरा करने के लिए संभाव्य राजस्व स्रोतों पर आवश्यकतानुसार कर लगाया जाता है. ऐसा दृष्टिकोण दक्षता और उत्पादकता के उस विचार को पूरी तरह से समाप्त कर देता है जो उनकी गणनाओं और व्यवहार में सर्वोच्च स्थान पर होना चाहिए. जबकि वास्तविक बजट प्रस्ताव अज्ञात हैं, ऐसे किसी भी बजट की रूपरेखा की भविष्यवाणी करना बेहद सरल है जहां बजट तैयारी की कमान औपनिवेशिक अधिकारी कैडर के हाथों में है.
 
उदाहरण के लिए, वे भारतीय नागरिकों के लिए आयकर की दरों में अर्थपूर्ण राहत देने का विरोध करते हैं और यूपीए शासनकाल में पी. चिदंबरम द्वारा कर-प्रणाली में स्थापित सेवाकर को 14-16 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रयास करते हैं. इस देश में उत्पादक-वर्ग पर लगाए जाने वाले अन्य प्रकार के करों के साथ-साथ आयकर का भुगतान करने वाले व्यक्ति को प्रदत्त सेवा करने के लिए उसके कुल प्रत्यक्ष कर बोझ में से एक-तिहाई या इससे अधिक के अतिरिक्त बोझ का भुगतान आखिर क्यों करना चाहिए? शायद औपनिवेशिक विचारों वाले अधिकारियों को दूसरों के लिए सेवाएं करने वाले नागरिक से कोई गिला-शिकवा है. अगर सेवाकर नहीं होता तो सेवा क्षेत्र उसी गति के साथ आगे बढ़ता रहता जिस गति के साथ यह चिदंबरम के प्रवेश से पहले बढ़ रहा था. नई नौकरियों के अवसर मिलते और परिणामस्वरूप आयकरदाताओं की संख्या में भी वृद्धि होती. लेकिन प्रत्येक माह 10 लाख और इससे अधिक नौकरियां उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सेवा-क्षेत्र की गतिशीलता तर्कहीन टैक्स की मार के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है. हाल ही में एक ऑनलाइन ट्रैवेल एजेंसी के मुख्य वित्तीय अधिकारी की गिरफ्तारी से भारत में विकास-निर्माण में निवेश करने का साहस रखने वालों की संख्या में और कमी आने की प्रबल संभावना है. वित्तीय मामलों में लोगों को जेल भेजने से अधिक महत्वपूर्ण है गंवाए गए पैसे की ब्याज सहित वसूली करना. अगर नार्थ ब्लॉक में काले धन की स्वदेश वापसी पर कम जुर्माना लगाने वाली योजना बनाने की समझ होती तो विदेशों में जमा काले धन की अच्छी खासी रकम वापस वसूल की जा सकती थी. 
 
नार्थ ब्लॉक के बाबू लोग रेलवे जैसे विकास-सर्जक क्षेत्रों का विरोध करेंगे लेकिन 7वें वेतन आयोग के सुझावों और लोगों को गरीब और चंदे पर निर्भर रखने वाली नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) जैसी योजनाओं की ओर सज्जनतापूर्ण निगाहों से देखेंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि बाबू लोग लाभांशों पर शून्य आयकर जैसी रियायतों को बजट में शामिल करने के लिए कड़ा संघर्ष करेंगे लेकिन उनके रसोइयों और बागबानों द्वारा पाई जाने वाली अल्प मासिक आय पर कर देने को लेकर चुप रहेंगे.
 
कोल इंडिया, एनटीपीसी और एनएमडीसी जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा संचित धन भंडार का उपयोग उत्पाद एवं रोजगार विस्तार के लिए किए जाना सुनिश्चित करने के बजाय औपनिवेशिक प्रवृत्ति वाले दिमाग उन्हें सरकार से अपने शेयर वापस खरीदने के लिए विवश करने के माध्यम से ऐसे अधिशेषों को घटाने के प्रति आकर्षित होंगे. ऐसी प्रतिगामी नीति के तहत इन सार्वजनिक उद्यमों के प्रबंधनों के भीतर अधिशेष उत्पन्न करने के लिए आवश्यक क्षमता का स्तर सुनिश्चित करने की बची-खुची इच्छा भी समाप्त हो जाएगी. लेकिन जिन अधिकारियों को पता है कि वे शीघ्र ही अन्य विभागों अथवा एजेंसियों में उच्चतर पदों पर नियुक्त किए जाएंगे, उन्हें ऐसी प्रतिगामी नीति के दुष्परिणामों की कोई फिक्र नहीं है. औपनिवेशिक मानसिकता में साधारण नागरिकों को कोई स्थान नहीं 
दिया जाता.
 
इसी वजह से यह जरूरी हो जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह सुनिश्चित करें कि 29 फरवरी को पेश किए जाने वाला बजट औपनिवेशिक शैली से मुक्त होने के साथ-साथ कम करों और नवाचारों को अधिकतम प्रोत्साहन देगा ताकि चिदंबरम द्वारा अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने के लिए लिए गए घातक फैसलों की क्षतिपूर्ति की जा सके.
    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)