दक्षिण भारत के पांच मुख्यमंत्रियों में से आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू शायद किसी भी राज्य के सबसे गतिशील और दृश्य राजनीतिक मुख्य कार्यकारी हैं. वह लगभग प्रत्येक माह नई दिल्ली जाते हैं और प्रधानमंत्री मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली से अपने राज्य के लिए विशेष राज्य का दर्जा और आर्थिक पैकेज पाने के प्रयास में लगे रहते हैं. राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद से चंद्रबाबू नायडू  23 बार राजधानी जा चुके हैं और वहां 27 दिन ठहरे हैं जो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा राजधानी में बिताए गए दिनों में से सबसे अधिक है. भारत और विदेशों में उनकी गतिशीलता को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने पदचिन्हों को दूर-दूर तक फैला रहे हैं और उन्हें इस पर गर्व है. जून 2014 मे मुख्यमंत्री का कार्यभार ग्रहण करने के बाद नायडू ने दृढ़तापूर्वक कहा था कि हमारे राज्य को उचित मार्केटिंग की जरूरत है और मैं अतीत में हैदराबाद के लिए यह काम कर चुका हूं. अब मैं यह काम आंध्रप्रदेश के लिए करूंगा. हर दो-तीन माह बाद मैं विदेशी देश का दौरा करूंगा. मुख्यमंत्री बनने के 20 माह के बाद भी आंध्रप्रदेश का प्रचार करने के उनके मिशन से राज्य को कोई विशेष फायदा मिलना अभी भी बाकी है. नायडू का कार्यालय हमेशा उनके लिए देश और विदेश में नए गंतव्यों की खोज करता रहता है ताकि वह वहां जाकर निवेश आकर्षित करने के लिए रोड शो कर सकें . वह अभी तक पांच देशों की यात्रा कर चुके हैं और वैश्विक निवेशकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को राज्य में निवेश करने के प्रति आश्वस्त करने के लिए 29 दिन बिता चुके हैं. 

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री की मौजूदा चिंताएं राज्य की वित्तीय स्थिति में आ रही तेज गिरावट से उत्पन्न हुई हैं. राज्य के विभाजन के बाद आंध्रप्रदेश के पहले बजट ने 2014-15 में 60 अरब के घाटे का खुलासा किया. दूसरे बजट में स्थिति और बदतर हो गई जब यह आंकड़ा 142.4 अरब तक पहुंच गया. आंध्रप्रदेश आज भी अपने पूंजीगत व्यय का 25 फीसदी खर्च पूरा नहीं कर सकता. लेकिन मुख्यमंत्री नायडू पर तब भी नई राजधानी अमरावती के निर्माण का जुनून सवार है. उन्होंने हैदराबाद को भारत के सबसे आकर्षक आईटी शहरों में एक बनाकर दुनिया भर में वैश्विक ख्याति अर्जित की थी. प्रौद्योगिकी के प्रति उनके प्रेम के बावजूद नायडू को राज्य चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा और परिणामस्वरूप एक दशक तक सत्ता से बाहर रहना पड़ा. 

चंद्रबाबू नायडू को विदेशी निवेशकों को लुभाने और आधुनिक आधारभूत संरचनाओं की योजनाएं बनाने के मोह को कुछ समय के लिए त्याग कर अपने राज्य के 5 करोड़ निवासियों के लिए बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. वह पिछले 19 महीनों से राज्य में नई परियोजनाएं शुरू करने के लिए विदेशी अथवा भारतीय कॉरपोरेट दिग्गजों के साथ मुलाकात करने में अधिक समय बिता रहे हैं जिससे मांग में कोई उल्लेखनीय वृद्धि देखने को नहीं मिली है. उदाहरण के लिए, नायडू दो बार सिंगापुर की यात्रा पर जा चुके हैं. नवंबर 2014 में वह पहली बार सिंगापुर गए और उस देश के अपशिष्ट जल-उपचार संयंत्रों का निरीक्षण करने में और आंध्रप्रदेश की नई राजधानी अमरावती के विकास लिए सिंगापुर मॉडल का अध्ययन करने में 3 दिन लगाए. सितंबर 2015 में वह एकबार फिर सिंगापुर गए और वहां के प्रधानमंत्री के साथ अमरावती के विकास के लिए विवरण पर चर्चा करने के साथ ही उन्हें कुछ सप्ताह बाद राज्य में होने वाले उद्घाटन समारोह के लिए भी आमंत्रित किया. 

जापान के निवेशकों को आकर्षित करने के लिए भी चंद्रबाबू नायडू दो बार जापान की यात्रा कर चुके हैं. उन्होंने सुमिटोमो के साथ चार महत्वपूर्ण अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए और इसुजू को आंध्रप्रदेश में निवेश करने में दिलचस्पी दिखाने के लिए राजी करने का प्रयास किया. यह सच है कि नायडू अपने प्रयासों को लेकर बेहद गंभीर हैं लेकिन वह अभी तक अपनी विदेशी यात्राओं के परिणामों को सार्वजनिक नहीं कर पाए हैं. यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेता और विपक्ष भी उनकी इस कार्यशैली पर सवाल खड़े करने के साथ-साथ राज्य के सूखाग्रस्त क्षेत्रों की उपेक्षा करने के लिए उनकी कड़ी निंदा कर रहे हैं. 

यहां तक कि मोदी को प्रभावित करने की उनकी क्षमता पर भी सवाल खड़े किए जाने लगे हैं. दो दशक पहले नायडू के राजनीतिक प्रभाव का बोलबाला था और 1996 में एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. वह अपने राज्य के लिए केंद्र से कोई भी रियायत प्राप्त कर लेते थे, लेकिन इस बार वह अपने राज्य के लिए कोई विशेष आर्थिक पैकेज अथवा दर्जा प्राप्त नहीं कर सके हैं. नायडू दो सप्ताह पहले आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात करने नई दिल्ली गए थे, यह मांग वह दो बार पहले भी कर चुके हैं. चाहे चिकित्सा उपकरण निर्माताओं के साथ बैठकें आयोजित करनी हो या अमरावती का नींव पत्थर रखने के समारोह में प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और अन्य केंद्रीय मंत्रियों को आमंत्रित करना हो, नायडू को राजधानी में पैर रखने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए. नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और जयललिता जैसे   गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को कभी भी दिल्ली में मोदी के मंत्रियों के साथ मुलाकात करते हुए नहीं देखा गया है. 

राज्य की राजनीति से नायडू की लगातार अनुपस्थिति को लेकर आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कई टीडीपी नेता नाखुश हैं. कुछ नेता पार्टी भी छोड़ रहे हैं. ग्रेटर हैदराबाद के नगर निगम चुनावों में हार का मुंह देखने के बाद टीडीपी को विधायकों के गमन का सामना करना पड़ रहा है और तेलंगाना में तो इसे अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. टीडीपी ने 2014 में 16 विधानसभा सीटें जीती थीं. आधे से ज्यादा विधायक पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. अगर नायडू की पार्टी तेलंगाना में विलुप्त होने के कगार पर है, तो आंध्रप्रदेश में भी इसे बड़े पैमाने पर मोहभंग का सामना करना पड़ रहा है. विधायकों सहित कई पार्टी नेता लंबे समय से मुख्यमंत्री से नहीं मिल पाए हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की अनेदखी करने और शहरी विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की नायडू की रणनीति ने उनके शत्रु केसीआर को आंध्रपदेश में टीडीपी के खिलाफ राजनीतिक माहौल तैयार करने का उचित कारण दिया है. नायडू का भविष्य उनके राज्य को व्यवहार्य, स्थिर और एक स्वस्थ अस्तित्व बनाने में निहित है. विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए राज्य के खर्चे पर महंगी विदेश यात्राएं करके वह स्थानीय राजनीतिक बाजार में अपनी हिस्सेदारी को संकुचित कर रहे हैं. 

( ये लेखक के निजी विचार हैं )