एक जांच के रूप में विज्ञान ने मुझे हमेशा से हैरान किया है. स्कूली शिक्षा के दौरान विज्ञान के विषय के साथ अपनी प्रारंभिक भिड़त में भौतिक विज्ञान मेरे लिए शून्य एक की तरह था और रसायन शास्त्र में मेरी दिलचस्पी केवल प्रयोगशाला तक सीमित थी. विज्ञान के बजाय तर्क और धारणाओं पर आधारित गणित का विषय मेरे लिए अपेक्षाकृत सरल था. अभी कुछ दिन पहले मैं होटल के कमरे में अकेले बैठा टीवी पर अलग-अलग चैनलों पर नजर दौड़ा रहा था. सहसा ही विज्ञान ने अतीत, वर्तमान और कई संभावित भविष्यों के मिश्रण से प्राप्त अमृत का एक दिलचस्प आयाम हासिल कर लिया. एक स्तब्ध मौन में साहित्य के एक मुहावरे ने ग्रहों के संगीत के रूप में करामाती वास्तविकता का रूप ले लिया. मुझे एक अरब प्रकाश वर्ष दूर दो अंधकारमय सुराखों के टकराने की अलौकिक और बार-बार मंडराने वाली धुन सुनाई दी. आइंस्टीन और पायथागोरस के बीच बौद्धिक स्तर पर मुलाकात हुई थी. प्राचीन ग्रीस के रहस्यवादी गणितज्ञ ने यह प्रस्ताव रखा था कि सभी खगोलीय पिंडों को एक लय के साथ गतिमान होना चाहिए और प्रत्येक पिंंड की मनुष्य के कान को सुनाई न देने वाली अनोखी गुंजन होनी चाहिए. यह था ग्रहों का संगीत, एक ऐसी परिकल्पना जिसने कवियों पर चुंबकीय जादू कर दिया था. 

समकालीन वैज्ञानिकों की दुस्साहसिक उत्कृष्टता और पीढ़ियों की विलक्षण प्रतिभा का दर्शक रह चुके मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संगीत एक ऐसी कड़ी की तरह था जो अस्तित्व, समय और स्थान के भाव को एक नया और क्रांतिकारी अर्थ देने की पेशकश करता था. जीवन और कुछ नहीं बल्कि आकस्मिक रूप से शून्यता में समाप्त होने वाली समय की एक यात्रा है. जीवन समापन के बाद जो कुछ भी होता है वो एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसका उत्तर मनुष्य के बौद्धिक प्रयासों की अनिश्चितताओं में नहीं बल्कि केवल धर्म और सिद्धांतों की निश्चितताओं में उपलब्ध है. लेकिन इस प्रयास ने अब सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्मांड में गुरुत्वाकर्षण के अतिरिक्त एक ध्वनि भी मौजूद है. अन्य शब्दों में कहें तो मानव अनुभव के तत्व दूसरी दुनिया में भी कहीं न कहीं मौजूद हैं. ध्वनि अब केवल मानव इंद्रियों में से एक का कार्य भर ही नहीं बल्कि अनन्त अस्तित्व भी है. मैं यहा लीगो टीम के सदस्य और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सबोलक्ज मार्का के कथन को दोहराना चाहूंगा, ‘मेरा मानना है कि यह लंबे समय तक भौतिक विज्ञान की बड़ी सफलताओं में से एक होगा. नक्षत्र-विद्या में बाकी सब कुछ एक आंख की तरह है. आखिरकार, नक्षत्र विद्या के कान निकल आए हैं, हमारे पास पहले कभी कान नहीं थे.’ 

बेहद वाक्पटुता के साथ वर्णित किए गए गंभीर फर्क के बारे में सोचिए. दृष्टि मानव आंख से उभर कर आती है और मानवीय क्षमता के अनुसार दूरी तय करती है. ध्वनि कहीं और से उत्पन्न होती है और अब हम ये जानते हैं कि ध्वनि एक अरब प्रकाश वर्ष दूर से निकल कर भी आ सकती है. आंख व्यक्तिपरक है, कान वस्तुपरक है. ऐसा प्रतीत होता है कि हम एकबार फिर ज्ञान की मौजूदा सीमाओं से आगे निकलने की कगार पर हैं. एक खोज के घटनाचक्र का अधि-मूल्यांकन करना सरल है. वैज्ञानिक हमेशा से अतिश्योक्ति के खिलाफ चेतावनी देते आए हैं. वे हर कदम पर कष्ट सहते हैं. ‘श्रमसाध्य’ स्पष्ट रूप से एक ऐसा शब्द है जो प्रयोगशाला या वेधशाला से उत्पन्न हुआ है. एक जानकारी को तथ्य में परिवर्तित करने में पूरा जीवन गुजर जाता है और तथ्य को भी केवल अस्थायी तौर पर मानयता दी जाती है. 

एक खोज को कम करके आंकना भी समान रूप से सरल है. हो सकता है कि मैं अपने उत्साह में अति-प्रतिक्रिया दे रहा हूं लेकिन मैं आशावाद के पक्ष से गलती करने को प्राथमिकता देता हूं. एक खोज की उत्तेजना निश्चित रूप से अपने साथ अनगिनत सवालों का समूह लेकर आती है. क्या यह ब्रह्मांड अनियमित दुर्घटनाओं की श्रृंखला के बजाय एक व्यवस्थित एवं सुविचारित योजना है? क्या इस पृथ्वी की समय-सीमा से परे भी कोई अस्तित्व है? हमारी कल्पना हमेशा से समय-पलटाव के वायदे से प्रेरित रही है. जब अलबर्ट आइंस्टीन अपने विचारों को आकार दे रहे थे, तब एचजी वेल्स टाईम मशीन के बारे में लिख रहे थे. भारतीय दर्शनशास्त्र को हमेशा से एक भ्रम के रूप में खारिज किया जाता रहा है. लीगो के वैज्ञानिकों ने समय की अनियमिता और उतार-चढ़ावों को रिकॉर्ड किया है. समय के इतने पहलू हैं जिनकी हमारा मस्तिष्क कल्पना भी नहीं कर सकता. 

क्या खगोल विद्या का उल्लेख करना उत्कृष्टता से हास्यापद तक का पतन होगा? ज्योतिष विद्या में विज्ञान जैसी दृढ़ता और कठोरता तो नहीं है लेकिन हमारी धारणाओं पर इसकी मजबूत पकड़ निश्चित रूप से हमारी सामूहिक असुरक्षा का प्रमाण है. मीडिया में दैनिक अथवा साप्ताहिक भविष्यवाणियां जाहिर तौर पर बकवास हैं लेकिन विभिन्न संस्कृतियों में व्यक्ति की कुंडली के प्रति श्रद्धा अतीत में खो चुकी एक कहानी की ओर संकेत करता है.