बेंगलुरु में सड़क दुर्घटना के बाद क्रुद्ध भीड़ द्वारा तंजानिया मूल की महिला को निशाना बनाए जाने को मीडिया के प्रभावी वर्ग द्वारा नस्लीय भेदभाव के मामले के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. गौरतलब है इस सड़क दुर्घटना में 35 वर्षीय स्थानीय निवासी की सूडानी मूल के व्यक्ति द्वारा चलाई जा रही कार की चपेट में आकर मौत हो गई थी. यह घटना नस्लीय अपराध के बजाय रोडरेज का मामला अधिक प्रतीत होती है और वास्तव में शर्मनाक और सार्वभौमिक निंदा के योग्य है. लेकिन सिर्फ एक  घटना से निष्कर्ष निकालना न केवल खतरनाक है बल्कि हालातों पर चर्चा करने का तर्कहीन तरीका भी है. 
 
जी हां, भारत में सहिष्णुता की समस्या है. अत्याधिक रूप से अधिभारित सांप्रदायिक माहौल में सामाजिक तनावों और द्वेषपूर्ण अपराधों के लिए जाति व्यवस्था के साथ-साथ धर्म भी प्रमुख कारण बन गया है. सदियों पुराने जातीय भेदभाव के कारण हिंदू समाज में हमेशा से दलितों की उपेक्षा की गई और इसका शोषण करने के साथ-साथ समाज के एक तुच्छ वर्ग के रूप में देखा गया. आधुनिक भारत में, विशेष रूप से राजनीति के मंडलीकरण के बाद, जाति कारक हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक स्पष्ट लक्षण में तब्दील हो गया है. जब आपसे आपके संबंधित समुदाय के आधार पर वोट मांगे जाएं तो दूसरों के लिए असहिष्णुता एक स्वाभाविक परिणाम है. 
 
जाति और धर्म के अतिरिक्त क्षेत्रवाद भी समान रूप से विषैला है. देश के विभिन्न भागों में कई छोटे राजनीतिक दल उभर कर सामने आए हैं और क्षेत्रीय हितों का समर्थन करते आ रहे हैं. जाहिर है ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियां और विशेष रूप से कांग्रेस भारतीय नक्शे पर अपने पदचिन्हों को मजबूत करने की अपनी दौड़ में क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ थे. ताजा घटना बेंगलुरु की है जिसे हमेशा मुंबई, कोलकता और दिल्ली जैसा महानगरीय शहर समझा गया है. हमारे कुछ शहरों के नाम बदलने पर कई लोगों ने सवाल खड़ा किया है और महानगरीय केंद्रों के रूप में इन शहरों के विकास में गतिरोध की प्रक्रिया के रूप में इसका उल्लेख किया है. प्राचीन नामों अथवा स्थानीय लोगों के अनुमान अनुसार इन शहरों के वास्तविक नामों पर वापिस लौटकर स्थानीय प्राधिकरण ने केवल एक विशेष दर्शक-दीर्घा को खुश किया है.  
 
ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि बॉम्बे को ‘मुंबई’ का नाम देने के बाद वो शहर और अधिक खुशहाल हो गया है. यह वाद समान रूप से कोलकाता और बेंगलुरु पर भी लागू है. वास्तव में, पारंपरिक नाम दिए जाने से इन शहरों की महानगरीय छवि को नुक्सान पहुंचा है. शुक्र है किसी ने यह सुझाव नहीं दिया कि दिल्ली को हस्तिनापुर या इंद्रप्रस्थ कहा जाना चाहिए. शिवसेना जैसी पार्टियों का वजूद केवल उनकी इस जिद पर टिका हुआ है कि मुंबई में रहने वाले हर समुदाय को राज्य में महाराष्ट्रवासियों की तुलना में दोयम दर्जे का समझा जाना चाहिए. 1960 के दशक में शिवसेना की स्थापना के शीघ्र बाद शिवसैनिकों ने पहले दक्षिण भारतीयों और बाद में गुजरातियों को निशाना बनाया. आजकल उनके निशाने पर बिहारी हैं.
 
क्षेत्रीय अंधराष्ट्रीय ताकतों सहित बेशुमार कारणों की वजह से आज मुंबई वैसा शहर नहीं रह गया है जैसा पहले हुआ करता था. इसने पतन के लक्षण दिखाए हैं और विश्व के शीर्ष शहरों में इसका स्थान भी जाहिर तौर पर प्रभावित हुआ है. हमारे देशवासियों के एक वर्ग का मानना है कि भारत एक देश और एक राष्ट्र है. इस धारणा का समर्थन अथवा विरोध देने के लिए कई तर्क हो सकते हैं. पंजाब के एक शीर्ष राजनीतिज्ञ ने राज्य में उग्रवाद के चरम के दौरान मुझे बताया था कि भारत में विभिन्न धाराओं के लोग हैं जिनमें समानता बहुत कम है. उसने अवलोकन किया कि देश के सबसे अधिक उत्पाद राज्य पंजाब को उपनिवेश बना दिया गया था. उसने कहा कि उसके और ओडिशा या तमिलनाडु के किसी व्यक्ति के बीच किसी भी तरह की कोई समानता नहीं है फिर चाहे बात धार्मिक अनुष्ठानों की हो, खान-पान की आदतों की या पहनावे की. राज्य के 13 सांसदों की राय का कोई महत्व नहीं था क्योंकि उत्तर प्रदेश से संबंधित 85 सांसद 13 सांसदों के निर्णय को अस्वीकार करते हुए पंजाब में होने वाले घटनाक्रमों पर अंतिम निर्णय ले सकते थे.
 
सुनने में भले ही यह आधारहीन तर्क लग सकता है लेकिन यह तर्क लोगों की राय को प्रतिबिंबित करता है.  भेदभाव की भावना केवल भारत तक ही सीमित नहीं है. दुनिया भर में द्वेषभावना से प्रेरित अपराधों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. अफ्रीकी छात्रों को वापस जाकर अपने देशों के इतिहास पर नजर दौड़ानी चाहिए और पता लगाना चाहिए कि 1960 और 70 के दशक में वहां भारतीयों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था. युगांडा, केन्या और तंजानिया ने भारतीयों को देश छोड़ने पर मजबूर किया था और ऐसे कई विस्थापित व्यक्ति आज इंगलैंड व अन्य पश्चिमी देशों में बसे हुए हैं. 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर जा रहे पत्रकारों को अकेले होटल से बाहर न जाने की सलाह दी गई थी क्योंकि उनके साथ सड़कों पर लूट-मार की जा सकती थी.