गणतंत्र दिवस के जश्न के बीच शरद पवार और प्रकाश सिंह बादल के स्वास्थ्य से संबंधित अफवाहें समूचे राष्ट्र के लिए चितां का विषय बन गई जो हमारे समय के दो अग्रणी राजनीतिक नेता हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री इस देश के सबसे वरिष्ठ मुख्यमंत्री हैं और वह 1970 में सबसे पहले पंजाब राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. शरद पवार ने भी 1978 में इंदिरा गांधी को मात देते हुए और वसंतदादा पाटिल की अध्यक्षता वाले कांग्रेस(एस) और कांग्रेस(आई) मंत्रालय को गिराकर पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया था. उस समय पवार के मित्र एवं मार्गदर्शक यशवंत राय चवण ने तत्कालीन सरकार गिराने की योजना को अंतिम रूप देने में उनकी सहायता की थी.
 
दोनों नेता कई बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में इन दोनों नेताओं के उनके संबंधित राज्यों में राजनीतिक कद की बराबरी करना किसी अन्य राजनीतिज्ञ के लिए लगभग नामुमकिन प्रतीत होता है. शरद पवार भले ही विपक्ष में हों लेकिन तब भी उनहें राज्य के लोगों द्वारा आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. प्रधानमंत्री बनने की उनकी अधूरी महत्वाकांक्षा उनकी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है और उनकी राजनीतिक धूर्तता और निपुणता ने इतने वर्षों से उनके विरोधियों को उनसे पर्याप्त दूरी बना कर रखने के लिए विवश कर दिया है.
 
इसमें कोई दोराय नहीं कि पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल राज्य के सबसे कद्दावर नेता हैं. प्रकाश सिंह बादल ने गुरचरण सिंह टोहड़ा, जगदेव सिंह तलवंडी और सुरजीत सिंह बरनाला जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञों को मात देते हुए शीर्ष पद के लिए मार्ग प्रशस्त किया. सिख याजक-वर्ग प्रकाश सिंह बादल का सम्मान करता है और वह पंजाब सरकार के मुखिया ही नहीं हैं बल्कि उन्हें एक सिख नायक के रूप में भी देखा जाता है. वर्ष 2012 में सुखबीर सिंह बादल द्वारा आक्रामक चुनावी अभियान शुरू करने के अलावा प्रकाश सिंह बादल को अकाली दल के अगुवा के रूप में प्रस्तुत करना ही अकालियों द्वारा सत्ता बरकरार रखने का प्रमुख कारण था.
 
कांग्रेस बादलों के वर्चस्व का मुकाबला नहीं कर पाई और पार्टी के अंदरूनी मतभेदों और कांग्रेसी आलाकमान के अनुचित हस्तक्षेपों ने अंतिम परिणामों पर अपनी छाप छोड़ी.  ऐसे मुख्यमंत्री बहुत कम हुए हैं जो इस देश में लंबे समय तक सत्ता में रहे हैं. पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु, महाराष्ट्र में वीपी नायक, राजस्थान में मोहन लाल सुखादिया, गुजरात में नरेंद्र मोदी, दिल्ली में शीला दीक्षित, तमिलनाडु में एम करुणानिधि और जयललिता, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी, केरल में एक एंटनी, आंध्रप्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह कुछ ऐसे प्रतिष्ठित राजनेताओं में से हैं जो अपने-अपने राज्यों में सर्वोच्च पद पर लंबे समय तक आसित रहे हैं. 
 
वास्तव में, यदि सक्रिय राजनेताओं में वरिष्ठता को देखा जाए तो वीरभद्र सिंह सबसे वरिष्ठ मुख्यमंत्री हैं जिन्हें 1962 में निचल सदन के लिए निर्वाचित किया गया था. इनके बाद डॉ. करन सिंह का नाम आता है जो 1967 में लोकसभा में अपनी पहली जीत के बाद इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में शामिल हुए थे. करण सिंह और वीरभद्र सिंह मात्र दो ऐसे सक्रिय नेता हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद प्रत्येक प्रधानमंत्री के साथ काम किया है. पूर्व प्रधानमंत्री इन दोनों से वरिष्ठ हैं लेकिन खराब स्वास्थ्य के चलते पिछले कई वर्षों से राजनीतिक क्षेत्र से बाहर हैं.  राजनीतिज्ञों के मौजूदा समूह में से प्रणब मुखर्जी और लालकृष्ण अडवाणी को अग्रज राजनेता माना जाता है. वे राजनेता जरूर हैं लेकिन निश्चित रूप से सबसे वरिष्ठ नेता नहीं हैं. प्रणब दा ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री अजॉय कुमार मुखर्जी के नेतृत्व वाली बांगला कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में 1969 में राज्यसभा में प्रवेश किया था जबकि अडवाणी इसके 6 माह बाद उच्च सदन में शामिल हुए. किसी के भी मन में इस बात के प्रति जरा भी संदेह नहीं है कि इन दोनों दिग्गजों ने देश और उनकी संबंधित पार्टियों के लिए उल्लेखनीय कार्य किए हैं और उनके योगदान को किसी भी कीमत पर भुलाया नहीं जा सकता. यह दोनों दिग्गज अभी भी कई वर्ष तक भारतीय राजनीति और इस देश को अपनी बहुमुल्य सेवाएं दे सकते हैं. 
 
गत सप्ताह उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा के दूसरे खंड का विमोचन किया. इस मौके पर लालकृष्ण अडवाणी और करन सिंह की उपस्थिति देखना एक सुखद अनुभव था. अडवाणी और मुखर्जी दोनों को उनके संबंधित दलों द्वारा एक समय पर प्रधानमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जाता था, लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था और यह दोनों प्रधानमंत्री पद से वंचित रहे. करन सिंह को भारत के राष्ट्रपति के लिए सबसे उचित चयन समझा जाता था लेकिन समय बीतने के साथ उनकी अपनी ही पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया. एक समय उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए करन सिंह के बजाय प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया जबकि उस समय करन सिंह आसानी से यह सम्मान अर्जित कर सकते थे. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि करन सिंह उच्च श्रेणी के विद्वान हैं और भारत के सांस्कृतिक सम्राट हैं. ऐसे बहुत कम लोग हैं जो करन सिंह के हिंदू ग्रंथों और उपनिशादों के ज्ञान की बराबरी कर सक ते हों.
 
लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रपति चुनने के साथ वर्ष 2017 इस देश के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण और यादगार वर्ष होने वाला है. प्रणब मुखर्जी के नाम पर दूसरे कार्यकाल के लिए विचार किया जा सकता है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति की उपलब्धि किसी ने प्राप्त नहीं की है. भाजपा की ओर से अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी उम्मीवार के रूप में सामने आ सकते हैं. अगर राजनीतिक क्षेत्र से स्वीकार्य नामों की अल्पसूची तैयार की जाए तो करन सिंह और शरद पवार का नाम सबसे ऊपर रहेगा. ये सभी इस राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं.