भारतीय नीति-निर्माताओं को उनकी दृढ़ता व धैर्य के लिए नहीं जाना जाता, अन्यथा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हजारों गोपनीय राजनयिक ई-मेलों को सार्वजनिक करके अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान के पैरों तले जमीन खिसकाने वाले विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को शरण देने की पेशकश दी होती. अगर इस तरह के संचारों का अमेरिकी हितों और वैश्विक सुरक्षा पर घातक असर पड़ता तो ऐसी कोई क्षति ‘अदृश्य’ प्रतीत होती है. सच्चाई ये है कि लोकतांत्रिक समाजों में अधिक से अधिक पारदर्शिता सुरक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक हितों को भी मजबूत बनाती है. 
 
यहां तक कि इस स्तंभकार जैसा अप्रासंगिक व्यक्ति भी एक परिचित को सियाचिन पर दी गई राय के कारण केबल ट्राम में चर्चाओं का विषय बन चुका है. यह परिचित मियामी विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर थे जो मेरे साथ केबल ट्राम में उपर्युक्त चर्चा करने के समय नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के प्रभारी थे. उस मुलाकात में यह विचार अभिव्यक्त किया गया था कि अगर मनमोहन सिंह सियाचिन ग्लेशियर पर से सैन्य नियंत्रण हटा लेते हैं तो उन्हें निकटतम गली के खंभे से लटका दिया जाना चाहिए. जाहिर था कि दशकों से भारतीय हितों की कीमत पर पाकिस्तानी सेना के हितों को आगे बढ़ाने वाला राज्य विभाग मेरे इस विचार के साथ कतई सहमत नहीं था. यह जरूर कहा जाना चाहिए कि जूलियन असांजे ने राजनयिक बातचीत के छल-कपट का खुलासा करके दुनिया पर एहसान किया है. अमेरिकी राजनयिकों के साथ गुप्त बातचीत के खुलासों से नीति-निर्माताओं की विभिन्न मुद्दों पर असली राय का पता चलता है. 
 
केवल जूलियन असांजे ही नहीं, इस देश को एडवर्ड स्नोडेन को भी शरण देनी चाहिए थी. ऐसा करके भारत न केवल यह दिखा सकता था कि वह वैश्विक महाशक्तियों के दबावों से स्वतंत्र है बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के साथ न्याय भी कर सकता था जो अपने कार्यों में व्यक्तिगत लाभ के बजाय पूरी तरह आदर्शवाद से प्रेरित है. एडवर्ड स्नोडेन को शरण देकर भारत को बाहरी एजेंसियों द्वारा अंदरूनी संचारों पर नजर रखने की शैली का पूरा ज्ञान मिल सकता था. हम आशा करते हैं कि ऐसा समय आएगा जब भारत सरकार दूरदराज राष्ट्रों की कृपा प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने के बजाय एक स्वतंत्र महाशक्ति की तरह कार्य कर पाएगी. 
 
हालांकि, यह अकेला भारत ही नहीं है जो अभी तक जूलियन असांजे के मामले में कठघरे में खड़ा है. स्वीडन, इंग्लैंड और अमेरिका की भूमिका पर भी सवालिया निशान खड़े किए जा रहे हैं. क्या यह मात्र संयोग है कि वाशिंगटन में ‘राज्य का शत्रु’ बनने के शीघ्र बाद ही स्वीडन में विकिलीक्स के संस्थापक के खिलाफ छेड़छोड़ के आरोप लगाए गए? छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाले दोनों शिकायतकर्ताओं की शिकायत के आधार पर जूलियन के खिलाफ पहले ही कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह कल्पना करना कठिन है कि स्वस्थ तंदरुस्त दिखाई देने वाले व्यक्ति दुर्बल शारीरिक आकार वाले जूलियन की अनष्टि भाव-भंगिमाओं का प्रतिरोध करने में असमर्थ थे. 
 
लंदन में इक्वॉडोर के दूतावास में एक कमरे में जूलियन असांजे को कैद करने में स्वीडन की भूमिका से स्वीडिश अधिकारियों ने दिखा दिया है कि उनके फैसले काफी हद तक वाशिंगटन के दिशा-निर्देशों द्वारा संचालित हैं. इंग्लैंड के मामले में यह किसी से छिपा नहीं है कि वो अमेरिका का चापलूस है, इसलिए यह समझा जा सकता है कि दूसरों को असहमतों एवं असंतुष्टों के मानवाधिकारों पर उपदेश देने वाला देश खुद ऐसे घृणास्पद ढंग से पेश आएगा कि उसने असांजे को गिरफ्तार किए बिना उसे दूतावास के बाहर चिकित्सा उपचार की अनुमति तक नहीं दी. संयुक्त राष्ट्र निकाय ने स्वतंत्रता के दुर्लभ प्रदर्शन का परिचय देते हुए असांजे की हिरासत को असमर्थनीय पाया है और उसे रिहा किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया है लेकिन वैश्विक महाशक्तियों की चापलूसी करने वाले राष्ट्रों में दयाभाव और शर्म की भावनाएं ढूंढ़े नहीं मिलतीं.  
 
बे्रडले मेनिंग, जूलियन असांजे और एडवर्ड स्नोडेन के साथ किए गए व्यवहार के बाद अमेरिका किस मुंह से मानवाधिकारों की उल्लंघना के लिए अन्य देशों की निंदा कर सकता है? ओबामा प्रशासन में कुछ लोग विशेष रूप से भारत को निशाना बना रहे हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत अभी भी एक संपूर्ण लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है लेकिन राष्ट्रपति ओबामा द्वारा उनके दौरे के दौरान अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भाषण देना और उसके बाद सऊदी अरब जाकर उस देश में महिलाओं और गैर-वहाबियों के साथ हो रहे शर्मनाक व्यवहार पर चुप्पी साध लेना पाखंड की जीती-जागती मिसाल है. 
 
जूलियन असांजे अपनी स्वतंत्रता के हकदार हैं. यह आदमी आधिकारिक छल के लिए एक स्वागतयोग्य सुधारक रहा है और यह कैनबरा के लिए शर्म की बात है कि उसका अपना देश आॅस्ट्रेलियाई नागरिक के साथ किए जा रहे अन्याय का सामना करने की स्थिति में भय से कांप उठता है. अंग्रेज राष्ट्रों के लिए 21वीं सदी में अपनी पहचान और आदर्शों पर दावा करने का श्रेष्ठ तरीका है कि लंदन और वाशिंगटन जूलियन असांजे को उसकी आजादी और उन लोगों को क्रोधित करने का उसका अधिकार वापस दें, जो इन राष्ट्रों के साथ-साथ अन्य राष्ट्रों में अपने राष्ट्र के हितों की   कीमत पर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं. 
    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)