हमें हमेशा से यह बताया गया है कि इस दुनिया में अचंभों की कोई कमी नहीं है और न होगी, लेकिन हम शायद ऐसा अचंभा देख रहे हैं जो इतना निराला है कि शब्दों में भी बयान नहीं किया जा सकता. एक आत्म-स्वीकृति समाजवादी अमेरिका के व्हाइट हाउस में प्रवेश की होड़ में एक विश्वसनीय प्रत्याशी बन कर उभरा है. सफेद बालों वाले इस शख्स का नाम है बर्नी सेंडर्स, जो अपने आनंदित दर्शकों को गर्व के साथ बताते हैं कि उनकी उम्मीदवारी क्रांति की शुरुआत का प्रतीक है.  बहादुर नागरिकों और मुक्त पूंजीवादियों के देश में समाजवादी और क्रांति जैसे शब्दों का गूंजना हमें सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर अमेरिका में ये सब क्या हो रहा है. इस प्रश्न का जवाब ढूंढ़ना कठिन नहीं है.
 
अमेरिकी युवा एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं और महज 1 प्रतिशत अभिजात वर्ग की ओर प्रवृत्त वित्तीय प्रणाली से पूरी तरह ऊब चुके हैं.  अगर आज से एक दशक पहले अमेरिका में कोई भी बदनसीब राजनीतिज्ञ समाजवाद नाम की खतरनाक वैचारिक वायरस से संक्रमित होने का दावा करता तो उसे शायद राजनीतिक रूप से पागल करार दे दिया जाता. ऐसा नहीं है कि दुनिया की प्रमुख महाशक्ति में कभी वाम दल का अस्तित्व नहीं था, लेकिन उसने कभी अपनी सीमाओं को पार नहीं किया. जब कभी उन्होंने राष्ट्रीय होड़ में शामिल होने के बारे में सोचा भी तो उनके पक्ष में कभी भी 2 प्रतिशत से अधिक मतदान नहीं हुआ. 20वीं सदी के साथ-साथ अमेरिकी वामपंथी भी लुप्त होते चले गए, क्योंकि व्यावहारिक सुधारों को प्रेरित करने और उनके द्वारा लक्षित उत्पादों को सुधारने के साथ उन्होंने आंशिक रूप से अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया था. उनकी सफलता न ही उन्हें अप्रासंगिक बना दिया था. वॉलस्ट्रीट के बड़े दलाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्वामी बने रहे और अपने पूंजीवाद को अभिमान के साथ पुनर्परिभाषित करते रहे.  उनका यह तरीका कारगर सिद्ध हुआ.
 
मतदाताओं ने विशाल बहुमत के साथ इस धारणा पर यकीन कर लिया कि पूंजीवाद और सत्ता के मजबूत गठबंधन को पराजित करना लगभग नामुमकिन है और उनके इस भरोसे के लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि अमेरिकी सत्तारूढ़ सरकार पूंजीवादियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी थी. इस गठजोड़ ने अमेरिका को इतिहास में सबसे अमीर देश बना दिया था और साधारण नागरिकों की आमदनी में वृद्धि के साथ उनकी जीवनशैली में सुधार आया था और उसके बाद अमेरिकी दक्षिणपंथी अपनी सफलता के खुद शिकार बन गए. इस सदी के पहले दशक में हुआ वित्तीय पतन निश्चित रूप से एक निर्णायक मोड़ था. वित्तीय पतन का कारण ढूंढ़ निकाला गया और यह था वॉलस्ट्रीट का अत्यधिक लोभ, आय में विशाल असमानता स्वार्थी ऊंचाइयों तक पहुंच गई थी. अमेरिका ने वॉलस्ट्रीट को जिम्मेदार ठहराने के बजाय इसका बचाव किया.  हालांकि, इसकी तत्काल प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली लेकिन समय बीतने के साथ किताबों और फिल्मों में स्पष्टता के साथ दिखाया गया कि वॉलस्ट्रीट एक सदी तक अमेरिकी नायक बने रहने के बाद खलनायक बन गया था. विख्यात लेखक माइकल लुइस की पुस्तक पर आधारित ‘दि बिग शार्ट’ नामक फिल्म को आजकल अमेरिका में खूब देखा जा रहा है. लुईस ने अपनी पुस्तक में बैंकरों की अनैतिकता को जमकर कोसा है और उनकी संदिग्ध कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.  एक लोकप्रिय संस्कृति में सहजीवी शब्द का अर्थ बदलना आसान नहीं है. अमेरिका में सार्वजनिक बहस में ‘समाजवाद’ शब्द को कब से स्वीकार किया जाने लगा. इस सवाल का जवाब मुझे सीएनएन पर चल रही बहस से मिला.
 
अमेरिकी न्यूज चैनलों पर होने वाली बहस कठिन जरूर होती है लेकिन सौभाग्य से इसमें प्रतिभागियों को एक-दूसरे पर चिल्लाने की अनुमति नहीं दी जाती. नकली कुश्ती की तरह टेलीविजन प्रतिभागियों के झगड़े को महज पर्दे तक सीमित रखता है. एक चतुर कमेंटेटर ने समझाया कि ‘समाजवाद’ के राजनीतिक शिखर पर उभरने का प्रमुख कारण अमेरिका का सबसे अधिक दक्षिणपंथी समाचार चैनल ‘फॉक्स न्यूज’ है. बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद से फॉक्स न्यूज द्वारा ओबामा को कलंकित करने की उम्मीद में उन्हें एक समाजवादी के रूप में वर्णित किया जा रहा है. लेकिन, अमेरिकी दर्शकों को ओबामा की कार्यशैली पसंद थी और उन्हें ओबामा पर समाजवादी का लेबल चिपकाए जाने से कोई परेशानी नहीं थी.  लेकिन एक दिलचस्प मोड़ में, सैंडर्स और डोनाल्ड ट्रंप का अप्रत्याशित चढ़ाव इसलिए देखने को मिला है क्योंकि इन दोनों राजनीतिज्ञों ने मध्यम एवं गरीब वर्गों को ऐसे संस्थापन के खिलाफ भड़काया है जो पारंपरिक शक्तियों (विशेष रूप से धन) के प्रति अत्यंत कृतज्ञ है. ट्रंप अपने विरोधियों पर चिल्लाते हैं जबकि सैंडर्स मृदुभाषी हैं, ट्रंप जातिवाद में यकीन करते हैं जबकि सैंडर्स समावेशी हैं. लेकिन यह दोनों ऐसी यथास्थिति के अंत की मांग करते हैं जिसमें केवल पूंजीवादियों की मांगें पूरी की जाती हैं.  कोई नहीं जानता कि एक पखवाड़े के बाद क्या तस्वीर सामने आएगी लेकिन एक बात तो तय है कि अमेरिकी लोगों के नजरिए में निसंदेह बदलाव आया है, लेकिन क्या अमेरिकी राजनीति में भी बदलाव देखने को मिलेगा. इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में छुपा है.