नई दिल्ली. राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा एक दर्जन से अधिक संदिग्ध आतंकवादियों को आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के साथ उनकी संबद्धता के कारण हिरासत में लिया गया. गौरतलब है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत में आतंकी हमलों की खुफिया सूचना के आधार पर इन संदिग्ध आतंकवादियों को हिरासत में लिया गया. इसमें कोई संदेह नहीं कि कुख्यात इस्लामी आतंकवादी संगठन आईएसआईएस अब भारत में भी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देना चाहता है. पाक-आईएसआई प्रायोजित सीमापार आतंकवाद के अतिरिक्त आईएसआईएस से राष्ट्रीय सुरक्षा को उत्पन्न खतरे में वृद्धि ने नरेंद्र मोदी सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं. राष्ट्रीय राजधानी को विशेष रूप से निरंतर निगरानी की आवश्यकता है.
 
‘युद्ध’ के एक नए साधन के रूप में आस्था पर आधारित आतंकवाद वास्तव में भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है. अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिम के खिलाफ एक नए प्रकार की वैश्विक लड़ाई को शुरू करने के लिए आईएसआईएस और अलकायदा-तालिबान की जोड़ी हाल के महीनों में उभर कर सामने आई है. वे दूसरे पक्ष की सेनाओं की ‘प्रछन्न हमलों’ से निपटने की क्षमता की परीक्षा ले रहे हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि इन आतंकी गुटों ने ‘विषम युद्ध’ की ऐसी रूप-रेखा को स्थापित किया है जिसमें ‘अदृश्य हमलावर’ प्रतिद्वंदी को अस्थिर करने के लिए सामरिक परिसंपत्तियों के साथ-साथ नागरिक आबादी को भी निशाना बनाते हैं. 
 
किसी भी देश की सेना ‘दृश्य’ शत्रु से भिड़ने की अभ्यस्त होती है. आतंकवाद से निपटने के लिए सेना को प्रशिक्षण, हथियार एवं उपकरण और परिचालन रणनीतियों की नई व्यवस्था के माध्यम से खुद को परिवर्तित करना होता है. भारत ने जम्मू-कश्मीर और विद्रोह-ग्रस्त पूर्वोत्तर भारत में सेवारत सैन्य इकाइयों को ये पुनर्विन्यास देकर इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है. चूंकि आतंकवाद के खिलाफ एक सशस्त्र कार्रवाई खुफिया जानकारी पर आधारित होती है, ‘जानकारी’ और सैन्य ‘कार्रवाई’ के बीच के अंतर को समाप्त करना ‘गुप्त हमलों’ की नई चुनौती का एक हिस्सा है. पठानकोट के ताजा उदाहरण ने हमारी खुफिया एजेंसियों की यह कार्य करने की क्षमता पर लोगों के भरोसे को बढ़ाया है.
 
दिल्ली और देश के अन्य स्थानों से गिरफ्तार किए गए संदिग्ध आतंकवादियों से की गई पूछताछ से ये खुलासा हुआ है कि भारत में आईएसआईएस के लिए नए सदस्य बनाने की योजना का संचालन इंडियन मुजाहिद्दीन के पूर्व नेताओं द्वारा किया गया था. उनके द्वारा एकत्रित किए गए कई संपर्कों को ‘लोन वूल्फ’ अर्थात अकेले भेड़िए के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था जिससे हमारी एजेंसियों के लिए काम करना और कठिन हो जाएगा. 
 
भारत का सुरक्षा प्रतिष्ठान इस तथ्य के प्रति जागरूक है कि पाक सेना और आईएसआई का गठबंधन कहीं न कहीं पाकिस्तान के असैन्य नेतृत्व के साथ व्यवहारकुशल संबंध बनाने में और अफगानिस्तान में क्षेत्रीय हितधारक के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्पष्ट सफलता का प्रत्युत्तर देने के लिए उत्सुक था. पाकिस्तान के अंदर इस्लामी कट्टरपंथियों के निरंतर हमलों के कारण पाकिस्तानी सेना को शर्मसार होना पड़ रहा है. मौजूदा घटनाक्रमों को देखते हुए संभव है कि पाकिस्तानी सेना भारत पर आतंकी हमलों की संख्या बढ़ाने पर विचार करे और बाद में सीमा-पार प्रायोजित आतंकी हमलों में ‘आईएसआईएस’ का हाथ होने की बात कहकर खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास करे. 
 
इसमें कोई शक नहीं कि आईएसआईएस-अलकायदा-तालिबान की तिकड़ी भारत की सुरक्षा के लिए खतरों को कई गुणा बढ़ा देती है. अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार विषम युद्ध को विस्तार देने की आईएसआईएस की सफलता ने भारत में कई युवाओं को प्रभावित करने के अतिरिक्त उनमें से कुछ को सीरिया के युद्धक्षेत्र में इस्लाम के उद्देश्य के साथ जुड़ने का विचार भी दिया है. खुफिया एजेंसियों को इस्लामी आतंकवादी संगठनों की युवाओं के साथ संपर्क बनाने की कार्यप्रणाली पर गहन नजर रखनी होगी और संदिग्धों में से संभव पाकिस्तानी प्रतिनिधियों का भी पता लगाना होगा. 
 
भारत धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा दुनिया में कहीं भी फैलाई जा रही हिंसा के पूरी तरह से खिलाफ है, लेकिन आईएसआईएस के खतरे का ये मतलब नहीं कि हम पाकिस्तान प्रायोजित सीमा-पार आतंकवाद को नजरअंदाज करते हुए उसके साथ एक आतंकवाद पीड़ित राष्ट्र के रूप में सहानुभूति जताएंगे. ये याद रखा जाना चाहिए कि इंडियन मुजाहिद्दीन की जड़ें पाक समर्थक जमात-ए-इस्लामी में निहित हैं. 
 
यह संतोष की बात है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एकबार फिर पाकिस्तान को उसकी सीमाओं के बाहर संचालन कर रहे सभी आतंकवादी समूहों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने अपनी भारत यात्रा के दौरान आईएसआईएस और अल-कायदा जैसी वैश्विक ताकतों के साथ-साथ लश्कर-ए-तैएबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे भारत विरोधी संगठनों के खिलाफ ‘निर्णायक कार्रवाई’ की मांग की है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति का यह दृष्टिकोण आतंकवाद के मुद्दों पर पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय रुख के समर्थन की पुष्टि करता है. 
 
भारत को उन सभी आतंकवादियों की तलाश करनी चाहिए जो इस्लाम या जिहाद के नाम पर आत्मघाती हमलावर के रूप में कार्य करते हैं. हमें इस सुस्पष्ट समझ के आधार पर अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘वार ऑन टेरर’ का समर्थन करना चाहिए कि वैश्विक समुदाय भारत के खिलाफ पाक प्रायोजित आतंकवाद की भी समान रूप से निंदा करेगा. समय की मांग है कि भारत उग्रवादी संगठनों की जिहाद की अपील से अपने नागरिकों को अलग रखे और उनके मन में सलामती और सुरक्षा की भावना बैठाए. 
   
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)