नई दिल्ली. एबीपी न्यूज और नील्सन सर्वे द्वारा हाल ही में जारी किए सर्वेक्षण के नतीजों से कांग्रेसी आलाकमान में मायूसी छा गई है. उसकी निराशा और चुप्पी को राजनीतिक गलियारों में महसूस किया जा सकता है. आंकड़े खुद पूरी कहानी बयान करते हैं.
 
भारतीयों का मानना है कि नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता के बाद से अब तक के सर्वश्रेष्ठ भारतीय प्रधानमंत्री हैं. लोकप्रियता के मामले में उनके बाद इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आता है. इन तीनों के समर्थन का अनुपात क्रमश: 32, 23 और 21 फीसदी है. अगर आज देश में आम चुनाव कराए जाएं तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘राजग’ को लोकसभा में 301 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत प्राप्त होगा. कांग्रेस ने यह दावा किया है कि गत वर्ष प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा में तेजी से गिरावट आई है. लेकिन, यह सर्वेक्षण कांग्रेसी दावों के विपरीत नतीजे बताते  हैं.
 
रिपोर्ट्स के मुताबिक 58 प्रतिशत लोग नरेंद्र मोदी को देश का सबसे लोकप्रिय नेता मानते हैं. उनके बाद राहुल गांधी का नंबर आता है लेकिन दोनों नेताओं के बीच एक बड़ा और ठोस अंतर है. राहुल गांधी को केवल 11 प्रतिशत लोगों का समर्थन प्राप्त है. 2014 आम चुनावों में कांग्रेस को मात्र 19.52 फीसदी वोट मिल पाए थे जबकि आज यह आंकड़ा केवल 14 प्रतिशत तक सीमित होकर रह गया है. कांग्रेस को यह कीमत राहुल गांधी के कारण चुकानी पड़ रही है. कांग्रेसी नेतृत्व वाली यूपीए में शामिल अन्य घटक दलों ने राजग की सीटों में आई मामूली गिरावट को बहुत बड़ा मुद्दा बना दिया था. यह सर्वेक्षण कांग्रेस की मौजूदी सीटों के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं प्रदान करता. आप सब सोच रहे होंगे कि मतदाताओं के बीच कांग्रेस की लोकप्रियता घटने का क्या कारण हो सकता है? चलिए राज्यसभा की कांग्रेसी घेराबंदी और जीएसटी विधेयक में उसके द्वारा लगातार विरोध करने पर जनता की प्रतिक्रिया पर गौर करते हैं. 44 फीसदी लोगों का मानना है कि कांग्रेस ही सरकार को जीएसटी विधेयक पारित करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं . 48 प्रतिशत प्रतिवादियों द्वारा अर्थव्यवस्था में सुधार आने की बात कहने के साथ सरकार के आर्थिक कार्यक्रम को भी लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ है. 
 
सांख्यिकीय संपृष्टि के बिना भी कांग्रेस के घटते समर्थन के कारण ढूंढ़ने के लिए ज्यादा दिमाग लड़ाने की जरूरत नहीं है. मतदाता हमेशा ऐसी किसी भी पार्टी को सिरे से खारिज करेंगे जो देश के आर्थिक विकास में बाधा डालती है. जीएसटी को एक सकारात्मक विधेयक के रूप में देखा जाता है और कांग्रेसी आपत्तियों को देखते हुए यह सरलता के साथ बूझा जा सकता है कि वो नहीं चाहती कि देश के आर्थिक विकास का श्रेय नरेंद्र मोदी को प्राप्त हो. कांग्रेस 2014 की पराजय का प्रतिशोध मतदाता से ले रही है. आखिर कोई मतदाता कांग्रेस के ऐसे नकारात्मक व्यवहार को कैसे भूल सकता है? 
 
अगर आप इस तथ्य को ध्यान में रखें कि मोदी सरकार का प्रदर्शन कैसा भी हो, मतदाताओं के कुछ वर्ग उनके सख्त खिलाफ हैं तो प्रधानमंत्री की लगातार बढ़ती लोकप्रियता और अधिक असाधारण दिखाई देती है. लोकतंत्र में भावनात्मक और यहां तक कि तर्कहीन प्रतिक्रियाओं का भी अपना एक अलग स्थान है. सुशासन द्वारा इन पर काबू पाया जा सकता है लेकिन इसमें समय लगता है. लेकिन, जो बात निर्विवाद है वो ये कि देश के अधिकांश लोग प्रधानमंत्री की नेतृत्व क्षमताओं के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं और प्रधानमंत्री पर पर उनका भरोसा अटल एवं अडिग है. उनका यह दृढ़ विश्वास है कि सरकार ईमानदार है और अर्थव्यवस्था सही दिशा में आगे बढ़ रही है. 
 
मतदाताओं के वर्तमान मूड के दो तत्व विशेष रूप से दिलचस्प हैं. पहला है वाम-पक्ष की धीमी किंतु स्थिर बहाली. 2014 में पूरे सफाए की तुलना में लेफ्ट आज 20 सीटें जीत सकती है, देश के पूर्वोत्तर राज्य में इसकी सीटों की संख्या 4 से बढ़कर 9 तक पहुंच गई है. बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की जीत लगभग निश्चित मानी जा रही है लेकिन लोकतंत्र में कुछ भी आसान नहीं है और भारतीय चुनावों की शब्दावली में तो ‘सरल’ शब्द की जगह ही नहीं है. पूर्वी भारत में एक और प्रवृत्ति पर जरा ध्यान दीजिए. जबकि, 2014 की तुलना में राजग की सीटों में 15 सीटों की गिरावट आई है, इसे तब भी 31 प्रतिशत मतदान के साथ बंगाल, ओडिशा, बिहार और पूर्वोत्तर से 42 सीटें मिलेंगी. स्पष्ट है कि जब प्रधानमंत्री केंद्र में अपनी सरकार के लिए वोट मांगते हैं तो मतदातओं की प्रतिक्रिया में तीव्र उछाल देखने को मिलता है. 
 
दूसरा, प्रधानमंत्री की पाकिस्तानी नीति और इस्लामाबाद के साथ   वार्ता बहाली के उनके प्रयासों को जनता का जबर्दस्त समर्थन प्राप्त है. चूंकि यह सर्वेक्षण पठानकोट हमले के बाद किया गया था, प्रधानमंत्री की पाकिस्तान नीति को अब भी जनता का समर्थन प्राप्त है. उपमहाद्वीप में हालात सामान्य होने की तीव्र इच्छा है हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता. प्रधानमंत्री ने जनता के मूड का सटीकता के साथ अंदाजा लगाया है. उसी तरह, प्रधानमंत्री की विदेश नीति की भी सराहना की जा रही है, 50 प्रतिशत उनकी विदेश नीति से सहमत हैं जबकि असहमतों की संख्या 35 प्रतिशत है. 
 
क्या यह सर्वेक्षण कांग्रेस को संसद के बजट के दौरान उसकी कार्यप्रणाली बदलने के लिए राजी कर पाएगा? इसका जवाब तो केवल कांग्रेसी नेता ही दे सकते हैं. लेकिन जागृत होने के लिए आपको अपनी आंखें खोलने की जरूरत होती है.