अमित शाह को एकबार फिर से निर्विवाद रूप से भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है और उनका पुन:निर्वाचन स्पष्ट संकेत देता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ परिवार के भीतर अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है. कुछ सप्ताह पहले, एक मीडिया रिपोर्ट ने खबर दी थी कि कुछ लोगों द्वारा भाजपा अध्यक्ष के रूप में एक नए चेहरे को चुने जाने का अनुमान लगाए जाने के बावजूद अमित शाह के कार्यकाल को नवीकृत किया जा रहा है. अमित शाह मोदी के सबसे भरोसेमंद सिपाही हैं और उन्हें पूरा कार्यकाल दिया गया क्योंकि भाजपा का ऐसा मानना है कि पार्टी और सरकार को हमेशा एक-दूसरे के साथ सहमति में चलना चाहिए. इसके अलावा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी कीमत पर शक्ति के दो केंद्र नहीं चाहेगा. शक्ति के दो केंद्र होना यूपीए सरकार के पतन के प्रधान कारणों में से एक था. एक केंद्र का नेतृत्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कर रहे थे और दूसरे केंद्र के नेतृत्व की कमान पार्टी सुप्रीमो नेतृत्व सोनिया गांधी के हाथों में थी. जनता की धारणा में सोनिया गांधी पिछले शासनकाल की सबसे शक्तिशाली हस्ती थी, भले ही उन्होंने कोई सरकारी पद धारण नहीं किया था. यूपीए सरकार का एजेंडा सोनिया की इच्छा अनुसार निर्धारित किया जाता था और इस सब के बीच मनमोहन सिंह केवल मूकदर्शक बने रहे. मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी के नेतृत्व में भी कार्य करने की इच्छा प्रकट करने वाले बयान को देकर अपनी खुद की स्थिति को दुर्बल कर लिया.

 ऐसे रवैये ने हमारे संसदीय लोकतंत्र का मजाक बना कर रख दिया जहां अंतिम निर्णय लेने का परम अधिकार प्रधानमंत्री के हाथ में होता है. मनमोहन सिंह के फैसलों को कई मौकों पर रद कर दिया गया लेकिन उन्होंने किसी प्रकार की नाराजगी प्रकट नहीं की. सरकार के प्रमुख फैसलों पर अपने अधिकार पर जोर देने के बजाय उनका ध्यान प्रधानमंत्री पद पर बरकरार रहने पर अधिक केंद्रित था. अंतत: ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जहां मंत्रियों ने उनके पद को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और ऐसे निर्णयों को लागू किया जो प्रधानमंत्री की छवि और प्रतिष्ठा के लिए हानिकारिक सिद्ध हुए. इस दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई के कारण ऐसे हालात बन गए जहां संसदीय चुनाव होने से तीन वर्ष पहले तक चुनावी विशेषज्ञों ने कांग्रेस के महज 60-70 सीटों पर सिमट जाने के साथ उसकी संभावित पराजय पर अपनी मुहर लगा दी थी. चुनावी विश्लेषकों के अनुमान सही साबित हुए क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते हुए पार्टी अध्यक्ष को सारे महत्वपूर्ण फैसले लेने की अनुमति दे रहे थे. इसका परिणाम यह निकला कि कांग्रेस को महज 44 सीटों के साथ उसकी अब तक की सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा.  वहीं दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही दिखाया है कि वही सभी मामलों के लिए उत्तरदायी हैं और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है. भले ही 18 माह बाद उनकी लोकप्रियता थोड़ी क म जरूर हो गई है, लेकिन उनकी भूमिका को लेकर कभी भी किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं रही और न ही उनके अधिकार में किसी प्रकार की कमी देखने को मिली है. सभी मंत्री जानते हैं कि असली आका कौन है और वे सभी मोदी के अधीन कार्य करके संतुष्ट हैं. हालांकि भाजपा में ऐसे कई लोग हैं जिनका मानना है कि प्रधानमंत्री को उनकी सरकार व उसके प्रदर्शन की सटीक राजनीतिक प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए उनके सांसदों व अन्य नेताओं के साथ निरंतर रूप से मिलते रहना चाहिए. जब अमित शाह का प्रथम कार्यकाल समाप्ति के निकट था, तब प्रधानमंत्री के कई आलोचकों ने सोचा कि मोदी पर हमला करने का यह उचित अवसर है और ऐसे व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाए जो व्यक्तिगत रूप से मोदी का करीबी न हो. कई नामों को लेकर अटकलें लगाई जा रही थी और संघ के पदाधिकारियों की पार्टी के कुछ सदस्यों के साथ बैठक को आवश्यकता से अधिक महत्ता दी जा रही थी. समाचारपत्रों में ऐसी भी कहानियां प्रकाशित हुर्इं कि संघ प्रमुख मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के खिलाफ हैं और ऐसे दावे किए गए कि वह तेजी से लोकप्रिय होते प्रधानमंत्री के अधिकारों को सीमित करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं.

 ऐसी मनगढंत अफवाहें प्रकाशित करने वालों को शायद इस बात का एहसास नहीं था कि भागवत और संघ किसी भी हालत में भाजपा को कमजोर पड़ता हुआ नहीं देख सकते. वे निश्चित रूप से पार्टी अध्यक्ष के रूप में ऐसे व्यक्ति को निर्वाचित करने के पक्ष में हरगिज नहीं थे जो विभिन्न राज्यों में संगठन को मजबूत बनाने के बजाय प्रधानमंत्री के साथ हितों के टकराव में अपना अधिकांश समय बिताए. इसलिए, कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में और व्यापक विचार विमर्श के बाद अमित शाह को पुननिर्वाचित करने का फैसला लिया गया.  अमित शाह के निर्वाचन के साथ ही मोदी भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं. नरेंद्र मोदी की सर्वोच्चता के समक्ष शायद अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी की बीते दौर की लोकप्रियता भी फीकी पड़ जाए. प्रधानमंत्री मोदी को उनके मंत्रिमंडल में फेरबदल करने की पूरी आजादी दी गई है. लेकिन यह देखा जाना अभी बाकी है कि अमित शाह को उनकी टीम के गठन में कितनी   आजादी दी जाती है.  इसी दौरान ऐसे कयास लगाए जा रहे है कि प्रधानमंत्री मोदी उनके समर्थकों को फिर से आश्वस्त करने के लिए मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल कर सकते हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि गणतंत्र दिवस समारोह के बाद नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. हो सकता है कि प्रधानमंत्री निराशाजनक प्रदर्शन करने वाले अपने कुछ सहयोगियो को बाहर का रास्ता दिखा दें. उन्हें राज्यसभा की सीटों के लिए और गवर्नर संबंधी कार्यों के लिए प्रस्तावित नामों पर अंतिम निर्णय भी लेना है. नरेंद्र मोदी के कार्य दिखाएंगे कि अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किस के पास है.