पूर्वानुमेयता और राजनीति निश्चित रूप से एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं. ऐसे समय में जब स्थिरता और दृढ़विश्वास राजनीतिक दलों के विशिष्ट गुणों में से नदारद हैं, नेताओं द्वारा आकस्मिक एवं अप्रत्याशित कदम उठाना प्रचलन बन गया है लेकिन हाल के दिनों में नेताओं की भाव भंगिमाएं आश्चर्यजनक रूप से नीरस हो गई हैं. वे केंद्र व राज्यों में मंत्रियों की बर्खास्तगी अथवा उनके इस्तीफे की रट लगाए जा रहे हैं. चूंकि, सत्तारूढ़ दल के सदस्यों पर ‘दागी’ या ‘भ्रष्ट’ होने के अत्यधिक आरोपों से लाभप्रद चुनावी लाभांश प्राप्त होते हैं, सभी राजनीतिक दलों ने अपने विरोधियों को परेशानी में डालने के लिए ‘इस्तीफा’ या ‘बर्खास्त’ को अपनी रणनीति का अभिन्न अंग बना लिया है.

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक, राजनीतिक गलियारों में हर तरफ इस्तीफों एवं बर्खास्तगियों की मांग जोरदार तरीके से गूंज रही है. जहां एक तरफ भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल के मंत्रियों के इस्तीफे की मांग कर रही है तो वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने राजग सरकार के मंत्रियों को इस्तीफा देने के लिए कहकर जवाबी हमला किया है. अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस्तीफे की मांग करते हैं तो भाजपा केजरीवाल को उनकी पार्टी के भ्रष्ट मंत्रियों को बर्खास्त करने के लिए कहती है. जब भाजपा भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के चलते हिमाचल के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग करती है तो कांग्रेस नई दिल्ली में प्रधानमंत्री पर उनके कुछ सहयोगियों को बाहर का रास्ता दिखाने का दबाव डालती है. नए दौर के राजनीतिज्ञ वैचारिक टकराव की कला को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के विध्वंस के हठधर्म के साथ बदल रहे हैं.

गत सप्ताह कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय के इस्तीफ की मांग की. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि दोनों मंत्रियों ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जिसके चलते दलित पीएचडी शोध छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या करने के लिए विवश हो गया. राहुल गांधी भी अपने सभी कार्यक्रम रद करके हैदराबाद पहुंच गए. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने देशभर में ईरानी और दत्तात्रेय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए. कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलते हुए अरविंद केजरीवाल भी दलित छात्रों के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए हैदराबाद पहुंच गए. उन्होंने अपने चिर-प्रतिद्वंदी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए दोनों केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की. तृणमूल कांग्रेस से लेकर जनता दल तक, लगभग सभी गैर-भाजपा दलों ने प्रधानमंत्री मोदी पर दोनों मंत्रियों को बर्खास्त करने का दबाव बनाया. कांग्रेसी विशेषज्ञों के अनुसार, प्रधानमंत्री के आकर्षण को कम करने और भाजपा को दलित विरोधी पार्टी के रूप में पेश करने के लिए कांग्रेस ईरानी और दत्तात्रेय के ‘राजनीतिक और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य’ आचरण को मुख्य मुद्दा बनाएगी. कांग्रेस को एहसास हो चुका है कि वेमुला की मौत ने उसे ‘दलित उत्पीड़न’ का हथियार बनाकर गैर-भाजपा दलों को एकजुट करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है. पार्टी ने अपनी सभी राज्य इकाइयों और अग्रिम संगठनों को विरोध बैठकों का आयोजन करने और ईरानी को भाजपा की दलित विरोधी नेता के रूप में प्रस्तुत करने वाले चित्रों का प्रदर्शन करने के निर्देश दिए हैं.

बिहार और देश के अन्य भागों में हुए स्थानीय चुनावों में मिली चुनावी सफलताओं से प्रोत्साहित कांग्रेस में मानों एकबार फिर नए जीवन का संचार हुआ है. पिछले 12 महीनों में उसने भाजपा के किसी मंत्री अथवा मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने का कोई मौका नहीं गंवाया है. गत वर्ष कांग्रेस ने व्यापमं घोटाले को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस्तीफे की मांग करते हुए संसद संचालन की अनुमति नहीं दी. कांग्रेस ने आईपीएल संस्थापक ललित मोदी के साथ रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बर्खास्त करने की मांग की और संसदीय कार्यवाही को पूरी तरह से ठप कर दिया. इससे पहले, कांग्रेस ने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के कथित विवादास्पद व्यापार और कॉरपोरेट सौदों को लेकर काफी बवाल खड़ा किया था. पिछले सत्र के अंत में कांग्रेस-आप गठजोड़ ने जेटली को मुख्य निशाना बनाते हुए उन्हें हटाने की मांग की.

इस्तीफे के उन्माद को उत्तेजित करने के लिए केवल कांग्रेस को ही पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता. नरेंद्र मोदी के शक्तिशाली व्यक्तित्व के अतिरिक्त, भाजपा 2014 में कांग्रेस को ध्वस्त करने में इसलिए समर्थ रही क्योंकि वो जनता के समक्ष कांग्रेस को पूरी तरह से भ्रष्ट राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही थी. पिछले लोकसभा चुनाव से तीन वर्ष पहले तक, भाजपा संसद के हर सत्र में कम से कम एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा मांगने के लिए ठोस कारण तलाशने में सफल रही थी. जांच एजेंसियों द्वारा केंद्रीय मंत्री ए. राजा को भ्रष्ट पाए जाने के बाद पद से हटा दिया गया था. कई अन्य मंत्रियों और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को आपत्तिजनक आधिकारिक आचरण के चलते अपना बोरिया-बिस्तरा समेटना पड़ा.

इस्तीफे मांगने का दौर वास्तव में यूपीए के शासनकाल के दौरान चरम पर रहा जब भाजपा संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के आधार पर विदेश   मंत्री नटवर सिंह का इस्तीफा निकलवाने में समर्थ रही. 2009-14 के दौरान, कानून मंत्री अश्विनी कुमार, रेलवे मंत्री पवन बंसल, पयर्टन मंत्री सुबोध कांत सहाय और विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर को मंत्रियों के रूप में अनुचित कृत्यों के चलते इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा. भाजपा ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग तक कर डाली थी लेकिन इनमें से अधिकांश मंत्रियों ने अब तक आपराधिक आरोपों का सामना नहीं किया है और न ही दोषी ठहराया गया है.

अब कांग्रेस भाजपा को उसी की भाषा में जवाब दे रही है. 1980 और 1990 के दौर में विपक्ष द्वारा नाकारापन और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने से उत्पन्न कोलाहल के कारण कांग्रेस दो चुनाव हार गई थी. उस समय विपक्ष ने कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस्तीफे की मांग की थी. संयोगवश, यूपीए-2 के खस्ताहाल शासन के दौरान विपक्ष द्वारा ‘सरकार छोड़ो’ के नारे लगाए गए और भाजपा ने स्पष्ट रूप से राजनीतिक बढ़त प्राप्त की. वर्ष 2019 के आम चुनावों तक विभिन्न राज्यों में विधानसभा संपन्न हो चुके होंगे और विविध परिणाम देखने को मिलेंगे. कांग्रेस की रणनीति स्पष्ट है, भाजपा के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्री के इस्तीफे की भी लगातार मांग करके कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि वर्ष 2019 तक सत्तारूढ़ दल व उसके सबसे लोकप्रिय नेता की ऊर्जा इस हद तक कमजोर पड़ जाएगी कि वे दूसरा जनादेश प्राप्त करने में विफल रहेंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)