नई दिल्ली. जब आप यह आलेख पढ़ रहे होंगे तो इस दुखद घटना के करीब 48 घंटे बीत चुके होंगे पर विल्लीपुरम जिला किसी नेता की जुबान पर नहीं है. बात-बात पर ट्वीट करने वालों की उंगलियां भी शायद ठंड में जम गई होंगी इसीलिए विल्लीपुरम हैश टैग डालने में दिक्कत हो रही होगी. मीडिया के कैमरे का फोकस भी इस छोटे से जिले तक पहुंचते-पहुंचते आउट ऑफ फोकस हो रहा है. हाथों में मोमबत्तियां और पोस्टर लिए प्रलाप कर रहे छात्र संगठनों का ध्यान भी यहां नहीं जा रहा है. यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यहां हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आत्महत्या करने वाले छात्र की तरह मसाला नहीं है. न ही वो तमाम कारक हैं जिसके दम पर भविष्य की राजनीति की रूपरेखा तैयार की जा सकती है.
 
तमिलनाडु के विल्लीपुरम जिले में चिन्ना सेलम एक जगह है. सुदूर क्षेत्र में यहां एक निजी मेडिकल कॉलेज है. हर साल यहां सैकड़ों स्टूडेंट्स एडमिशन लेते हैं. लंबे समय से यहां सुविधाओं का अभाव है. मोटी फीस देकर यहां पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स काफी समय से बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे हैं पर नतीजा आज तक नहीं निकला है. शनिवार को कॉलेज प्रबंधन की मनमानी का आरोप लगाते हुए कॉलेज की तीन छात्राओं ने आत्महत्या कर ली है. उन्होंने बाकायदा सुसाइड नोट लिखकर बताया है कि कैसे अच्छी सुविधाओं का वादा कर कॉलेज ने धोखा दिया है. अपना भविष्य खराब होता देख तीनों छात्राओं ने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी. वहां की पुलिस ने मीडिया को दी गई जानकारी में बताया है कि तीनों छात्राओं ने पहले एक दूसरे के हाथ पैर बांधे फिर एक साथ छलांग लगा दी. 
 
हैदराबाद यूनिवर्सिटी से रोहित वेमुला को निकाल दिया गया था. उसका वजीफा बंद हो गया था. कारण तमाम थे जिसके चलते यूनिवर्सिटी को ऐसा कदम उठाना पड़ा था. जिस खालीपन का जिक्र रोहित ने अपनी सुसाइड नोट में किया था वह खालीपन उसे अपने सुनहरे भविष्य में दिख रहा था. इसके कारण उसने जिंदगी से हार मान ली. कुछ ऐसा ही मेडिकल कॉलेज की छात्रा प्रियंका, सारन्या और मोनिशा ने महसूस किया होगा, क्योंकि उन्हें अपना कॅरियर चौपट नजर आ रहा था. उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि लाखों रुपए खर्च करने के बाद उनका भविष्य क्या होगा.
 
अब सवाल उठता है कि जिस खालीपन के कारण रोहित ने आत्महत्या की और जिस खालीपन के कारण तीन छात्राओं ने आत्महत्या की उसमें अंतर कैसा? रोहित वेमुला की आत्महत्या राजनीतिक मुद्दा बन सकता है तो प्रियंका, सारन्या और मोनिशा की आत्महत्या क्यों नहीं?  कारण चाहे अलग-अलग हों लेकिन चारों ही आत्महत्या शिक्षा के मंदिर में हुई है. ऐसे में मंथन करने की जरूरत है कि हम विल्लीपुरम के लिए क्यों नहीं आवाज उठा पा रहे हैं. आज भारत में हैदराबाद यूनिवर्सिटी से बड़ी समस्या विल्लीपुरम जैसे मेडिकल और तमाम निजी प्रोफेशनल कॉलेजों और यूनिवर्सिटी की है. हर साल थोक के भाव में निजी कॉलेज और यूनिवर्सिटी खुल रही हैं. सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर इन संस्थानों ने न जाने अब तक कितनों की बलि ले ली है. ऐसे संस्थानों के खिलाफ क्यों नहीं कोई नेता या पार्टी आवाज उठाती है. क्यों नहीं आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाती है. छात्र राजनीति भी कभी इस ओर ध्यान नहीं देती है. 
 
कभी भी किसी नेता ने आज तक बयान नहीं दिया कि ऐसे संस्थानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. कभी यह सवाल नहीं उठा कि जिन संस्थानों ने नियमों को ताक पर रख-रखा है उसके खिलाफ एचआरडी मिनिस्ट्री या फिर उसके जैसी सक्षम बॉडी क्या एक्शन ले रही है. एक साल में देश भर के जिन शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई हुई उसे अंगुलियों पर गिना जा सकता है. जबकि, उसकी एवज में कई गुणा शैक्षणिक संस्थाएं धड़ाधड़ खुलती जा रही हैं. तमाम नॉर्म्स का वॉयलेशन करके इन शैक्षणिक संस्थानों ने शिक्षा का एक ऐसा साम्राज्य स्थापित कर लिया जहां हर साल करोड़ों के वारे-न्यारे होते हैं. शिक्षा का यह बाजारीकरण क्यों नहीं किसी राजनीतिक दल को नजर आता है?
 
रोहित वेमुला हो या फिर प्रियंका, सारन्या और मोनिशा जैसे सैकड़ों स्टूडेंट्स. इनकी आत्महत्या को कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन, जिस गिद्ध दृष्टि की तरह तमाम राजनीतिक दलों ने रोहित की आत्महत्या का राजनीतीकरण किया है वह बेहद शर्मनाक है. राहुल गांधी से लेकर अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने जिस तरह हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में माइक उठाकर अपने उत्तेजक भाषणों से वाहवाही लूटी है, आज नहीं तो कल उनसे पूरा देश सवाल जरूर करेगा, कि वह तमिलनाडु के विल्लीपुरम जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा सके.
 
उन्हें विल्लीपुरम जाने से कौन सी ताकत रोक रही थी और वह कौन सी एनर्जी थी जिसने हैदराबाद जाने की होड़ में उन्हें सबसे आगे निकाल दिया. जिस तरह रोहित ने आत्महत्या कर देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में राजनीति की बहस छेड़ दी है, ठीक उसी तरह हमें प्रियंका, सारन्या और मोनिशा की आत्महत्या को बेकार नहीं जाने देना चाहिए, क्योंकि भविष्य का खालीपन तो दोनों मामलों में है. कम से कम एक मोमबत्ती तो हम प्रियंका, सारन्या और मोनिशा के नाम की जला ही सकते हैं. देखते हैं कौन सबसे पहले तमिलनाडु के विल्लीपुरम में जाकर मोमबत्ती जलाता है. इंतजार रहेगा.