पीडीपी(पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती द्वारा अपनी अगली कार्रवाई को अंतिम रूप देने में किए जा रहे विलंब से संघ के शीर्ष पदाधिकारियों की रातों की नींद उड़ गई है. गत सप्ताह मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद भाजपा व संघ के शीर्ष नेताओं के बीच जम्मू-कश्मीर में भाजपा व पीडीपी के गठबंधन के भविष्य को लेकर एकाएक अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई है.

 सच्चाई ये है कि भाजपा और संघ के नेता कश्मीरी जनता की मन की भावनाओं को गहराई से समझ पाने में असमर्थ रहे हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के महान बलिदान, और उनके करीबी सहयोगी प्रोफेसर बलराज मदहोक की विद्वतापूर्ण ग्रहणशक्ति से भाजपा ने कोई सीख नहीं ली है.

 इसका परिणाम यह निकला है कि भाजपा अपनी विचारधारा से भटकी हुई पार्टी प्रतीत हो रही है जबकि पीडीपी एक विजेता के रूप में उभर कर सामने आई है और अपने सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रतिष्ठित नेता की मृत्यु के बाद पिछली गलतियों को सुधारने के प्रति दृढ़संकल्प दिखाई देती है. यहां पर यह स्मरण करना आवश्यक हो जाता है कि यह भाजपा के महासचिव और पूर्व आरएसएस प्रवक्ता थे जिन्होंने गत वर्ष एक माह तक चले विचार-विमर्श के बाद पीडीपी के साथ गठबंधन को अंतिम रूप दिया था. गठबंधन के भविष्य को लेकर चल रही अनिश्चितता के माहौल में उनके पास भी खुद को साहसी नेता के रूप में प्रस्तुत करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया है. ऐसा प्रतीत होता है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद काफी समय तक हमारे शीर्ष राष्ट्रीय राजनीतिज्ञों को चालाकी में मात देने वाली कश्मीरी मानस की विशिष्ट धूर्तता और चतुर तीक्ष्णता को संघ ने कम करके आंक लिया था. चूंकि इंदिरा गांधी खुद कश्मीरी मूल की थी, वह संघर्षग्रस्त सीमावर्ती राज्य में हो रहे घटनाक्रमों की प्रकृति का बिलकुल सटीकता के साथ अंदाजा लगाने में निपुण थीं. यहां तक कि उनके रहते हुए अलगाववादी भी अपनी हदों को पार करने की नहीं सोच सकते थे क्योंकि वह अपने विरोधियों के साथ सख्ती से निपटने में सक्षम थी.

 महबूबा मुफ्ती अतीत में किसी सरकारी ओहदे पर भले न रही हो, लेकिन वह कश्मीर घाटी के राजनीतिक रुझानों को कई अनुभवी राजनीतिज्ञों की तुलना में बेहतर तरीके से जानती हैं. मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने में कोई जल्दबाजी न दिखाकर उन्होंने सीधा एवं स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उन्हें सत्ता का लोभ नहीं है. उन्हें इस बात का अहसास है कि अगर वह गठबंधन के बावजूद कश्मीरी नागरिकों के लिए अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करनें में सक्षम रहती हैं तो वह एक ऐसे नेता के रूप में जानी जाएंगी जो राज्य के पूर्ण हितों के लिए सत्ता का त्याग करने के लिए तैयार हैं. उनका यह कदम संभवत: वर्ष 2004 में सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद के प्रस्ताव को ठुकराने से प्रेरित है. सोनिया गांधी के इनकार ने राष्ट्र को कुछ समय के लिए यह मानने पर मजबूर कर दिया कि वह सत्ता की लोभी नहीं हैं और देश को एक स्थिर, धर्मनिरपेक्ष और विश्वसनीय सरकार देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. यह बात और है कि अगले 10 वर्षों में हालात बिगड़ गए और यूपीए-2 के कार्यकाल का अंत आते-आते उनके द्वारा प्रधानमंत्री पद को ठुकराए जाने की असली कहानी जनता के सामने आ गई.

भारतीय नागरिकों को यथोचित श्रेय दिया जाना चाहिए कि उनके मन में उन नेताओं के लिए बहुत सम्मान है जो सत्ता की लालसा नहीं रखते. हाल का राजनीतिक इतिहास दिखाता है कि लालकृष्ण अडवाणी देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को कभी पूरा नहीं कर सके क्योंकि वह गरिमापूर्ण पद ग्रहण करने के लिए अति उत्सुक दिखाई देते थे. सोनिया गांधी बीते 31 वर्ष की सबसे शक्तिशाली महिला केवल इसलिए बन पार्इं क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री पद के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था. इस प्रक्रिया में वह सबसे अधिक समय तक सेवारत कांग्रेसी अध्यक्ष भी बन गई और निकट भविष्य में उनकी इस उपलब्धि की बराबरी करना नामुमकिन प्रतीत होता है.

 महबूबा लोगों की नब्ज को अच्छी तरह से समझती हैं और यह भी जानती हैं कि भाजपा के साथ उनकी पार्टी के गठबंधन से घाटी के लोग नाराज हैं और केवल उनके दिवंगत पिता के राजनीतिक प्रतिष्ठा के कारण लोगों ने अपनी नाराजगी का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया. जब मुफ्ती के अंतिम संस्कार पर चंद ही लोग एकत्रित हुए तो महबूबा और पार्टी में उनके करीबी सहयोगियों को को साफ-साफ मालूम पड़ गया कि उनके समर्थक भाजपा के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं. महबूबा को अगला कदम उठाने से पहले जमीनी हकीकत का आंकलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

 इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पीडीपी के वरिष्ठ नेताओं ने गठबंधन दस्तावेजों में किए गए वायदों और प्रतिज्ञाओं की समीक्षा करने की आवश्यकता पर चर्चा करनी शुरू कर दी है. पीडीपी केंद्र सरकार का नेतृत्व करने वाली प्रधान पार्टी से इस उम्मीद में और अधिक आश्वासन पाने की इच्छुक है कि उसके कड़े दृष्टिकोण को घाटी में कई लोगों का समर्थन प्राप्त होगा. पीडीपी मुफ्ती के निधन के बाद घाटी में लोगों की सहानुभूति प्राप्त करने के साथ-साथ यह धारणा बनाना चाहती है कि उनकी पुत्री स्थानीय   जनता के हितों की खातिर सत्ता ठुकराने के लिए भी तैयार है. भाजपा-पीडीपी गठबंधन टूटने और नए सिरे से चुनाव करवाने का आदेश दिए जाने की सूरत में उसका यह रवैया फायदेमंद साबित हो सकता है.

 भाजपा पूरी तरह से उलझन की स्थिति में फंस चुकी है. उसने अनुच्छेद 370 के अभिनिषेध को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और अपने रुख में नर्मी लाई है. भाजपा को सफल होने के लिए गठबंधन की जरूरत है अन्यथा जम्मू के मतदाताओं का भरोसा पार्टी पर से हमेशा के लिए उठने की संभावना है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)