भारतीय सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर को उनके मित्रों में न्याय सुनिश्चित करने के लिए उनकी ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है. अगर उन्हें सुनिश्चित करना है कि लोकतंत्र के तहत नागरिकों को प्रदत्त स्वतंत्रताओं को पीछे खदेड़ने अथवा दुर्बल होने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल किया जाए तो उनके उपरोक्त दोनों गुणों की आवश्यकता पड़ेगी. यह एक प्रसंग है जहां एक व्यक्ति को केवल एक ‘बाबा’ के लिए मजाक में कहे गए शब्दों के लिए जेल में डाल दिया गया. संभवत: एक धर्मपरायण व्यक्ति के तिरस्कार से खफा ‘बाबा’ के अनुयायी ने हरियाणा पुलिस के समक्ष व्यंग्यकार के खिलाफ मुकदमा चलाने की शिकायत दर्ज कराई. कुछ वर्ष पहले गुड़गांव में एक आॅफिस ब्लॉक के नजदीक से इस स्तंभलेखक की पत्नी का हैंडबैग चोरी हो गया था जिसमें कई कविताओं की हस्तलिपियां थीं. जिस कार में यह हैंडबैग था, चोरों ने उस कार के निकट कुछ करंसी नोट फेंक दिए जिससे कार का ड्राइवर गिरे हुए 10 रुपए के नोटों को उठाने के लिए कार से बाहर निकलने के लिए प्रेरित हुआ. जब कार का ड्राइवर 10 रुपए के नोट एकत्रित करने में व्यस्त था, उसी समय चोरों ने कार में पड़े हैंडबैग पर हाथ साफ कर लिया. ऐसी उम्मीद थी कि इस चोरी को अंजाम देने वालों का जल्द ही पता लगा लिया जाएगा, क्योंकि वे उस इलाके में काफी समय से सक्रिय थे और शायद घटनास्थल से महज कुछ मीटर की दूरी पर तैनात पुलिस पीसीआर के परिचित भी हो सकते थे. लेकिन पुलिस ने इस मामले में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई.

पुलिस के ऐसे उदासीन रवैये को देखते हुए वर्दीधारियों द्वारा एक व्यंग्यकार के खिलाफ कार्रवाई करने की उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी, लेकिन हरियाणा पुलिस ने कार्यनिपुणता का अस्वाभाविक प्रदर्शन दिखाते हुए मुजरिम व्यंग्यकार को धर दबोचा और मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया. मजिस्ट्रेट ने बिना समय व्यर्थ गंवाए दो सप्ताह के लिए उसे उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से वंचित कर दिया. इस बात की प्रबल संभावना है कि पुलिस की शीघ्र कार्रवाई बाबा के ‘दिव्य उपहारों’ से प्रेरित हो. खैर जो भी हो, लेकिन क्या यह देश लोकतंत्र कहलाए जाने योग्य है जहां एक हानिरहित मजाक की सजा कारावास है?

भारत में, कानून और प्रशासन की औपनिवेशिक प्रणाली ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है जहां किसी भी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करना बेहद सरल बन गया है. यह गिरफ्तारी एक बार फिर इस तथ्य की पुष्टि करती है. बाबा का अनुयायी अपने नायक के लिए इस्तेमाल किए गए कम अतिप्रशंसायुक्त संदर्भों से ‘दुखी’ था और उसने दोषी को जेल भेज दिया. बाबा के इस अनुयायी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर जितनी सरलता से भारत के एक नागरिक की स्वतंत्रता को उससे छीन लिया गया, उससे यह स्तंभलेखक बेहद निराश महसूस कर रहा है. मेरा सवाल यह है कि क्या हरियाणा पुलिस अब उस शिकायतकर्ता को गिरफ्तार करेगी जिसके कारण भाषण की स्वतंत्रता और नागरिक के अन्य लोकतांत्रिक अधिकारों में विश्वास करने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंची है?

चीन की तरह सऊदी अरब में भी ऐसे व्यक्ति हैं जिनके बारे में नकारात्मक टिप्पणी करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना हो सकता है. अगर राष्ट्रपति शी जिनपिंग अथवा शाह सुलेमान के बारे में कोई व्यंग्यपूर्ण कार्टून मुद्रित होता है तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों का लंबे समय तक शांतिपूर्ण जीवन जीना लगभग असंभव है. लेकिन भारत के विपरीत इनमें से कोई भी देश स्वयं को लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत नहीं करता. 1950 में व्यंग्य लेखक ओबरे मेनन की ‘रामा रीटोल्ड’ पर प्रतिबंध लगाने से लेकर 1980 में सलमान रुश्दी की ‘सेटानिक वर्सेस’ पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश होने तक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अन्य लोकतंत्रों की तुलना में प्रभावहीन बनाने के लिए एक प्रतिगामी और भ्रष्ट औपनिवेशिक प्रणाली का इस्तेमाल बार-बार किया गया है. ऐसी स्थिति में, भारतीय सुप्रीम कोर्ट को सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र में जन्मे भारतवासी उन स्वतंत्रताओं का आनंद उठा सकें जो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. निसंदेह, अतीत में ऐसा भी समय आया है जब जीवन को भी ‘मौलिक’ अधिकार नहीं माना जाता था.

हाल ही में, जब उच्च न्यायालय के फैसले ने धारा-377 की प्रतिगामी प्रकृति को साहसपूर्वक रेखांकित किया और वास्तव में इसे गैर-कानूनी समझा तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को निष्फल करके विक्टोरियाई युगीन नैतिक सिद्धांतों के प्रशंसकों को बागोंबाग कर दिया. इससे कुछ वर्ष पहले वर्ष 2011 में अदालत ने अभिपृष्ट किया था कि एक पूर्व न्यायाधीश को 100 करोड़ का मुआवजा देना उचित है क्योंकि एक टीवी चैनल ने भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे एक अन्य न्यायाधीश के स्थान पर अनजाने में चंद सेकेंड के लिए उनकी तस्वीर को पर्दे पर दिखाया था. टीवी चैनल की किस्मत अच्छी थी कि उसने पूर्व न्यायाधीश की तस्वीर को एक घंटे तक नहीं दिखाया नहीं तो यह राशि 1000 करोड़ रुपए तक जा सकती थी. यह कहने की जरूरत नहीं कि इस फैसले ने मीडिया में खुलासे करने को लेकर भय का माहौल उत्पन्न कर दिया है.

विमुक्त भाषण कई बार खिझा सकता है और कई बार परेशानी में डाल सकता है. ज्ञान के इस युग   में, नवाचार एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का माहौल आवश्यक है. भारत रचनात्मक कला के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर सकता है, लेकिन ऐसा होने के लिए भाषण की स्वतंत्रता से संबंधित ‘उचित प्रतिबंध’ की शर्त को नियंत्रित किए जाने की आवश्यकता है जिसे ‘लोकतंत्र के पिता’ जवाहरलाल नेहरू द्वारा लगाया गया था. भारतीय सुप्रीम कोर्ट यह कार्य श्रेष्ठ तरीके से अंजाम दे सकता है. मि. चीफ जस्टिस, गेंद अब आपके पाले में है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)