विकृतियां एवं दुष्प्रचार दो ऐसे रोचक संघटक हैं जो मौजूदा भारतीय कूटनीति को परिभाषित करते हैं. अतीत में कूटनीतिक प्रतिबद्धता की दिशा वैचारिक धारणा एवं वाणिज्यिक हितों द्वारा निर्धारित की जाती थी, लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि दुष्प्रचारकों एवं वक्रकारों ने भारत-पाक वार्ता प्रक्रिया को प्रभावित करने का बीड़ा अपने कंधों पर उठा लिया है. गत सप्ताह, भारतीय कूटनीति के इन दोनों संघटकों को मीडिया के सामने दोनों देशों के बीच वार्ता को बहाल करने की दुहाई देते हुए देखा गया. पाकिस्तान को बढ़ावा देने वाला उनका फूहड़ पोर्टफोलियो इतिहास की गढ़ी हुई कल्पना वाली एक गलत और अधूरी खबर थी. पठानकोट एयरबेस स्टेशन पर किया गया हमला अपने आप में प्रस्तावित विदेश सचिव स्तरीय वार्ता को अस्थायी रूप से रद करने के लिए एक ठोस कारण है.

इस संपूर्ण घटनाक्रम की शुरुआत पाकिस्तान में हुई जहां जियो टीवी ने मसूद अजहर और उसके साथियों को हिरासत में लेने की खबर को जंगल में आग की तरह फैला दिया. भारतीय मीडिया ने बिना देर किए दोनों संघटकों के इशारों पर मसूद अजहर को हिरासत में लिए जाने की खबर को देशभर के टीवी चैनलों पर प्रमुखता के साथ प्रसारित किया. अगले छह घंटों तक लगभग सभी भारतीय चैनलों पर वार्ता के पक्षधर शांतिसमर्थकों को बातचीत रद किए जाने के खिलाफ आवाज उठाते हुए देखा गया. यहां तक कि नरेंद्र मोदी के आलोचक भी प्रधानमंत्री को आश्वस्त करने वालों के समूह में शामिल हो गए कि उनकी लाहौर यात्रा फलप्रद साबित हुई है और पठानकोट हमले के कारण उनकी पहल से प्राप्त हुए लाभों को हाथ से गंवाना नहीं चाहिए. उनमें से किसी ने भी भारतीय खुफिया सूत्रों अथवा उनके अपने पाकिस्तानी संपर्कों से तथ्यों की जांच करना जरूरी नहीं समझा. केवल विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) के अधिकारी मसूद की गिरफ्तारी की खबर को लेकर संशय में दिखाई दिए. यहां तक कि मोस्ट वांटेड आतंकवादी सरगना की ‘प्रोटेक्टिव कस्टडी’ को लेकर पाकिस्तानी मीडिया भी भारतीय मीडिया जितनी आश्वस्त नहीं दिखाई दी. दुर्भाग्य से, 24 घंटे बाद दुष्प्रचार, विकृतियों और झूठ के काल्पनिक छायाचित्रों का उस समय भांडाफोड़ हो गया जब पाकिस्तानी विदेश कार्यालय ने बयान जारी किया कि मसूद को गिरफ्तार नहीं किया गया है. भारत ने पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के बयान पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया देते हुए अपने दृष्ट पड़ोसी के साथ किसी भी प्रकार की भावी वचनबद्धता को तब तक स्थगित कर दिया जब तक पठानकोट हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई को लेकर पैदा हुई कूटनीतिक अस्पष्टता दूर नहीं हो जाती.

आमतौर पर किसी भी आतंकी हमले से खफा भारतीय मीडिया सीधे तौर पर पाकिस्तान को हमले का दोषी ठहराता है और आतंकवाद के सफाए पर पाकिस्तानी संस्थापन के दोगली नीति की जमकर आलोचना करता है. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब मीडिया, स्वयंभू राय-निर्माताओं और भारत-पाक संबंधों की पूरी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों पर मनगढ़ंत कहानियां आरोपित करके कूटनीतिक वर्णन को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है. निसंदेह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-पाक के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व सुनिश्चित करने के अतिरिक्त प्रयास किए हैं. हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री की तरह उनकी पहलों को भी विपक्ष के तिरस्कार का सामना करना पड़ा है. उस समय भारत की पाक नीति पर वैचारिक औचित्य और राष्ट्रीय हित के इर्द-गिर्द चर्चा की जाती थी. लेकिन, आज धारणा के ऐसे पेशेवर बंधुओं की कोई कमी नहीं है जो आतंकी हमलों और भारतीय हताहतों की संख्या की परवाह किए बगैर बातचीत जारी रखने की पैरवी करते हैं. कई लोग सीमा पार से मिलने वाली शानदार अतिथि-सेवा और दावतों को सहर्ष स्वीकार करते हैं और उसके बाद पाकिस्तान को आतंकवाद पीढ़ित राष्ट्र के रूप में और आतंकवादियों को ऐसे पथभ्रमित खुदगर्जों के रूप में प्रस्तुत करने के लिए सेमिनारों एवं गोष्ठियों का आयोजन करते हैं जिन्हें बाबरी मस्जिद के ध्वंस और 2002 गुजरात दंगों के बाद अत्यधिक कष्ट पहुंचा. लेकिन, वे बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि गुजरात दंगे ट्रेन के एक  डिब्बे में 50 से अधिक निर्दोष लोगों को जिंदा जलाए जाने की एक अस्वीकार्य प्रतिक्रिया थे. जब मोदी-नीति एक ठोस आकार ले रही है, प्रधानमंत्री को जम्मू-कश्मीर सहित भारत के विदेशी संबंधों के अर्द्धसत्यों, कोरे झूठ और विकृत ऐतिहासिक तथ्यों से संघर्ष करना पड़ेगा.

आतंकी शिविरों की समाप्ति से ध्यान भंग करने के लिए अजहर मसूद को चर्चा का केंद्र बनाया जा रहा है और ये पड़ोसी राष्ट्र की एक सोची-समझी चाल है. कुछ इतिहासकारों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि अजहर मसूद ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही आतंकवाद को गले लगाया. कुछ तो यह दावा तक करते हैं कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के दो माह बाद श्रीनगर में गिरफ्तार किए जाने से पहले मसूद फैजाबाद गया था, लेकिन इंटरनेट पर खोज करने के बाद भी मसूद द्वारा उत्तरप्रदेश की यात्रा करने का कोई जिक्र कहीं देखने को नहीं मिलता. अमेरिकी व अन्य पश्चिमी मीडिया की खबरों के अनुसार मसूद उस समय सोमालिया में अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ लड़ रहा था.

मसूद का जन्म   पाकिस्तान के बहावलपुर में 1968 में हुआ था. कराची के बनूरी नगर में जामिया उलूम-उल-इस्लामिया में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वो हरकत-उल-अंसार से जुड़ा और सोवियत-अफगान युद्ध में भाग लिया. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, मसूद बाद में हरकत-उल-अंसार का महासचिव बना और 1994 में पुर्तगाली पासपोर्ट पर यात्रा कर रहे पत्रकार के भेष में उसने भारत में प्रवेश किया. भारत में आने का उसका एकमात्र मकसद कश्मीर को आजाद करना था. भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास आईएसआई के साथ उसके संबंधों के बारे में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं.

1999 में भारत द्वारा रिहा करने के बाद पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने उसका खुले दिल से स्वागत किया. न केवल मसूद को जैश-ए-मोहम्मद कार्यान्वित करने की, बल्कि पाकिस्तान में सरेआम घूमकर भारत के खिलाफ जहर उगलने की भी अनुमति दी गई. तथाकथित इतिहासकारों और विरुपणकारों के प्रचार के विपरीत, अजहर ने अपने भड़काऊ भाषणों में शायद ही कभी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया. उसने हमेशा कश्मीर में जेहाद को प्रोत्साहित किया है. चूंकि मसूद केवल भारत और अफगानिस्तान में उत्पात मचाने वाला शैतान है, अमेरिका और पाकिस्तान ने कभी उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चिंता मोल नहीं ली. 2001 में संसद हमले के बाद भी उसे एक वर्ष तक हिरासत में लिया गया था लेकिन जल्द ही उसे रिहा कर दिया गया.

भारत-पाक विवादों के समाधान में अजहर ही एकमात्र रक्तरंजित अड़चन नहीं है. वह पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की भारत-विरोधी नीतियों का प्रतीक है. तीन युद्ध और सैकड़ों शिखर सम्मेलनों के बाद भी जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं. पिछले 14 भारतीय प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ एक खतरनाक चुनौती के बजाय सम्मानजनक  पड़ोसी के रूप में व्यवहार करने के जाल में फंस गए. 15वें प्रधानमंत्री मोदी पर दुष्प्रचार और तथ्यों को तरोड़-मरोड़ कर पेश करने के जरिए दबाव डाला जा रहा है. लेकिन, प्रधानमंत्री के लिए बेहतर यही होगा कि वह इतिहास के पराजित मार्ग से हटकर अपने लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)